क्या कोई पक्ष मध्यस्थता समझौते से पीछे हटकर घरेलू हिंसा का मामला चला सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142(1) के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए एक विवाह को “शादी के अपरिवर्तनीय टूटने” (irretrievable breakdown of marriage) के आधार पर भंग कर दिया है। इसके साथ ही, कोर्ट ने उस पत्नी द्वारा शुरू की गई घरेलू हिंसा (DV) की कार्यवाही को भी रद्द कर दिया, जो मध्यस्थता के माध्यम से हुए समझौते से पीछे हट गई थी। जस्टिस विजय बिश्नोई और जस्टिस राजेश बिंदल की पीठ ने टिप्पणी की कि मध्यस्थता में तय शर्तों से विचलन करना पूरी मध्यस्थता प्रक्रिया की बुनियादी नींव पर हमला करने जैसा है।

कानूनी मुद्दा

अदालत के सामने मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या मध्यस्थता समझौते के आलोक में पत्नी द्वारा घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत शुरू की गई कार्यवाही को रद्द किया जाना चाहिए। साथ ही, क्या अदालत अनुच्छेद 142(1) के तहत शादी को भंग करने की शक्ति का प्रयोग कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया और कुछ वित्तीय व संपत्ति संबंधी शर्तों के साथ तलाक की डिक्री जारी की।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता-पति और प्रतिवादी-पत्नी का विवाह 19 फरवरी 2000 को हुआ था। वैवाहिक विवादों के कारण पति ने 2023 में तलाक की याचिका दायर की। 16 मई 2024 को, दोनों पक्षों ने दिल्ली मध्यस्थता केंद्र में एक समझौता किया, जिसमें आपसी सहमति से तलाक लेने पर सहमति बनी। समझौते के तहत, पति को दो किश्तों में ₹1.50 करोड़ और कार के लिए ₹14 लाख देने थे। इसके बदले में, पत्नी को पति के व्यावसायिक खातों को वैध बनाने के लिए ₹2,52,38,794 हस्तांतरित करने थे और कई संपत्तियों व पॉलिसियों पर अपना दावा छोड़ना था।

पति ने पहली किश्त के रूप में ₹75 लाख और कार के लिए ₹14 लाख का भुगतान कर दिया, लेकिन पत्नी बाद में आपसी सहमति से तलाक के लिए अपनी सहमति से पीछे हट गई और दूसरी मोशन (Second Motion) पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। इसके बाद उन्होंने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत शिकायत दर्ज की। दिल्ली हाईकोर्ट ने 7 जनवरी 2026 के अपने आदेश में पत्नी को ₹89 लाख जमा करने की शर्त पर कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता-पति की ओर से: पति के वकील ने तर्क दिया कि पत्नी ने ₹89 लाख और अपने गहने प्राप्त कर लिए थे, लेकिन “गलत इरादे” से केवल अधिक वित्तीय लाभ लेने के लिए दूसरी मोशन को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया। उन्होंने दलील दी कि यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। रुचि अग्रवाल बनाम अमित कुमार अग्रवाल (2005) मामले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि केवल परेशान करने के लिए दर्ज की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द की जानी चाहिए।

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प्रतिवादी-पत्नी की ओर से: पत्नी ने दावा किया कि पति ने समझौते के बाहर ₹120 करोड़ के गहने और ₹50 करोड़ के सोने के बिस्कुट लौटाने का मौखिक आश्वासन दिया था। उनका तर्क था कि उन्हें बताया गया था कि इन शर्तों को लिखित समझौते में शामिल करने से आयकर विभाग सतर्क हो जाएगा। उन्होंने सुरेशता देवी बनाम ओम प्रकाश (1991) का हवाला देते हुए तर्क दिया कि आपसी सहमति तलाक की डिक्री पारित होने तक बनी रहनी चाहिए।

अदालत का विश्लेषण

अदालत ने कर चोरी के लिए मौखिक आश्वासन के पत्नी के दावे पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की। पीठ ने कहा, “हम कानून की अदालत के सामने इस तरह की दलील पेश किए जाने के दुस्साहस से स्तब्ध हैं और कानूनी प्रणाली के प्रति प्रदर्शित इस स्पष्ट अवहेलना की निंदा करते हैं।” कोर्ट ने पाया कि पत्नी एक शिक्षित महिला है और वकील की सहायता के बावजूद उसने समझौते में इन शर्तों को शामिल करने पर जोर नहीं दिया था।

मध्यस्थता की पवित्रता पर कोर्ट ने कहा:

“मध्यस्थता में हुए समझौते की शर्तों से किसी भी तरह का विचलन, जिसे बाद में अदालत ने भी पुष्ट किया हो, उससे सख्ती से निपटा जाना चाहिए क्योंकि ऐसा विचलन मध्यस्थता की पूरी प्रक्रिया की बुनियादी नींव पर प्रहार करता है।”

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घरेलू हिंसा की कार्यवाही पर कोर्ट ने पाया कि शिकायत में हिंसा के कोई विशिष्ट आरोप नहीं थे और यह समझौता तोड़ने के बाद पति द्वारा दायर अवमानना याचिका के जवाब में केवल एक “बाद का विचार” और “पूर्व नियोजित” कदम था।

निर्णय

अदालत ने माना कि विवाह पूरी तरह टूट चुका है और अनुच्छेद 142(1) के तहत निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. घरेलू हिंसा की कार्यवाही (शिकायत संख्या 3186/2025) रद्द की जाती है और हाईकोर्ट का आदेश सेट-साइड किया जाता है।
  2. शादी भंग की जाती है, बशर्ते पति दो सप्ताह के भीतर शेष ₹70,22,871 (PPF समायोजन के बाद) का भुगतान करे।
  3. दोनों पक्ष चार सप्ताह के भीतर संपत्तियों (मैस्कॉट और नियो टाउन) और शेयरों के लिए त्याग विलेख (Relinquishment Deeds) निष्पादित करने के लिए रजिस्ट्रार के सामने पेश होंगे।
  4. पत्नी द्वारा हाईकोर्ट में जमा किए गए ₹89 लाख उन्हें ब्याज सहित वापस किए जाएंगे।
  5. पक्षों के बीच अन्य सभी दीवानी और आपराधिक कार्यवाहियाँ बंद और रद्द मानी जाएंगी, और भविष्य की मुकदमों पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।
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केस विवरण:

  • केस शीर्षक: धनंजय राठी बनाम रुचिका राठी
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1924/2026
  • पीठ: जस्टिस विजय बिश्नोई और जस्टिस राजेश बिंदल
  • दिनांक: 13 अप्रैल, 2026

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