याचिका लंबित रहने के दौरान बालिग होने पर भी बेटी भरण-पोषण और शैक्षणिक खर्च की हकदार: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि भरण-पोषण की याचिका लंबित रहने के दौरान बेटी बालिग हो जाती है, तो केवल इस आधार पर उसे सहायता देने से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) के तहत पिता अपनी बेटी की “मानक शिक्षा” (Standard Education) के खर्चों से पल्ला नहीं झाड़ सकता।

जस्टिस गजेंद्र सिंह ने यह आदेश दो अलग-अलग क्रिमिनल रिविजनों (CRR No. 5558/2025 और CRR No. 608/2025) का निपटारा करते हुए दिया। कोर्ट ने जहां ₹50,000 से अधिक कमाने वाली पत्नी की भरण-पोषण की मांग को खारिज कर दिया, वहीं बेटी के लिए ₹15,000 प्रति माह की दर से भुगतान करने का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

पक्षकारों का विवाह 23 जनवरी 2006 को हुआ था। इस वैवाहिक संबंध से दो बच्चों का जन्म हुआ: एक बेटी (जन्म 8 दिसंबर 2007) और एक बेटा (जन्म 14 अप्रैल 2015)। वर्तमान में बेटी अपनी माँ के साथ रहती है, जबकि बेटा पिता के साथ रहता है।

14 मार्च 2024 को पत्नी ने धारा 125 Cr.P.C. के तहत आवेदन दायर कर अपने और अपनी बेटी के लिए ₹20,000 प्रति माह भरण-पोषण की मांग की थी। पत्नी ने तर्क दिया कि उसकी शिक्षिका के रूप में आय बुनियादी जरूरतों और बेटी की पढ़ाई के लिए पर्याप्त नहीं है, जबकि पति एक सिविल इंजीनियर और ठेकेदार है जो ₹2,50,000 प्रति माह कमाता है।

पक्षों के तर्क

पत्नी (याचिकाकर्ता) का तर्क था कि केवल शिक्षिका होने से उसका भरण-पोषण का अधिकार खत्म नहीं हो जाता। उन्होंने दलील दी कि फैमिली कोर्ट ने बेटी की उम्र को लेकर बहुत ही तकनीकी रुख अपनाया है, जबकि बेटी नीट (NEET) परीक्षा की तैयारी कर रही है और उस पर कोचिंग का भारी खर्च आ रहा है।

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पति (प्रतिवादी) ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा कि पत्नी ₹60,000 से ₹70,000 के बीच कमाती है, जो गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए पर्याप्त है। पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी ने उसे और उनके छोटे बेटे को छोड़ दिया है। बेटी के संबंध में पति का तर्क था कि वह अब बालिग हो चुकी है, इसलिए वह धारा 125 Cr.P.C. के तहत भरण-पोषण पाने की पात्र नहीं है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

पत्नी के दावे पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने नवंबर 2024 की उनकी सैलरी स्लिप का अवलोकन किया, जिसमें उनकी नेट सैलरी ₹52,833 पाई गई। कोर्ट ने टिप्पणी की:

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“ट्रायल कोर्ट का यह निष्कर्ष कि पत्नी अपना भरण-पोषण करने में सक्षम है, हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं रखता।”

हालांकि, बेटी के मामले में कोर्ट ने अलग रुख अपनाया। कोर्ट ने गौर किया कि जब अप्रैल 2024 में आवेदन दिया गया था, तब बेटी नाबालिग थी और वह दिसंबर 2025 में 18 वर्ष की हुई।

जस्टिस सिंह ने कहा:

“धारा 125 Cr.P.C. 1973 के अनुसार, एक नाबालिग बेटी बालिग होने तक भरण-पोषण की हकदार है। यदि भरण-पोषण का आवेदन उसकी नाबालिग अवस्था के दौरान दायर किया गया है, तो उसे केवल इस आधार पर भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता कि कार्यवाही लंबित रहने के दौरान उसने बहुमत प्राप्त कर लिया है।”

कोर्ट ने बेटी की शैक्षणिक जरूरतों, विशेष रूप से ‘सफल एकेडमी’ में नीट (NEET) की तैयारी और उसके ₹60,000 से ₹70,000 के वार्षिक शुल्क का उल्लेख किया। पिता की जिम्मेदारी पर कोर्ट ने कहा:

“भले ही वह अपने साथ रह रहे बेटे के खर्चों को वहन कर रहा है, लेकिन वह बेटी को मानक शिक्षा से वंचित नहीं कर सकता, जो भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यक है। इस स्तर पर शैक्षणिक आवश्यकताएं तुलनात्मक रूप से अधिक होती हैं।”

न्यायालय का निर्णय

हाईकोर्ट ने पत्नी और बेटी की याचिका (CRR No. 5558/2025) को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए बेटी को अप्रैल 2024 से दिसंबर 2025 तक (कुल 21 महीने) के लिए ₹15,000 प्रति माह की दर से भरण-पोषण देने का आदेश दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पति द्वारा पहले से भुगतान की गई अंतरिम राशि को इसमें समायोजित (adjust) किया जाएगा।

इसके साथ ही, पति द्वारा अंतरिम भरण-पोषण के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका (CRR No. 608/2025) को कोर्ट ने निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।

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केस विवरण:

  • केस टाइटल: श्रीमती अभिदा एवं अन्य बनाम अजय (CRR No. 5558/2025) और अजय सोलंकी बनाम श्रीमती अभिदा एवं अन्य (CRR No. 608/2025)
  • पीठ: जस्टिस गजेंद्र सिंह
  • आदेश की तिथि: 1 अप्रैल, 2026

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