दिल्ली हाईकोर्ट का निर्देश: जिला अदालतों की सुरक्षा व्यवस्था की नियमित समीक्षा करे पुलिस

 दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को पुलिस प्रशासन को राजधानी की सभी जिला अदालतों में सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता बनाए रखने और समय-समय पर इसकी ऑडिट करने का आदेश दिया है। यह निर्देश तब आया जब हाईकोर्ट ने उस ‘सुओ मोटो’ (स्वत: संज्ञान) मामले की सुनवाई पूरी की, जो इस साल की शुरुआत में तीस हजारी कोर्ट के एक कमरे के अंदर वकील पर हुए हमले के बाद शुरू किया गया था।

चीफ जस्टिस डी.के. उपाध्याय, जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस नितिन साम्ब्रे की तीन सदस्यीय बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक परिसर की सुरक्षा सर्वोपरि है और इसे पुलिस व न्यायपालिका के बीच निरंतर समन्वय के जरिए सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

इस मामले की शुरुआत 7 फरवरी को तीस हजारी कोर्ट परिसर में हुई एक अप्रिय घटना से हुई थी। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, एक वकील को उसके विपक्षी वकील ने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद करके कथित तौर पर “पीटा और परेशान” किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित वकील को हाईकोर्ट जाने की सलाह दी थी, जिसके बाद 9 फरवरी को हाईकोर्ट ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लिया। उस समय अदालत ने कोर्ट रूम जैसी जगह पर इस तरह की शारीरिक हिंसा और सुरक्षा में चूक पर गहरी चिंता व्यक्त की थी।

सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस के वकील ने बेंच को सूचित किया कि दोनों पक्षों द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर (FIR) की जांच पूरी हो चुकी है। पुलिस ने पुष्टि की कि जल्द ही ट्रायल कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी जाएगी।

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इसके अलावा, अधिकारियों ने रिपोर्ट दी कि सभी जिला अदालतों में “पर्याप्त पुलिस बल” तैनात कर दिया गया है। पुलिस ने अदालत को बताया कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रत्येक जिले में सुरक्षा बंदोबस्त (Bandobast) की व्यापक समीक्षा की गई है।

अदालत ने माना कि सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाए जा चुके हैं, इसलिए इस याचिका को लंबित रखने का अब कोई औचित्य नहीं है। हालांकि, भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बेंच ने एक सख्त दिशानिर्देश जारी किया।

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हाईकोर्ट ने आदेश दिया, “हम निर्देश देते हैं कि प्रत्येक जिला अदालत में जो सुरक्षा बंदोबस्त लागू किया गया है, उसे जारी रखा जाए। पुलिस अधिकारी संबंधित प्रिंसिपल और जिला जज के साथ परामर्श करके नियमित आधार पर इसकी समीक्षा करेंगे।”

बेंच के इस फैसले का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अदालतों की सुरक्षा केवल किसी एक घटना की तात्कालिक प्रतिक्रिया न होकर एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया बनी रहे।

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