सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (JAL) के अधिग्रहण के लिए अडानी ग्रुप की ₹14,535 करोड़ की समाधान योजना पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही, अदालत ने नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के पिछले आदेशों में हस्तक्षेप नहीं किया, जिससे इस बड़े अधिग्रहण का रास्ता फिलहाल खुला हुआ है। हालांकि, कोर्ट ने कंपनी के प्रबंधन पर कुछ अस्थायी शर्तें लागू की हैं।
चीफ जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने यह आदेश दिया कि JAL की निगरानी समिति (monitoring committee) NCLAT की पूर्व अनुमति के बिना कोई भी “बड़ा नीतिगत निर्णय” नहीं ले सकेगी। अदालत का यह अंतरिम निर्देश सुनिश्चित करता है कि अंतिम कानूनी फैसले तक स्थिति यथावत बनी रहे।
सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप माइनिंग दिग्गज वेदांता लिमिटेड द्वारा दायर एक अपील के बाद आया है। वेदांता ने 25 मार्च को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें NCLAT के उस फैसले को चुनौती दी गई थी जिसने अडानी ग्रुप की बोली के कार्यान्वयन पर रोक लगाने से मना कर दिया था।
वेदांता, जो खुद दिवाला समाधान प्रक्रिया के माध्यम से JAL का अधिग्रहण करने की दौड़ में शामिल थी, ने NCLAT के समक्ष दो अलग-अलग अपील दायर की हैं। पहली अपील में समाधान योजना (resolution plan) की वैधता को चुनौती दी गई है, जबकि दूसरी अपील में लेनदारों की समिति (CoC) और नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) द्वारा दी गई मंजूरी का विरोध किया गया है।
यह विवाद पिछले साल नवंबर में शुरू हुआ था जब कर्ज में डूबी जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के लेनदारों ने अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड द्वारा प्रस्तुत समाधान योजना को मंजूरी दी थी। इसके बाद NCLT ने भी अडानी ग्रुप की बोली पर अपनी मुहर लगा दी, जिसे वेदांता ने कानूनी चुनौती दी।
सोमवार की कार्यवाही के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने वेदांता लिमिटेड और अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड दोनों को निर्देश दिया कि वे अपने दावे और तर्क NCLAT के समक्ष प्रस्तुत करें। बेंच ने मामले के त्वरित समाधान पर जोर देते हुए अपीलीय न्यायाधिकरण को याचिका और प्रति-याचिका पर तेजी से निर्णय लेने को कहा है।
NCLAT इस हाई-प्रोफाइल अधिग्रहण मामले पर 10 अप्रैल से अंतिम सुनवाई शुरू करेगा। अपीलीय न्यायाधिकरण ने वेदांता की चुनौतियों के संबंध में JAL के लेनदारों की समिति (CoC) से पहले ही जवाब मांगा है।
जब तक 10 अप्रैल की सुनवाई पूरी नहीं हो जाती और फैसला नहीं आ जाता, तब तक अडानी ग्रुप की अधिग्रहण प्रक्रिया न्यायपालिका की निगरानी में रहेगी। बड़े नीतिगत फैसलों पर लगाई गई रोक दिवाला प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करेगी।

