इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में राज्य की अधीनस्थ अदालतों और अभियोजन पक्ष को यह निर्देश दिया है कि जमानत याचिकाओं पर निर्णय लेते समय आरोपी के आपराधिक इतिहास (Criminal History) का उल्लेख अनिवार्य रूप से एक तालिका (Tabular Form) में किया जाए। जस्टिस हरवीर सिंह की एकल पीठ ने यह निर्देश नफीस उर्फ मोहम्मद नफीस की जमानत अर्जी मंजूर करते हुए जारी किए।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी के आपराधिक रिकॉर्ड को स्पष्ट और पारदर्शी बनाने के लिए यह प्रक्रिया अपनाना आवश्यक है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला बस्ती जिले के परशुरामपुर थाने में दर्ज अपराध संख्या 279/2025 से संबंधित है, जिसमें आरोपी नफीस के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115(2), 351(3), 352 और 91 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। अभियोजन का आरोप था कि आरोपी द्वारा की गई मारपीट के कारण पीड़िता सायमा बानो का गर्भपात (Early Pregnancy Loss) हो गया था। आरोपी 11 अक्टूबर, 2025 से जेल में बंद था।
चिकित्सीय रिपोर्ट के अनुसार, पीड़िता को कोई बाहरी चोट नहीं आई थी, लेकिन अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में “अर्ली प्रेग्नेंसी लॉस” की पुष्टि हुई थी।
पक्षों की दलीलें
आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि उसे इस मामले में गलत तरीके से फंसाया गया है। उन्होंने कहा कि चिकित्सा रिपोर्ट में शरीर पर कोई बाहरी चोट नहीं पाई गई। गर्भपात के संबंध में दलील दी गई कि आरोपी को पीड़िता के गर्भवती होने की कोई जानकारी नहीं थी, इसलिए चोट पहुंचाने या गर्भपात करने का कोई इरादा नहीं था। वकील ने कहा कि “इरादे के अभाव में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 91 के तहत मामला नहीं बनता।”
राज्य की ओर से ए.जी.ए. ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी ने अपने आपराधिक इतिहास को छुपाया है। शुरुआती जमानत अर्जी में आरोपी ने स्वयं को निर्दोष बताते हुए कहा था कि उसका कोई पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं है, जबकि बाद में जांच में पता चला कि उसके खिलाफ पांच अन्य मामले लंबित हैं। राज्य ने तर्क दिया कि आरोपी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट (संशोधन) नियम, 2025 का उल्लंघन किया है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
अदालत ने स्वीकार किया कि आरोपी ने पांच आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाई थी। हाईकोर्ट ने कहा, “आपराधिक मामलों के लंबित होने को छुपाकर आवेदक ने जमानत की स्वतंत्रता का लाभ उठाने की कोशिश की है।”
हालांकि, मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि पहली मेडिकल रिपोर्ट में कोई बाहरी चोट नहीं थी। गर्भपात के मुद्दे पर जस्टिस हरवीर सिंह ने टिप्पणी की कि “गर्भावस्था का तथ्य आरोपी-आवेदक की जानकारी में नहीं था, इसलिए आरोपी का पीड़िता को ऐसी शारीरिक चोट पहुँचाने का कोई इरादा नहीं था।”
कोर्ट ने आगे कहा कि आरोपी अक्टूबर 2025 से जेल में है और मामले के गुण-दोष पर अंतिम निर्णय ट्रायल का विषय है।
आपराधिक इतिहास के खुलासे पर अनिवार्य निर्देश
आपराधिक इतिहास को छिपाने की प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सभी न्यायिक अधिकारियों और अभियोजन पक्ष के लिए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- तालिका में विवरण: उत्तर प्रदेश के सभी न्यायिक अधिकारियों (सत्र न्यायाधीश/अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश) को निर्देश दिया जाता है कि जमानत अर्जी का निपटारा करते समय आदेश में आरोपी के आपराधिक इतिहास का उल्लेख ‘एक तालिका के रूप में’ (In a tabular form) करें।
- अभियोजन की जिम्मेदारी: यह राज्य/अभियोजन का कर्तव्य होगा कि वह सुनवाई के समय संबंधित आरोपी के लंबित आपराधिक मामलों या आपराधिक इतिहास का विवरण अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें।
- जवाबदेही: यदि संबंधित लोक अभियोजक या जांच अधिकारी सही तथ्य रिकॉर्ड पर रखने में विफल रहते हैं, तो मामले को प्रशासनिक अधिकारियों को संदर्भित किया जा सकता है।
- नियमों का पालन: सभी आवेदकों को निर्देश दिया गया कि वे जमानत याचिका दायर करते समय इलाहाबाद हाईकोर्ट (संशोधन) नियम, 2025 की प्रक्रिया का पालन करें और सभी मामलों का खुलासा करें।
फैसला
हाईकोर्ट ने आरोपी नफीस को सशर्त जमानत प्रदान की। कोर्ट ने आदेश दिया कि आरोपी साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा, ट्रायल में सहयोग करेगा और जेल से रिहा होने के बाद किसी भी आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं होगा।
हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार (कम्प्लायंस) को इस आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के सभी न्यायिक अधिकारियों को अनुपालन हेतु भेजने का निर्देश दिया गया है।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: नफीस उर्फ मोहम्मद नफीस बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
- केस नंबर: क्रिमिनल मिस. जमानत आवेदन संख्या 296/2026
- पीठ: जस्टिस हरवीर सिंह
- तारीख: 3 अप्रैल, 2026

