‘अवैध खनन को बढ़ावा दे रही है सरकार’: सुप्रीम कोर्ट ने चंबल अभयारण्य की जमीन के वि-अधिसूचन पर लगाई रोक

राजस्थान सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राज्य की उस अधिसूचना पर रोक लगा दी है, जिसके तहत राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य के 732 हेक्टेयर क्षेत्र को वि-अधिसूचित (de-notify) करने का प्रयास किया गया था। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने राज्य सरकार के इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि यह अवैध बालू खनन को “सुविधाजनक” बनाने जैसा है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि अभयारण्य का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र, जो लुप्तप्राय घड़ियालों का घर है, पूरी तरह तबाह होने की कगार पर है।

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला 5,400 वर्ग किलोमीटर का एक अनूठा त्रि-राज्य संरक्षित क्षेत्र है। यह दुर्लभ घड़ियालों, लाल मुकुट वाले कछुओं (red-crowned roof turtle) और गंगा डॉल्फिन के लिए एक महत्वपूर्ण आवास है।

‘राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध बालू खनन और जलीय वन्यजीवों को खतरा’ विषय पर स्वत: संज्ञान लेते हुए सुनवाई के दौरान बेंच ने इन प्रजातियों की घटती संख्या पर गहरी चिंता व्यक्त की।

बेंच ने टिप्पणी की, “घड़ियाल अब विलुप्त होने के कगार पर हैं। न केवल घड़ियाल, बल्कि कई अन्य जलीय जीव भी संकट में हैं। हम संरक्षित प्रजातियों के लिए आरक्षित किसी भी जमीन को वि-अधिसूचित करने की अनुमति नहीं देंगे। इसका सवाल ही नहीं उठता।”

जस्टिस संदीप मेहता ने ईको-रिजर्व की रक्षा करने में राज्य की विफलता पर कड़े सवाल उठाए। उन्होंने गौर किया कि दिसंबर 2025 की अधिसूचना (जो मार्च 2026 में अधिसूचित की गई) वैधानिक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करती थी।

READ ALSO  अपने तीन बच्चों सहित पांच लोगों की हत्या करने वाले व्यक्ति के लिए हाईकोर्ट ने मृत्युदंड की पुष्टि की

जस्टिस मेहता ने कहा, “राज्य इसे अपने दम पर नहीं कर सकता था। यह अवैध है। राज्य सरकार अब मुश्किल में है।”

कोर्ट ने इस प्रवृत्ति की भी आलोचना की जहां राज्य ईको-सेंसिटिव जोन (ESZ) घोषित करने से बचते हैं ताकि जमीन को ‘राजस्व भूमि’ में बदला जा सके और उसका दोहन किया जा सके। बेंच ने उल्लेख किया कि रणथंभौर और सरिस्का जैसे अन्य संरक्षित क्षेत्रों में भी इसी तरह की समस्याएँ देखी गई हैं।

सुनवाई के दौरान क्षेत्र में “माइनिंग माफिया” के हिंसक प्रभाव पर भी चर्चा हुई। जस्टिस मेहता ने इनकी तुलना “डकैतों” से करते हुए कहा कि डकैती के पारंपरिक तरीकों की जगह अब संगठित अवैध खनन ने ले ली है।

“खौफनाक” वीडियो साक्ष्यों का हवाला देते हुए जस्टिस मेहता ने बताया कि कैसे अर्थ मूवर मशीनें बालू निकाल रही हैं और पुलिस थानों तथा खनन चौकियों के सामने से बेखौफ गुजर रही हैं। कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि राजस्थान में माइनिंग माफिया द्वारा कई सरकारी अधिकारियों, जिनमें एसडीएम (SDM), पुलिस अधिकारी और वन विभाग के कर्मचारी शामिल हैं, की हत्या कर दी गई है।

READ ALSO  Release of SC accessibility committee's report historic event: CJI Chandrachud

बेंच ने उन हलफनामों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा जिनमें यह सुझाव दिया गया था कि अवैध खनन करने वालों के पास राज्य के अधिकारियों से बेहतर हथियार हैं, “अगर राज्य सरकार कहती है कि हम अपने प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा नहीं कर सकते, तो फिर क्या होगा? यह पूर्ण अराजकता (Absolute anarchy) है।”

सुप्रीम कोर्ट ने अब निम्नलिखित निर्देश जारी किए हैं:

  • 23 दिसंबर, 2025 की अधिसूचना पर रोक लगा दी गई है, जो 732 हेक्टेयर क्षेत्र को वि-अधिसूचित करने के लिए थी।
  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में लंबित संबंधित मामलों को हाईकोर्ट के बजाय सीधे सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया है ताकि समेकित सुनवाई सुनिश्चित हो सके।
  • राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश को एमिकस क्यूरी और केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) की रिपोर्टों पर चार सप्ताह के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया गया है।
  • पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से अभयारण्य की संरक्षण स्थिति पर हलफनामा दाखिल करने को कहा गया है।
READ ALSO  साइबर जांच में सहयोग न करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर तलब

इस मामले की अगली सुनवाई 11 मई को निर्धारित की गई है।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles