डीआरडीओ के पूर्व वैज्ञानिक प्रदीप कुरुलकर को बॉम्बे हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत, जासूसी मामले में जमानत याचिका खारिज

बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक प्रदीप कुरुलकर की जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। कुरुलकर को पिछले साल एक कथित पाकिस्तानी खुफिया ऑपरेटर को संवेदनशील रक्षा जानकारी लीक करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने एक वरिष्ठ पद पर होने के बावजूद एक विदेशी एजेंट के साथ लंबे समय तक “अंतरंग बातचीत” की और महत्वपूर्ण जानकारी साझा की, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

60 वर्षीय प्रदीप कुरुलकर पुणे स्थित डीआरडीओ की एक इकाई में निदेशक (अनुसंधान और विकास) के पद पर तैनात थे, जब उन्हें 3 मई, 2023 को महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते (ATS) ने गिरफ्तार किया था। यह कार्रवाई रक्षा प्रतिष्ठान द्वारा दर्ज कराई गई एक शिकायत के बाद हुई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि वैज्ञानिक एक “हनी-ट्रैप” का शिकार हो गए थे, जिसे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी से जुड़ी एक महिला ने बिछाया था।

ATS के अनुसार, कुरुलकर एक साल से अधिक समय तक उस ऑपरेटर के संपर्क में रहे। इस अवधि के दौरान, जांचकर्ताओं ने कथित तौर पर उनके बीच हुई ऐसी चैट बरामद कीं, जिससे पता चलता है कि वैज्ञानिक ने महिला के साथ संबंध बनाने के प्रयास में रणनीतिक रक्षा प्रणालियों और गोपनीय विवरणों पर चर्चा की थी।

अभियोजन पक्ष ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध करते हुए तर्क दिया कि साझा की गई जानकारी अत्यंत संवेदनशील थी और इसका सीधा संबंध देश के रणनीतिक रक्षा हितों से था। उन्होंने कहा कि ये बातचीत केवल सामाजिक नहीं थी, बल्कि इसमें डेटा का आदान-प्रदान शामिल था जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

अपने बचाव में, कुरुलकर ने दावा किया कि जिन जानकारियों को साझा करने का उन पर आरोप है, वे पहले से ही सार्वजनिक डोमेन में थीं और इससे आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (Official Secrets Act) का उल्लंघन नहीं हुआ। उन्होंने इस आधार पर जमानत मांगी कि जांच पूरी हो चुकी है और अब वे डीआरडीओ के डेटा तक पहुंचने की स्थिति में नहीं हैं।

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जस्टिस एस जी डिगे की एकल-न्यायाधीश पीठ ने वैज्ञानिक के तर्कों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि बातचीत की अवधि और उसकी प्रकृति काफी चिंताजनक थी। हाईकोर्ट ने कहा:

“आवेदक ने डीआरडीओ में एक वरिष्ठ पद पर होने के बावजूद, एक साल से अधिक समय तक पाकिस्तान स्थित अधिकारी के साथ अंतरंग बातचीत जारी रखी और महत्वपूर्ण जानकारी साझा की।”

कुरुलकर की सेवानिवृत्ति के आधार पर दिए गए तर्क का जवाब देते हुए, कोर्ट ने गवाहों को प्रभावित किए जाने के खतरे की ओर इशारा किया। जस्टिस डिगे ने कहा कि हालांकि कुरुलकर अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, लेकिन इस मामले में कई गवाह उनके अधीनस्थ कर्मचारी रह चुके हैं। कोर्ट ने आशंका जताई कि अपनी पुरानी वरिष्ठता के कारण वे इन गवाहों पर अनुचित प्रभाव डाल सकते हैं।

इसके अलावा, हाईकोर्ट ने आरोपी के फरार होने की संभावना को भी जमानत न देने का एक कारण बताया।

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राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े आरोपों की गंभीरता को देखते हुए और जमानत याचिका में कोई ठोस आधार न पाते हुए, बॉम्बे हाईकोर्ट ने अर्जी खारिज कर दी। कुरुलकर फिलहाल न्यायिक हिरासत में ही रहेंगे और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी।

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