“सबूत का बोझ मुझ पर डालना गलत”: जस्टिस यशवंत वर्मा ने जांच समिति की कार्यवाही से खुद को किया अलग, प्रक्रियात्मक खामियों का लगाया गंभीर आरोप

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने संवैधानिक पद से इस्तीफा दे दिया है और ‘जजों की जांच समिति’ (Judges Inquiry Committee) की कार्यवाही से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया है। 9 अप्रैल 2026 को लिखे एक कड़े पत्र में उन्होंने समिति की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे “चौंकाने वाला” और “सबूत के बोझ को उलटने वाला” (reversal of the burden of proof) बताया है।

कार्यवाही से हटने के साथ ही जस्टिस वर्मा ने भारत की राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया। उन्होंने अपने पत्र में “गहरी पीड़ा” व्यक्त करते हुए कहा कि एक ऐसी अन्यायपूर्ण प्रक्रिया का हिस्सा बने रहना संस्थान के प्रति “बड़ा अनादर” होगा जो बिना किसी ठोस सबूत के उनसे जवाब मांग रही है।

यह मामला मार्च 2025 में दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के तत्कालीन सरकारी आवास, 30 तुगलक क्रिसेंट के एक स्टोररूम में आग लगने के बाद कथित नकदी मिलने से जुड़ा है। इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन-हाउस कमेटी (IHC) की जांच बिठाई गई और बाद में जजों के दुर्व्यवहार की जांच के लिए ‘जजों की जांच अधिनियम, 1968’ के तहत एक औपचारिक जांच समिति का गठन किया गया। जस्टिस वर्मा ने अब इस कार्यवाही से हाथ खींच लिए हैं, क्योंकि उनके अनुसार समिति उनके खिलाफ कोई भी ठोस आधार (prima facie case) साबित करने में विफल रही है।

पृष्ठभूमि

12 मार्च 2025 को जब जस्टिस वर्मा छुट्टियों पर थे, उनके दिल्ली स्थित आवास के एक स्टोररूम में आग लग गई थी। आग बुझाने के दौरान दिल्ली फायर सर्विस और दिल्ली पुलिस के अधिकारियों ने कथित तौर पर वहां नकदी देखी और उसके वीडियो बनाए। जस्टिस वर्मा का शुरू से यह तर्क रहा है कि वह स्टोररूम मुख्य घर से अलग था, उसका पिछला दरवाजा असुरक्षित था और वहां घरेलू स्टाफ या रखरखाव करने वाले लोगों का आना-जाना रहता था। उन्होंने स्पष्ट किया कि उस स्थान पर उनका नियंत्रण या वहां रखी वस्तुओं की उन्हें कोई जानकारी नहीं थी।

आरोप पत्र (Articles of Charge)

जांच समिति ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ तीन मुख्य आरोप तय किए थे:

  1. पहला आरोप: एक “सुरक्षित” आवास में बेहिसाब भारतीय मुद्रा रखना।
  2. दूसरा आरोप: कानूनी निरीक्षण या सीलिंग से पहले साक्ष्यों को हटाने या छेड़छाड़ करने में मौन सहमति देना।
  3. तीसरा आरोप: नकदी की मौजूदगी से इनकार कर “भ्रामक स्पष्टीकरण” देना।
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जस्टिस यशवंत वर्मा के तर्क और शिकायतें

अपने पत्र में जस्टिस वर्मा ने प्रत्येक आरोप की बुनियाद को चुनौती दी है:

  • प्रथम दृष्टया मामले का अभाव: जस्टिस वर्मा ने तर्क दिया कि “ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया जिससे साबित हो सके कि वहां मिली वस्तुएं वास्तव में असली भारतीय मुद्रा थीं।” उन्होंने यह भी कहा कि सीआरपीएफ की गवाही के अनुसार स्टोररूम वाला हिस्सा ‘सुरक्षित’ (secured) नहीं था, क्योंकि वहां का पिछला गेट खुला रहता था।
  • गवाहों को चुनिंदा तरीके से हटाना: जस्टिस वर्मा ने रेखांकित किया कि 31 गवाहों में से 22 को बिना किसी ठोस कारण के हटा दिया गया। इसमें वे वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे, जिन्होंने क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) के दौरान यह स्वीकार किया था कि नकदी को आधिकारिक रिकॉर्ड में न दर्ज करने का निर्णय वरिष्ठों द्वारा लिया गया था, वह भी तब जब जस्टिस वर्मा को आग लगने की सूचना तक नहीं थी।
  • अनुकूल सबूतों को बाहर रखना: उन्होंने आरोप लगाया कि फायर सर्विस की वैधानिक रिपोर्ट, जिसमें नकदी का कोई उल्लेख नहीं था, उसे समिति के रिकॉर्ड से बाहर रखा गया।
  • पीएसओ की विश्वसनीयता पर सवाल: जस्टिस वर्मा ने दावा किया कि उनके व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारियों (PSOs) ने फर्जी हाजिरी लगाई थी। जब उन्होंने सच्चाई जानने के लिए उनके ‘लोकेशन डेटा’ की मांग की, तो अगले ही दिन अभियोजन पक्ष ने उन तीनों पीएसओ को गवाह के रूप में हटा दिया।
  • सबूत का बोझ उलटना: जस्टिस वर्मा का कहना है कि समिति ने उन पर यह जिम्मेदारी डाल दी कि वह उन आरोपों को गलत साबित करें जिनका कोई आधार ही पेश नहीं किया गया। यह कानूनी सिद्धांतों के विपरीत “नेगेटिव (नकारात्मक) साबित करने” जैसा है।
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आरोपों का विश्लेषण

दूसरे आरोप पर जस्टिस वर्मा ने कहा कि अधिकारियों ने नकदी को जब्त न करने का फैसला 15 मार्च 2025 की रात 12:15 बजे तक ले लिया था, जबकि उन्हें घटना की जानकारी रात 1:10 बजे मिली। उन्होंने लिखा, “यह तथ्य ही मेरे किसी भी गलत काम में शामिल होने की संभावना को खत्म कर देता है।”

तीसरे आरोप (भ्रामक स्पष्टीकरण) पर उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी नकदी मिलने की बात से इनकार नहीं किया, बल्कि केवल यह कहा कि वह नकदी उनकी नहीं थी और उन्हें उसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उनके अनुसार, उनके पत्र को गलत तरीके से पढ़कर यह आरोप गढ़ा गया है।

कार्यवाही से हटने का निर्णय

जस्टिस वर्मा ने अंत में कहा कि इस कार्यवाही में हिस्सा लेना एक ऐसी प्रक्रिया को “वैधता देना” होगा जो उनसे “नामुमकिन का जवाब” मांग रही है—कि वह पैसा कहां से आया, जबकि उनका उस पैसे से कोई संबंध स्थापित ही नहीं किया गया है। उन्होंने अत्यंत भारी मन से हटने का फैसला लेते हुए उम्मीद जताई कि इतिहास इस अन्याय को याद रखेगा।

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