नगर निगम के प्रॉपर्टी रजिस्टर में प्रविष्टि मालिकाना हक का वैध प्रमाण नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने लेआउट प्लान में प्लॉट शामिल करने का आदेश बहाल किया

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें एकल न्यायाधीश (सिंगल जज) के उस आदेश को पलट दिया गया था जिसमें दक्षिण दिल्ली नगर निगम (SDMC) को एक कॉलोनी के लेआउट प्लान में निजी प्लॉटों को शामिल करने के आवेदन पर विचार करने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डिवीजन बेंच के लिए स्वामित्व (title) के उस मुद्दे को दोबारा खोलना उचित नहीं था, जो 1988 के सिविल कोर्ट के फैसलों के माध्यम से अंतिम रूप ले चुका था।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद नई दिल्ली की ग्रीन पार्क एक्सटेंशन कॉलोनी में स्थित 1,600 वर्ग गज जमीन से जुड़ा है। मूल रूप से अर्बन इम्प्रूवमेंट कंपनी प्राइवेट लिमिटेड के स्वामित्व वाली इस भूमि को 1958 के लेआउट प्लान में “हाई स्कूल” के लिए आरक्षित किया गया था। हालांकि, 1969 में नगर निगम (MCD) ने एक संशोधित लेआउट प्लान को मंजूरी दी, जिसमें हाई स्कूल के आरक्षण को हटा दिया गया क्योंकि उपलब्ध क्षेत्र (1,600 वर्ग गज) स्कूल के लिए अनिवार्य लगभग 4,000 वर्ग मीटर की आवश्यकता से काफी कम था।

इसके बाद, 1975 में यह जमीन पांच व्यक्तियों को बेच दी गई। जब निगम ने उनके कब्जे में हस्तक्षेप करने की कोशिश की, तो मालिकों ने सिविल सूट दायर किए। 1988 में एक सक्षम सिविल कोर्ट ने मालिकों के पक्ष में फैसला सुनाया और निगम को कानूनी प्रक्रिया के बिना कब्जा लेने से रोक दिया। 1992 में डिस्ट्रिक्ट कोर्ट और हाईकोर्ट ने निगम की अपीलों को खारिज कर दिया, जिससे यह निर्णय अंतिम हो गया।

अपीलकर्ता, जो बाद के खरीदार हैं, ने लेआउट प्लान में अपने प्लॉट शामिल करने के लिए आवेदन किया। 2014 में, SDMC की लेआउट स्क्रूटनी कमेटी (LOSC) और स्टैंडिंग कमेटी ने इन आवेदनों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि निगम के अचल संपत्ति रजिस्टर (I.P. Register) में यह भूमि निगम के नाम दर्ज है।

कानूनी चुनौती

अपीलकर्ताओं ने इस अस्वीकृति को हाईकोर्ट में चुनौती दी। 3 मार्च, 2016 को विद्वान सिंगल जज ने रिट याचिका को स्वीकार करते हुए टिप्पणी की कि “केवल प्रॉपर्टी रजिस्टर में प्रविष्टि होने से निगम जमीन का मालिक नहीं बन जाता।” न्यायाधीश ने निगम को निर्देश दिया कि वह लेआउट प्लान में प्लॉट शामिल करने के आवेदन पर निष्पक्ष रूप से विचार करें।

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निगम ने इस आदेश के खिलाफ डिवीजन बेंच में अपील की, जिसने 24 अप्रैल, 2019 को सिंगल जज के आदेश को उलट दिया। डिवीजन बेंच ने 1988 के मालिकाना हक के निष्कर्षों की अंतिमता पर सवाल उठाए और कहा कि निगम उस भूमि के लिए “सार्वजनिक हित के संरक्षक” के रूप में कार्य करता है जो मूल रूप से स्कूल के लिए आरक्षित थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ भटनागर ने तर्क दिया कि मालिकाना हक के मुद्दे पर सिविल कोर्ट के निष्कर्ष दशकों पहले अंतिम हो चुके थे। उन्होंने दलील दी कि डिवीजन बेंच ने “अनौचित्यपूर्ण तरीके से सिविल कोर्ट के निष्कर्षों की जांच की” और मालिकाना हक के संबंध में ऐसी टिप्पणियां कीं जो रिट कार्यवाही का विषय ही नहीं थीं।

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दूसरी ओर, निगम के वकील अश्विनी कुमार ने तर्क दिया कि मूल वाद केवल स्थायी निषेधाज्ञा (perpetual injunction) के लिए थे, मालिकाना हक की घोषणा के लिए नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि भले ही स्कूल का आरक्षण हटा दिया गया हो, लेकिन भूमि की प्रकृति “सार्वजनिक उद्देश्य” की बनी रही और इसे निजी स्वामित्व में नहीं दिया जा सकता था।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने पाया कि डिवीजन बेंच ने विरोधाभासी निष्कर्ष दर्ज किए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“नगर निगम द्वारा बनाए रखे गए संपत्ति के रजिस्टर में केवल एक प्रविष्टि, अपने आप में, संबंधित भूमि पर स्वामित्व का वैध प्रमाण नहीं हो सकती।”

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि 1988 के सिविल कोर्ट के निष्कर्षों को कभी आगे चुनौती नहीं दी गई थी और निगम ने पहले अन्य कार्यवाहियों में स्वीकार किया था कि जमीन निजी पार्टियों की है। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“ऐसी परिस्थितियों में, डिवीजन बेंच के लिए ऐसी टिप्पणियां करना उचित नहीं था जो 1988 में दिए गए सिविल कोर्ट के डिक्री को प्रभावी रूप से अस्थिर कर दें और मालिकाना हक को विवाद के घेरे में ले आएं।”

सार्वजनिक उद्देश्य के तर्क पर कोर्ट ने पाया कि 1969 में ही जगह की कमी के कारण जमीन को अनारक्षित कर दिया गया था। फैसले में कहा गया:

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“मालिकाना हक का मुद्दा न तो विद्वान सिंगल जज के सामने विचार के लिए आया था, और न ही मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में इस तरह के निर्णय की आवश्यकता थी।”

न्यायालय का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए डिवीजन बेंच के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने सिंगल जज के आदेश को बहाल करते हुए SDMC को निर्देश दिया कि वह 60 दिनों के भीतर एक तर्कसंगत आदेश (speaking order) पारित कर अपीलकर्ताओं के प्लॉटों को लेआउट प्लान में शामिल करने के आवेदन पर विचार करें।

कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“ऊपर दिया गया निर्देश, डिवीजन बेंच द्वारा पारित आदेश या इस आदेश में की गई किसी भी टिप्पणी से प्रभावित या पक्षपाती नहीं होगा।”

मामले का विवरण

  • मामले का शीर्षक: पवन गर्ग और अन्य बनाम दक्षिण दिल्ली नगर निगम
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या ___ / 2026 (SLP (सिविल) संख्या 26487 / 2019 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
  • दिनांक: 20 अप्रैल, 2026

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