हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट के आधार पर बर्खास्तगी रद्द: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा – बिना जिरह के ऐसी रिपोर्ट ‘कमजोर साक्ष्य’

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के उन तीन कर्मचारियों की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया है, जिन्हें भर्ती परीक्षा में फर्जीवाड़े और प्रतिरूपण (impersonation) के आरोपों में सेवा से बाहर कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की राय पर भरोसा करना, वह भी तब जब कर्मचारी को उस विशेषज्ञ से जिरह (cross-examination) करने का अवसर न दिया गया हो, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता सचिन कुमार, संजीव कुमार और विपिन कुमार ने साल 2009 में एसबीआई में क्लर्क पद के लिए आवेदन किया था। 8 नवंबर 2009 को आयोजित लिखित परीक्षा और उसके बाद साक्षात्कार पास करने के बाद, उन्हें 2010 में नियुक्त किया गया। उन्होंने सफलतापूर्वक अपनी प्रोबेशन अवधि पूरी की और मई 2011 में उन्हें सेवा में स्थायी कर दिया गया।

हालांकि, 2012 और 2013 में बैंक ने “धोखाधड़ी से नियुक्ति” और “प्रतिरूपण” की शिकायतों के आधार पर उन्हें निलंबित कर दिया। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने लिखित परीक्षा में अनुचित साधनों का प्रयोग किया था। अनुशासनात्मक जांच के बाद, रीजनल मैनेजर ने 17 जनवरी 2014 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया, जिसे बाद में 11 मार्च 2015 को अपीलीय प्राधिकारी ने भी बरकरार रखा।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ताओं की ओर से श्री सिद्धार्थ खरे ने तर्क दिया कि बर्खास्तगी पूरी तरह से हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट पर आधारित थी। उन्होंने कहा कि विभाग ने जांच के दौरान किसी भी गवाह, यहां तक कि परीक्षा के इनविजिलेटर (निरीक्षक) को भी पेश नहीं किया। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह था कि उन्हें हैंडराइटिंग एक्सपर्ट से जिरह करने की अनुमति नहीं दी गई, जो अनुशासनात्मक कार्यवाही में एक बड़ी कानूनी खामी है।

वहीं, बैंक की ओर से श्री आशुतोष मिश्रा ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की रिपोर्ट पर्याप्त सबूत थी। बैंक का तर्क था कि चूंकि याचिकाकर्ताओं ने रिपोर्ट की “प्रामाणिकता और वास्तविकता” को स्वीकार किया था, इसलिए विशेषज्ञ से जिरह करने की कोई आवश्यकता नहीं थी।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस विक्रम डी. चौहान ने साक्ष्य के रूप में हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट की प्रकृति का बारीकी से विश्लेषण किया। मुरारी लाल बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1980) के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“हैंडराइटिंग की पहचान के विज्ञान की अपूर्ण प्रकृति को देखते हुए, दृष्टिकोण सावधानी वाला होना चाहिए। राय के कारणों की गहराई से जांच की जानी चाहिए और अन्य सभी प्रासंगिक साक्ष्यों पर विचार किया जाना चाहिए।”

हाईकोर्ट ने बैंक की कार्यवाही में कई प्रक्रियात्मक खामियां पाईं:

  1. पहचान के अन्य कारकों की अनदेखी: परीक्षा के कॉल लेटर में याचिकाकर्ताओं के फोटो, हस्ताक्षर और अंगूठे के निशान थे, जिन्हें उस समय इनविजिलेटर ने सत्यापित किया था। बैंक यह समझाने में विफल रहा कि इन अन्य कारकों को क्यों नजरअंदाज किया गया।
  2. इनविजिलेटर को पेश न करना: हाईकोर्ट ने नोट किया कि बैंक का अपना कर्मचारी (इनविजिलेटर) उम्मीदवारों की उपस्थिति को प्रमाणित करने वाला “सबसे उपयुक्त व्यक्ति” था, लेकिन उसे गवाह के रूप में कभी पेश नहीं किया गया।
  3. जिरह से इनकार: हाईकोर्ट ने बैंक के इस तर्क को खारिज कर दिया कि रिपोर्ट की “प्रामाणिकता” स्वीकार करने का मतलब जिरह के अधिकार को छोड़ना है। कोर्ट ने कहा कि किसी दस्तावेज़ के निष्पादन को स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं है कि उसके भीतर लिखे गए निष्कर्षों या विशेषज्ञ की राय की सटीकता को भी स्वीकार कर लिया गया है।
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हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी थी:

“हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट, जिस पर कर्मचारी द्वारा जिरह नहीं की गई है, साक्ष्य का एक कमजोर हिस्सा है। विशेष रूप से तब जब कॉल लेटर पहचान के अन्य तरीके (अंगूठे का निशान और फोटो) प्रदान करता है, जिन्हें इनविजिलेटर द्वारा सत्यापित किया गया था।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अनुशासनात्मक कार्यवाही निष्पक्ष और उचित नहीं थी। कोर्ट ने 17 जनवरी 2014 के बर्खास्तगी आदेश और 11 मार्च 2015 के अपीलीय आदेश को रद्द कर दिया।

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आरोपों की गंभीरता को देखते हुए, हाईकोर्ट ने बैंक को याचिकाकर्ताओं के खिलाफ नए सिरे से अनुशासनात्मक जांच करने की छूट दी है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि नई जांच की जाती है, तो फोटो, अंगूठे के निशान और हस्ताक्षर सहित पहचान से संबंधित सभी सामग्रियों पर विचार किया जाना चाहिए। साथ ही, बहाली के बाद बैंक को यह अधिकार होगा कि वह जांच लंबित रहने तक याचिकाकर्ताओं को फिर से निलंबित कर सके।

केस विवरण ब्लॉक केस का शीर्षक: सचिन कुमार और 2 अन्य बनाम भारत संघ और 3 अन्य

केस संख्या: रिट – ए संख्या – 38777/2015

पीठ: जस्टिस विक्रम डी. चौहान

दिनांक: 15 अप्रैल, 2026

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