पश्चिम बंगाल मतदाता सूची संशोधन: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अपील लंबित होने मात्र से मतदान का अधिकार नहीं, सफल अपीलों के लिए पूरक सूची जारी करे चुनाव आयोग

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के ‘विशेष गहन संशोधन’ (SIR) की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अपीलीय न्यायाधिकरणों के समक्ष अपील लंबित होने मात्र से किसी व्यक्ति को मतदान का अधिकार नहीं मिल जाता। हालांकि, कोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) को निर्देश दिया है कि यदि मतदान की तारीखों से पहले अपीलीय आदेश आ जाते हैं, तो उनके आधार पर पूरक मतदाता सूची जारी की जाए।

सारांश

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची की पीठ ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की। कोर्ट ने माना कि चूंकि मतदाता सूची के सत्यापन का कार्य न्यायिक अधिकारियों के एक निष्पक्ष दल द्वारा किया गया है, इसलिए उनके द्वारा हटाए गए नामों को केवल अपील दायर करने के आधार पर वापस नहीं जोड़ा जा सकता। हालांकि, अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए कोर्ट ने सफल आवेदकों के लिए मतदान का रास्ता खुला रखा है।

मामले की पृष्ठभूमि: विशेष गहन संशोधन (SIR)

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की सत्यता को लेकर गंभीर विवाद और आरोप-प्रत्यारोप के बीच यह मामला सामने आया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग किया था। कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के न्यायिक अधिकारियों को झारखंड और ओडिशा के न्यायिक अधिकारियों की सहायता से दावों और आपत्तियों के निपटारे का जिम्मा सौंपा था।

इन अधिकारियों ने अप्रैल 2026 के पहले सप्ताह तक 60 लाख से अधिक आपत्तियों का निपटारा करने का “असाधारण कार्य” (herculean task) पूरा किया। इस प्रारंभिक सत्यापन के बाद, असंतुष्ट व्यक्तियों के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों की अध्यक्षता में 19 अपीलीय न्यायाधिकरणों का गठन किया गया था।

याचिकाकर्ताओं के तर्क

याचिकाकर्ताओं, जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे, ने अदालत से मांग की थी कि उनके नामों को तत्काल बहाल किया जाए। उन्होंने दलील दी कि उन्हें ‘एडजुडिकेशन डिलीटेड लिस्ट’ (Adjudication Deleted List) में डालना मनमाना और अवैध है। उन्होंने अपील लंबित रहने तक अंतरिम राहत के रूप में मतदान की अनुमति मांगी थी।

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न्यायालय का विश्लेषण और न्यायिक निष्पक्षता

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाओं में मांगी गई राहत को खारिज करते हुए कहा कि न्यायिक अधिकारियों द्वारा किया गया सत्यापन उन नामों की सत्यता के पहले के अनुमान (presumption of correctness) को समाप्त कर देता है। कोर्ट ने कहा:

“हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि न्यायिक अधिकारियों द्वारा किए गए सत्यापन ने उन नामों को सूची में शामिल रखने के पहले के आधार को हटा दिया है, विशेष रूप से तब जब यह कार्य वर्तमान में सेवारत न्यायिक अधिकारियों के एक निष्पक्ष निकाय द्वारा किया गया है।”

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कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि यदि केवल अपील लंबित होने के आधार पर मतदान की अनुमति दी गई, तो इससे वही स्थिति पैदा हो जाएगी जो न्यायिक सत्यापन से पहले थी। कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों द्वारा “अत्यधिक चुनौतीपूर्ण और प्रतिकूल परिस्थितियों” में किए गए कार्य की सराहना भी की।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और चुनाव आयोग को निर्देश

आदेश के पैरा 11 में, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को विशिष्ट समय सीमा के भीतर कार्रवाई करने का निर्देश दिया:

“हम… चुनाव आयोग को निर्देश देते हैं कि जहां कहीं भी अपीलीय न्यायाधिकरण 21.04.2026 या 27.04.2026 (मतदान की तिथि के अनुसार) तक अपीलों पर निर्णय लेने में सक्षम होते हैं, वहां उन अपीलीय आदेशों को पूरक संशोधित मतदाता सूची जारी करके प्रभावी किया जाएगा।”

इसका अर्थ यह है कि:

  1. अपील की पेंडेंसी: केवल अपील दायर करने से मतदान का अधिकार नहीं मिलेगा।
  2. पूरक सूची: यदि कोई व्यक्ति 21 या 27 अप्रैल की समय सीमा तक अपनी अपील जीत जाता है, तो चुनाव आयोग उसे पूरक सूची में शामिल करेगा ताकि वह मतदान कर सके।
  3. आउट ऑफ टर्न सुनवाई: कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता अपने मामले की शीघ्र सुनवाई के लिए संबंधित न्यायाधिकरण से अनुरोध कर सकते हैं।
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अदालत अब इस मामले की अगली सुनवाई 24 अप्रैल 2026 को करेगी।

केस विवरण:

केस शीर्षक: मोस्तारी बानू बनाम भारत निर्वाचन आयोग एवं अन्य

केस संख्या: रिट याचिका (सिविल) संख्या 1089/2025 (और संबंधित मामले)

पीठ: मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत एवं जस्टिस जोयमाल्य बागची

दिनांक: 13 अप्रैल, 2026

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