इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बुनकर की विधवा द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य अधिकारियों को आवासीय क्वार्टर के एक हिस्से का कब्जा बहाल करने और उसके पक्ष में ट्रांसफर डीड निष्पादित करने का आदेश दिया है। जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि भारत में बुनकर परिवारों के लिए यह एक वंशानुगत कला है और परिवार के मुखिया की मृत्यु को परिवार के सदस्यों को कॉलोनी से विस्थापित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता कमरुन्निसा, स्वर्गीय मती उल्लाह की विधवा हैं, जिन्हें वाराणसी जिले के नाटी इमली स्थित बुनकर कॉलोनी में क्वार्टर नंबर 3 आवंटित किया गया था। यह आवंटन रेशम बुनकरों के लिए राज्य प्रायोजित आवास योजना के तहत किया गया था। पति की मृत्यु के बाद, याचिकाकर्ता को कब्ज़ा संबंधी अधिकार विरासत में मिले।
विवाद तब शुरू हुआ जब दो व्यक्तियों, मोहम्मद शोएब और मोहम्मद जुनैद ने कथित तौर पर क्वार्टर के एक हिस्से पर कब्जा कर लिया। हालांकि, सहायक निदेशक (हथकरघा एवं वस्त्रोद्योग), वाराणसी ने अंततः अप्रैल 2015 में अनधिकृत कब्जाधारियों को बेदखल कर दिया और परिसर को सील कर दिया, लेकिन अधिकारियों ने यह दावा करते हुए बरामद हिस्सा याचिकाकर्ता को सौंपने से इनकार कर दिया कि उनके कार्यालय में मूल आवंटन रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं।
पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ता के वकील: याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि प्रतिवादियों ने 11 अप्रैल 2014 और 18 अक्टूबर 2014 के पिछले आदेशों के माध्यम से याचिकाकर्ता के पति के पक्ष में आवंटन को पहले ही स्वीकार कर लिया था। यह दलील दी गई कि जब याचिकाकर्ता की शिकायत पर अनधिकृत कब्जाधारियों को बेदखल कर दिया गया था, तो राज्य के पास बरामद हिस्से का कब्जा रोकने का कोई कानूनी औचित्य नहीं था।
राज्य-प्रतिवादियों के वकील: राज्य के स्थायी वकील ने तर्क दिया कि यद्यपि 1996 की एक समिति की सूची में मती उल्लाह को निवासी के रूप में पहचाना गया था, लेकिन वास्तविक आवंटन रिकॉर्ड कार्यालय में उपलब्ध नहीं थे। इसके अलावा, राज्य ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने क्वार्टर के बगल में सरकारी भूमि पर अनधिकृत दुकानों का निर्माण किया था और उनसे किराया वसूल रही थी, इसलिए वह अतिक्रमण की दोषी है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने नोट किया कि रिकॉर्ड गायब होने के कारण आवंटन पर विवाद करने का राज्य का वर्तमान रुख उसके अपने पिछले न्यायिक और प्रशासनिक निष्कर्षों के विपरीत है। खंडपीठ ने इस बात पर जोर दिया कि सहायक निदेशक ने 18 अक्टूबर 2014 को स्पष्ट रूप से निष्कर्ष निकाला था कि क्वार्टर मूल रूप से स्वर्गीय मती उल्लाह को आवंटित किया गया था और अन्य पक्ष अतिक्रमणकारी थे।
हाईकोर्ट ने राज्य के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष (Adverse Inference) निकाला क्योंकि वह 9 मार्च 2026 के विशिष्ट अदालती आदेश के बावजूद कॉलोनी की आवंटन सूची पेश करने में विफल रहा।
बुनकर समुदाय के सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“भारत में बुनकरों के परिवार में, सभी सदस्य बुनाई करते हैं और बुनाई एक वंशानुगत कला है जो अगली पीढ़ी को हस्तांतरित होती है। हम परिवार के मुखिया की मृत्यु पर बुनकरों के परिवार के सदस्यों को कॉलोनी से विस्थापित करके इस कला की मृत्यु की अनुमति नहीं दे सकते।”
हाईकोर्ट ने आगे कहा:
“एक बार जब सरकार ने खुद कब्जे वाले बुनकरों के पक्ष में क्वार्टर स्थानांतरित करने का निर्णय ले लिया था, तो पति-बुनकर की मृत्यु को विधवा बुनकर को वही अधिकार देने से इनकार करने का आधार नहीं बनाया जा सकता है।”
निर्णय
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित कार्रवाइयों को रद्द कर दिया और सहायक निदेशक, हथकरघा एवं वस्त्रोद्योग, वाराणसी क्षेत्र को निर्देश देते हुए परमादेश (Mandamus) जारी किया कि वे क्वार्टर नंबर 3 के सील बंद हिस्से का कब्जा तत्काल कमरुन्निसा को बहाल करें। हाईकोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि स्वर्गीय मती उल्लाह के उत्तराधिकारी के रूप में याचिकाकर्ता के नाम पर ट्रांसफर डीड निष्पादित की जाए।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: कमरुन्निसा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य
- केस नंबर: रिट-सी नंबर 37114 ऑफ 2023
- पीठ: जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला
- दिनांक: 16 अप्रैल, 2026

