सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी सहायता (लीगल एड) प्राप्त करने वाले कैदियों की अपीलों और विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) को दाखिल करने में होने वाली “अत्यधिक देरी” पर कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिसवर सिंह की पीठ ने एक विस्तृत ‘स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर’ (SOP) को मंजूरी देते हुए सभी हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वे न्यायिक रिकॉर्ड के अनुवाद और हस्तांतरण की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए प्रशासनिक सुधार करें।
अदालत ने स्पष्ट किया कि कानूनी सहायता केवल एक नीतिगत मामला नहीं है, बल्कि यह एक संवैधानिक जिम्मेदारी है जो संविधान की प्रस्तावना में निहित न्याय के आदर्शों और अनुच्छेद 39A के जनादेश से जुड़ी है।
मामले की पृष्ठभूमि और अदालती कार्यवाही
यह मामला शंकर महतो नामक व्यक्ति की अपील से शुरू हुआ था, जिसे पटना हाईकोर्ट ने 2014 में मौत की सजा सुनाई थी। 2017 में सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि कानूनी सहायता वाले मामलों में अपीलों को दाखिल करने में बहुत ज्यादा देरी हो रही है। इसके कारणों की जांच और आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने के लिए अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री विभा दत्ता मखीजा को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया था।
कई वर्षों की चर्चा और विभिन्न हितधारकों (जैसे SCLSC, NALSA और राज्य सरकारें) से परामर्श के बाद, यह पाया गया कि प्रक्रिया में कई खामियाँ थीं। जुलाई 2025 के एक हलफनामे से पता चला कि कानूनी सहायता पोर्टलों पर देरी को ट्रैक करने की सुविधा नहीं थी और पैनल वकीलों के साथ संवाद में भी भारी कमी थी।
कानूनी सहायता पर अदालत का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी सहायता के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि “कानून के समक्ष समानता वास्तविक होनी चाहिए, न कि प्रतीकात्मक।” पीठ ने टिप्पणी की:
“कानूनी सहायता वंचित व्यक्तियों को अपने अधिकारों का दावा करने और अन्याय के खिलाफ उपचार प्राप्त करने में सक्षम बनाकर सामाजिक न्याय के लक्ष्य में सीधा योगदान देती है… भारत के संविधान के अनुच्छेद 21, 39A और 142 कानूनी सहायता लाभार्थियों के लिए न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करते हैं।”
अदालत ने सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन मामले का हवाला देते हुए कहा कि जेल के गेट पर कैदी अपने मौलिक अधिकारों का त्याग नहीं करते हैं। साथ ही, हुसैनआरा खातून बनाम बिहार राज्य मामले का भी उल्लेख किया गया, जिसमें कहा गया था कि “त्वरित सुनवाई अनुच्छेद 21 का एक पहलू है और मुफ्त कानूनी सहायता निष्पक्ष, न्यायपूर्ण और उचित प्रक्रिया का एक अनिवार्य हिस्सा है।”
नया ‘स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर’ (SOP), 2025
अदालत ने 2025 के जिस SOP को मंजूरी दी है, उसमें मामलों को निम्नलिखित श्रेणियों में बांटा गया है:
- श्रेणी A1: उच्च प्राथमिकता वाले आपराधिक मामले (मौत की सजा, आजीवन कारावास, या 10+ वर्ष की सजा)।
- श्रेणी A2: उच्च प्राथमिकता वाले दीवानी मामले (संपत्ति का विध्वंस, बेदखली, बच्चों की कस्टडी आदि)।
- श्रेणी B और C: मध्यम और मानक प्राथमिकता वाले मामले।
SOP की मुख्य विशेषताएं:
- अनिवार्य समय-सीमा: श्रेणी ‘A’ के मामलों में, हाईकोर्ट कानूनी सेवा समिति (HCLSC) को निर्णय के 15 दिनों के भीतर कैदी की सहमति लेनी होगी और 15 दिनों के भीतर अनुवादक नियुक्त करने होंगे।
- डिजिटल एकीकरण: NIC को एक एकीकृत प्लेटफॉर्म बनाने का निर्देश दिया गया है ताकि जेल अधिकारी और कानूनी सहायता समितियां डेटा का आदान-प्रदान कर सकें।
- अनुवादकों का कैडर: हाईकोर्ट से अनुवादकों और पर्यवेक्षकों का एक समर्पित कैडर बनाने का आग्रह किया गया है, जिसकी संख्या हाईकोर्ट के जजों की संख्या के एक-तिहाई से कम नहीं होनी चाहिए।
- निगरानी समितियां: प्रत्येक हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ताओं की एक निगरानी समिति बनाने का निर्देश है जो हर हफ्ते प्रगति की समीक्षा करेगी।
अदालत का निर्णय और मुख्य निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि SOP के अध्याय 5 में दी गई समय-सीमा को अपीलों को सुव्यवस्थित करने के उद्देश्य से “बाध्यकारी” (binding) माना जाएगा।
अदालत ने अन्य महत्वपूर्ण निर्देश भी जारी किए:
- डिजिटल प्लेटफॉर्म: नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) को दो महीने के भीतर एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार करना होगा।
- निगरानी समितियां: SCLSC और HCLSC को एक महीने के भीतर निगरानी समितियों का गठन करना होगा।
- देरी का स्पष्टीकरण: अब से कानूनी सहायता के माध्यम से दाखिल होने वाली हर अपील में एक अनिवार्य ‘चेकलिस्ट’ शामिल होगी, जिसमें देरी के कारणों का (जैसे आदेश मिलने की तारीख, सहमति की तारीख आदि) स्पष्ट उल्लेख होगा।
- नोडल अधिकारी: NALSA के सदस्य सचिव को इस SOP के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त किया गया है।
अनुवाद की गुणवत्ता पर पीठ ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा:
“अनुवाद की खराब गुणवत्ता ने हाल ही में कई मौकों पर इस अदालत का ध्यान खींचा है, जो यह दर्शाता है कि इस संबंध में कुछ संरचनात्मक बदलाव आवश्यक हैं।”
अदालत ने रजिस्ट्रार (जुडिशियल) को निर्देश दिया कि इस आदेश की प्रति सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजी जाए ताकि इसे संबंधित मुख्य न्यायाधीशों और राज्य कानूनी सेवा समितियों के कार्यकारी अध्यक्षों के समक्ष रखा जा सके।
केस विवरण:
- केस शीर्षक: शंकर महतो बनाम बिहार राज्य (Shankar Mahto v. State of Bihar)
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2026 (SLP (Crl.) संख्या 2026 @ Crl.MP. 7862 of 2017 से उत्पन्न)
- पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिसवर सिंह
- तारीख: 16 अप्रैल, 2026

