इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने लखीमपुर खीरी में थारू जनजाति के सामुदायिक वन अधिकारों के दावों को खारिज करने वाले जिला स्तरीय समिति के फैसले को निरस्त कर दिया है। जनजातीय कल्याण के हित में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप करते हुए, हाईकोर्ट ने अधिकारियों को मामले की नए सिरे से सुनवाई करने का निर्देश दिया है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि जब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, याचिकाकर्ता अपने मौजूदा वन अधिकारों का लाभ उठाते रहेंगे।
यह फैसला जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस ए.के. चौधरी की पीठ ने एनजीओ ‘उदासा’ और थारू समुदाय के 101 सदस्यों द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनाया। लखीमपुर खीरी के पलिया कलां क्षेत्र के निवासी और अनुसूचित जनजाति से संबंधित इन याचिकाकर्ताओं ने 15 मार्च 2021 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनके सामुदायिक वन अधिकारों के दावों को खारिज कर दिया गया था।
याचिकाकर्ताओं ने जिला स्तरीय समिति द्वारा उनके दावों को खारिज किए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनकी दलील थी कि वन-निवासी अनुसूचित जनजाति होने के नाते, वे ‘अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006’ के तहत विशिष्ट अधिकारों के हकदार हैं।
मामले की सुनवाई के बाद, हाईकोर्ट ने पाया कि जिला स्तरीय समिति का दृष्टिकोण मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण था। हाईकोर्ट ने उल्लेख किया कि समिति वन अधिकार अधिनियम, 2006 के उद्देश्यों और विशिष्ट प्रावधानों पर उचित विचार करने में विफल रही। इसके बजाय, अधिकारियों ने दावों को खारिज करने के लिए केवल वर्ष 2000 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित एक अंतरिम आदेश का सहारा लिया था।
पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि 2006 के अधिनियम का प्राथमिक उद्देश्य वन-निवासी समुदायों के पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देना और उनकी आजीविका एवं खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“इस अधिनियम का उद्देश्य वन-निवासी समुदायों के पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देना और उनकी आजीविका एवं खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”
जजों ने रेखांकित किया कि 2006 का कानून विशेष रूप से ऐतिहासिक अन्यायों को दूर करने और इन समुदायों के अधिकारों के लिए एक कानूनी ढांचा प्रदान करने के लिए बनाया गया था। ऐसे में समितियों के लिए यह अनिवार्य है कि वे पुराने अंतरिम आदेशों पर निर्भर रहने के बजाय इस अधिनियम के प्रावधानों को लागू करें।
हाईकोर्ट ने 15 मार्च 2021 के आदेश को रद्द करते हुए संबंधित जिला प्राधिकरण को मामले की फिर से सुनवाई करने का निर्देश दिया। पीठ ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का पूरा अवसर दिया जाए और सभी प्रासंगिक तथ्यों व रिकॉर्ड की जांच के बाद एक उचित समय सीमा के भीतर “तर्कसंगत आदेश” पारित किया जाए।
इसके अलावा, हाईकोर्ट ने थारू समुदाय के सदस्यों को अंतरिम राहत प्रदान करते हुए स्पष्ट किया कि जब तक नया निर्णय नहीं हो जाता, याचिकाकर्ता बिना किसी बाधा के अपने मौजूदा वन अधिकारों का उपयोग जारी रखेंगे।

