प्रथम अपीलीय अदालत के लिए ‘प्वॉइंट्स फॉर डिटरमिनेशन’ तय करना हमेशा अनिवार्य नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 48 साल पुरानी दूसरी अपील खारिज की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 48 वर्षों से लंबित एक दूसरी अपील को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि प्रथम अपीलीय अदालत का निर्णय दिमाग के सचेत प्रयोग को दर्शाता है और सभी तर्कों का समाधान करता है, तो हर मामले में ‘प्वॉइंट्स फॉर डिटरमिनेशन’ (निर्णय के बिंदु) तैयार करना कड़ाई से अनिवार्य नहीं है।

जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 41 नियम 31 का पर्याप्त अनुपालन प्रत्येक मामले में दिए गए निर्णय की प्रकृति पर निर्भर करता है और इसका पालन न होना स्वतः ही निर्णय को शून्य नहीं बनाता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 1978 की एक दूसरी अपील (द्वितीय अपील संख्या 1905/1978) से जुड़ा है, जो पिछले 48 वर्षों से लंबित थी। इस अपील को 7 अप्रैल, 1979 को अपील के ज्ञापन में दिए गए दो मुख्य आधारों पर स्वीकार किया गया था:

  1. आदेश 41 नियम 31 CPC का उल्लंघन: यह आरोप लगाया गया था कि प्रथम अपीलीय अदालत ने निर्णय के बिंदु तय न करके अवैध रूप से कार्य किया।
  2. आर्थिक अधिकार क्षेत्र (Pecuniary Jurisdiction) का अभाव: यह तर्क दिया गया था कि मूल वाद उस अदालत (मुंसिफ) में दायर किया गया था जिसके पास अधिकार क्षेत्र नहीं था, क्योंकि वाद का मूल्यांकन 19,500 रुपये था, जो तत्कालीन 5,000 रुपये की सीमा से अधिक था।
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हाईकोर्ट ने नोट किया कि अपील के ज्ञापन में धारा 100(3) CPC के तहत कानून के महत्वपूर्ण प्रश्नों को स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया था, लेकिन मामले में अत्यधिक देरी को देखते हुए कोर्ट ने इन आधारों को ही ‘कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न’ मानकर विचार किया।

पक्षों के तर्क

अपीलकर्ताओं की ओर से श्री आर.यू. अंसारी ने दलील दी कि आदेश 41 नियम 31 CPC के प्रावधान अनिवार्य हैं। उन्होंने हाल के कानूनी घटनाक्रमों का हवाला देते हुए कहा कि प्रथम अपीलीय अदालत द्वारा निर्णय के बिंदु तय न करने से फैसला शून्य हो गया है। अधिकार क्षेत्र के संबंध में उन्होंने तर्क दिया कि मूल्यांकन की कमी को धारा 24 CPC के तहत स्थानांतरण द्वारा ठीक नहीं किया जा सकता।

सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों की ओर से कोई वकील पेश नहीं हुआ।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

अदालत ने ‘कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न’ की परिभाषा की जांच की और सुप्रीम कोर्ट के चंद्रभान (मृतक) बनाम सरस्वती (2022) मामले का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रश्न वह है जिस पर बहस की गुंजाइश हो और जिसका मामले के फैसले पर भौतिक प्रभाव पड़ता हो।

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निर्णय के बिंदु तय करने के मुद्दे पर, जस्टिस शमशेरी ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले नफीस अहमद बनाम सोइनुद्दीन (2025) का हवाला दिया। उस फैसले को उद्धृत करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“आदेश 41 नियम 31 CPC के प्रावधानों का पालन न करना, अपने आप में निर्णय को दूषित या शून्य नहीं बनाता है, और यदि इसका पर्याप्त रूप से अनुपालन किया गया है, तो इसे अनदेखा किया जा सकता है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि यह अपीलकर्ता का कर्तव्य है कि वह बताए कि निर्णय में हस्तक्षेप क्यों किया जाना चाहिए। यदि अपीलकर्ता कोई नया बिंदु नहीं उठाता है, तो अपीलीय अदालत यह कहकर अपील तय कर सकती है कि अपीलकर्ताओं ने ऐसा कुछ भी पेश नहीं किया जिससे यह साबित हो सके कि निचली अदालत का फैसला गलत था।

अधिकार क्षेत्र और मूल्यांकन के मुद्दे पर, हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने 18 अगस्त, 1973 को ही इस पर निर्णय दे दिया था। वादियों ने वाद में संशोधन कर मूल्यांकन सही कर दिया था और कमी को पूरा कर दिया था। हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि यह मुद्दा पहली अपील में नहीं उठाया गया था।

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निर्णय

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि तथ्यों के निष्कर्षों (findings of fact) को, चाहे वे गलत ही क्यों न हों, दूसरी अपील में दोबारा नहीं खोला जा सकता। रुसी फिशरीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम भावना सेठ (2026) का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा:

“…तथ्यों के निष्कर्ष चाहे कितने भी त्रुटिपूर्ण क्यों न हों, उन्हें दूसरी अपील में दोबारा नहीं देखा जा सकता, क्योंकि इसका निर्णय केवल कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न पर ही होना चाहिए।”

कानून का कोई महत्वपूर्ण प्रश्न न पाते हुए, हाईकोर्ट ने इस दूसरी अपील को खारिज कर दिया और सभी अंतरिम आदेशों को वापस ले लिया।

केस विवरण ब्लॉक:

  • केस शीर्षक: श्रीमती कमरुननिसा और अन्य बनाम श्रीमती तमीजन और अन्य
  • केस संख्या: द्वितीय अपील संख्या 1905 वर्ष 1978
  • पीठ: जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी
  • दिनांक: 10 अप्रैल, 2026

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