सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है जिसमें एक किरायेदार फर्म के खिलाफ दिए गए बेदखली (Eviction) के आदेश को पलट दिया गया था। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने रिवीजन क्षेत्राधिकार (Revisional Jurisdiction) का उल्लंघन करते हुए सबूतों की नए सिरे से जांच की। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मकान मालिक की लिखित सहमति के बिना बाहरी व्यक्तियों को पार्टनरशिप में शामिल करना ‘अवैध सब-लेटिंग’ (Unlawful Sub-letting) के दायरे में आता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद बेंगलुरु स्थित एक दुकान के पट्टे (Lease) से जुड़ा है, जो 22 फरवरी 1985 को स्वर्गीय श्री एम.वी. रामचंद्रसा (मकान मालिक) और मैसर्स महेंद्र वॉच कंपनी (किरायेदार) के बीच हुआ था। किरायेदार फर्म का प्रतिनिधित्व उसके पार्टनर राजेश कुमार (प्रतिवादी संख्या 4) कर रहे थे। 53 वर्षों के लिए किए गए इस पट्टे की शर्त संख्या 19 में स्पष्ट था कि मकान मालिक की पूर्व लिखित सहमति के बिना संपत्ति को किसी और को किराये पर (Sub-let) नहीं दिया जाएगा और न ही कब्जा सौंपा जाएगा।
मकान मालिक ने कर्नाटक रेंट एक्ट, 1999 के तहत बेदखली की याचिका दायर की। उनका आरोप था कि मूल पार्टनर अब दुकान के कब्जे में नहीं है और व्यापार पूरी तरह से बाहरी व्यक्तियों (आशीष एम. जैन और अतुल एम. जैन) द्वारा चलाया जा रहा है। ट्रायल कोर्ट ने माना कि किरायेदार ने अवैध रूप से कब्जा दूसरों को सौंप दिया है और बेदखली का आदेश दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने रिवीजन याचिका में ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को पलट दिया, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (मकान मालिक): अपीलकर्ताओं की दलील थी कि हाईकोर्ट ने कर्नाटक रेंट एक्ट की धारा 46 के तहत अपनी शक्तियों का अतिक्रमण किया है। उन्होंने हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम दिलबहार सिंह मामले का हवाला देते हुए कहा कि रिवीजन की शक्ति केवल कानूनी त्रुटियों की जांच तक सीमित है, इसमें गवाहों और सबूतों का नए सिरे से मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
प्रतिवादी (किरायेदार): किरायेदारों का कहना था कि वे 1978 से वैध किरायेदार हैं और पट्टा विलेख उन्हें पार्टनरशिप में व्यापार करने की आजादी देता है। उन्होंने दलील दी कि 1 जुलाई 2000 को फर्म के पुनर्गठन (Reconstitution) को ‘सब-लेटिंग’ नहीं माना जा सकता, क्योंकि पार्टनरशिप फर्म अपने पार्टनर्स से अलग कोई कानूनी इकाई नहीं होती। उन्होंने एसोसिएटेड होटल्स ऑफ इंडिया लिमिटेड बनाम एस.बी. सरदार रंजीत सिंह मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि जब तक मूल किरायेदार का कब्जा बना रहता है, उसे सब-लेटिंग नहीं कहा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के कानूनी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की:
1. रिवीजन क्षेत्राधिकार की सीमा
पीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 46 हाईकोर्ट को अपील की शक्तियां नहीं देती। रुक्मिणी अम्मा सरदम्मा बनाम कलियानी सुलोचना मामले का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा:
“हाईकोर्ट ‘औचित्य’ (Propriety) की जांच के बहाने मौखिक और दस्तावेजी सबूतों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसा करना अपीलीय और रिवीजन क्षेत्राधिकार के बीच के अंतर को खत्म कर देगा।”
कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने गवाहों के बयानों और पार्टनरशिप के दस्तावेजों का नए सिरे से विश्लेषण कर तथ्यात्मक निष्कर्ष निकाले, जो कानूनी रूप से गलत था।
2. ‘सब-लेटिंग’ साबित करने का बोझ
कोर्ट ने दोहराया कि हालांकि सब-लेटिंग साबित करने का शुरुआती बोझ मकान मालिक पर होता है, लेकिन एक बार जब यह साबित हो जाए कि कब्जा किसी तीसरे पक्ष के पास है, तो इसकी सफाई देने की जिम्मेदारी किरायेदार की हो जाती है। कोर्ट ने कहा:
“एक बार जब किसी अजनबी के विशेष कब्जे (Exclusive Possession) का मामला प्रथम दृष्टया बन जाता है, तो सब-लेटिंग का अनुमान लगाया जाता है और फिर इसे गलत साबित करने का भार किरायेदार पर चला जाता है।”
3. पार्टनरशिप का पुनर्गठन एक ‘मुखौटा’
कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी मूल पार्टनरशिप डीड या रिटायरमेंट डीड पेश करने में विफल रहे। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:
“तथाकथित पुनर्गठन (Reconstitution) अवैध कब्जे को छिपाने के लिए एक मुखौटे (Cloak) के अलावा कुछ नहीं है, जिसे हटाने की आवश्यकता है।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि नया पार्टनर बनाना सामान्यतः मान्य है, लेकिन यदि मूल किरायेदार अपना नियंत्रण और कानूनी कब्जा पूरी तरह छोड़ देता है, तो यह ‘सब-लेटिंग’ माना जाएगा।
फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के 2023 के फैसले को रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए बेदखली के आदेश को बहाल किया। कोर्ट ने कहा कि यह मामला कर्नाटक रेंट एक्ट की धारा 27(2)(b)(ii) और 27(2)(p) के तहत अवैध सब-लेटिंग का है। प्रतिवादियों को तीन महीने के भीतर दुकान खाली कर मकान मालिक को सौंपने का निर्देश दिया गया है।
मामले का विवरण (Case Details)
- केस शीर्षक (Case Title): श्री एम.वी. रामचंद्रसा (मृत) एलआर के माध्यम से बनाम मैसर्स महेंद्र वॉच कंपनी एवं अन्य
- केस संख्या (Case No.): सिविल अपील संख्या 4353, वर्ष 2026
- पीठ (Bench): जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन
- दिनांक (Date): 10 अप्रैल, 2026

