शराब नीति मामला: केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को सुनवाई से हटने की मांग की, बच्चों के सरकारी वकील होने पर जताया ‘हितों का टकराव’

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक नया हलफनामा दायर कर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से खुद को मामले की सुनवाई से अलग (Recusal) करने की मांग की है। केजरीवाल ने ‘हितों के सीधे टकराव’ का आरोप लगाते हुए दावा किया है कि जज के बच्चे केंद्र सरकार के वकील के रूप में पैनल में शामिल हैं और उन्हें उसी कानूनी प्रतिष्ठान और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के माध्यम से काम मिलता है, जो इस मामले में सीबीआई की ओर से पेश हो रहे हैं।

यह पूरा मामला शराब नीति मामले में अरविंद केजरीवाल को आरोपमुक्त (Discharge) किए जाने के खिलाफ सीबीआई द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। केजरीवाल ने 14 अप्रैल को दायर अपने अतिरिक्त हलफनामे में दावा किया कि जज के परिवार के सदस्यों की पेशेवर व्यस्तताओं के बारे में उन्हें ‘नई और महत्वपूर्ण सामग्री’ मिली है, जिससे उनके मन में सुनवाई की निष्पक्षता को लेकर गंभीर आशंकाएं पैदा हो गई हैं।

केजरीवाल का हलफनामा आरटीआई (RTI) और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दस्तावेजों पर आधारित है। इसमें आरोप लगाया गया है कि जस्टिस शर्मा के बेटे को केंद्र सरकार की ओर से बड़ी मात्रा में कानूनी काम सौंपा गया है।

हलफनामे के अनुसार:

“आरटीआई से मिली जानकारी और सोशल मीडिया पोस्ट के मुताबिक, माननीय न्यायाधीश के बेटे को वर्ष 2023 में कुल 2,487 मामले, 2024 में 1,784 मामले और 2025 में 1,633 मामले आवंटित किए गए थे।”

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आम आदमी पार्टी के नेता ने जोर देकर कहा कि केंद्र सरकार के पैनल में शामिल होना केवल मानद पद नहीं है, बल्कि इसमें अदालती पेशी और वित्तीय लाभ शामिल होते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि अभियोजन पक्ष सीबीआई है और केंद्र सरकार के सबसे बड़े कानून अधिकारी उनके खिलाफ पेश हो रहे हैं, ऐसे में जज के निकटतम परिवार के सदस्यों का सरकारी पैनल में होना ‘न्यायिक अलगाव और तटस्थता’ पर सवाल उठाता है।

हितों के टकराव के दावों के अलावा, केजरीवाल ने कार्यवाही के तरीके पर भी आपत्ति जताई है। उन्होंने उल्लेख किया कि 13 अप्रैल को अदालत ने रात 7 बजे तक सुनवाई की और उन्हें अपना पक्ष (Rejoinder submissions) रखने का उचित अवसर दिए बिना ही जज के हटने वाली याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

उन्होंने यह भी कहा कि जब उनकी यह याचिका लंबित थी, तब हाईकोर्ट ने प्रभावी आदेश पारित किए जिससे सीबीआई की मुख्य याचिका पर जवाब दाखिल करने का उनका अधिकार एक सप्ताह के भीतर सीमित कर दिया गया। केजरीवाल ने यह भी याद दिलाया कि इसी बेंच ने पहले उनकी गिरफ्तारी के खिलाफ याचिका और मनीष सिसोदिया व के. कविता की जमानत याचिकाओं पर राहत देने से इनकार किया था।

सीबीआई की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केजरीवाल की इस मांग का कड़ा विरोध किया। उन्होंने केजरीवाल की चिंताओं को “अपरिपक्व दिमाग की आशंकाएं” करार दिया और हाईकोर्ट से आग्रह किया कि जज से हटने की मांग करने वालों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए।

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मेहता ने तर्क दिया कि यह “संस्थागत सम्मान” का मामला है और न्यायाधीश को किसी भी दबाव में नहीं झुकना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि “निराधार आरोपों” के आधार पर सुनवाई से हटना न्यायपालिका के लिए एक गलत मिसाल कायम करेगा।

हाईकोर्ट ने फिलहाल इस आवेदन पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

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