ब्लैकलिस्टिंग कोई स्वाभाविक परिणाम नहीं, यह एक दंडात्मक कदम है: सुप्रीम कोर्ट ने ठेकेदार पर लगा बैन हटाया

मुख्य बिंदु:

  • अनुबंध खत्म करना सही माना गया, लेकिन ब्लैकलिस्टिंग को गलत ठहराया गया।
  • अदालत ने साफ किया कि ब्लैकलिस्टिंग के लिए अलग से नोटिस और ठोस कारणों का होना जरूरी है।
  • ठेकेदार पर लगा बैन तत्काल प्रभाव से हटा लिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट (काली सूची में डालना) करना एक “कठोर कदम” है, जिसे केवल अनुबंध खत्म (Termination) करने के तार्किक परिणाम के रूप में या यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता। 2 अप्रैल 2026 को दिए गए इस फैसले में जस्टिस पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि भले ही लापरवाही के आधार पर अनुबंध खत्म करना सही हो, लेकिन ब्लैकलिस्टिंग के लिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का स्वतंत्र रूप से पालन होना अनिवार्य है।

अदालत ने लापरवाही के पुख्ता सबूतों के आधार पर अपीलकर्ता के अनुबंधों को खत्म करने के फैसले को तो बरकरार रखा, लेकिन पांच साल की ब्लैकलिस्टिंग के आदेश को रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता, मेसर्स ए.के.जी. कंस्ट्रक्शन एंड डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड, झारखंड सरकार के पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के साथ एक पंजीकृत ठेकेदार था। 6 मार्च 2023 को उसे एक ‘एलीवेटेड सर्विस रिजर्वोायर’ (ESR) के निर्माण का ठेका मिला। निर्माण कार्य के दौरान ही 1 जून 2024 को जलाशय का ऊपरी गुंबद ढह गया।

इस घटना के बाद, विभाग ने 4 जून 2024 को एक कारण बताओ नोटिस जारी किया, जिसमें काम की खराब गुणवत्ता और लापरवाही पर स्पष्टीकरण मांगा गया। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि यह हादसा चक्रवात के कारण हुआ और उसने अपने खर्च पर दोबारा निर्माण का प्रस्ताव भी दिया। हालांकि, विभाग ने विभिन्न आईआईटी (IITs) और बीआईटी सिंदरी के विशेषज्ञों की जांच रिपोर्ट के आधार पर 23 अगस्त 2024 को एक आदेश पारित किया। इस आदेश के तहत न केवल अपीलकर्ता का अनुबंध खत्म कर दिया गया, बल्कि उसे पांच साल के लिए ब्लैकलिस्ट भी कर दिया गया।

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हाईकोर्ट ने भी विभाग के इस फैसले को सही ठहराया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

पक्षकारों के तर्क

अपीलकर्ता की दलीलें: अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री एम.एस. गणेश ने दलील दी कि अनुबंध खत्म करना और ब्लैकलिस्टिंग दोनों ही “अवैध और मनमाने” थे। उन्होंने तर्क दिया कि जांच समितियों ने ठेकेदार को अपना पक्ष रखने का मौका दिए बिना रिपोर्ट तैयार की। साथ ही, एक परियोजना में खराबी के कारण सभी मौजूदा अनुबंधों को खत्म कर देना असंगत है।

प्रतिवादी की दलीलें: झारखंड सरकार की ओर से अधिवक्ता श्री कुमार अनुराग सिंह ने तर्क दिया कि अनुबंध की सामान्य शर्तों (GCC) के क्लॉज 59 के तहत टर्मिनेशन के लिए पूर्व नोटिस की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि 4 जून का नोटिस ब्लैकलिस्टिंग के लिए पर्याप्त था क्योंकि उसमें “नियमों के अनुसार कार्रवाई” की बात कही गई थी।

अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि ब्लैकलिस्टिंग और अनुबंध खत्म करने की कार्रवाइयों के लिए “वैधता, तर्कसंगतता और आनुपातिकता के अलग-अलग मानकों” की आवश्यकता होती है क्योंकि इनके परिणाम अलग-अलग होते हैं।

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अनुबंध खत्म करने पर: पीठ ने विशेषज्ञ रिपोर्टों के आधार पर लापरवाही के निष्कर्षों को “अकाट्य” पाया। अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता को हाईकोर्ट और अपीलीय कार्यवाही के दौरान अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिला था, इसलिए टर्मिनेशन का फैसला पूरी तरह वैध है।

ब्लैकलिस्टिंग पर: अदालत ने 2012 के ठेकेदार पंजीकरण नियमों के नियम 10 का बारीकी से परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि ब्लैकलिस्टिंग के गंभीर नागरिक परिणाम होते हैं, जैसे सभी श्रेणियों में पंजीकरण रद्द होना और सुरक्षा राशि जब्त होना।

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:

“ब्लैकलिस्टिंग का निर्णय स्वचालित नहीं है और निश्चित रूप से यह अनुबंध समाप्त करने के निर्णय का कोई तार्किक परिणाम नहीं है… ये निर्णय दो अलग आयामों में काम करते हैं – टर्मिनेशन वर्तमान अनुबंध के लिए है, जबकि ब्लैकलिस्टिंग भविष्य के लिए है।”

अदालत ने इरूसियन इक्विपमेंट एंड केमिकल्स लिमिटेड बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और यूएमसी टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारतीय खाद्य निगम जैसे पुराने मामलों का हवाला देते हुए कहा कि ब्लैकलिस्टिंग “कलंक के समान” है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ब्लैकलिस्टिंग के लिए कारण बताओ नोटिस में निम्नलिखित बातें होनी चाहिए:

  1. इसमें स्पष्ट रूप से ब्लैकलिस्टिंग के दंड का प्रस्ताव होना चाहिए।
  2. नोटिस प्राप्तकर्ता को उस विशिष्ट दंड के विरुद्ध जवाब देने का सार्थक अवसर मिलना चाहिए।
  3. अंतिम आदेश में यह स्पष्ट होना चाहिए कि प्राधिकरण ने यह कठोर कदम उठाने के लिए दिमाग का इस्तेमाल (Application of Mind) किया है।
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पीठ ने पाया कि 4 जून 2024 का नोटिस इन मानकों पर खरा नहीं उतरा क्योंकि इसमें ‘ब्लैकलिस्टिंग’ शब्द का उल्लेख तक नहीं था।

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि 23 अगस्त 2024 का ब्लैकलिस्टिंग आदेश “स्पष्ट खामियों” से ग्रस्त था। हालांकि सामान्य तौर पर अदालत मामले को दोबारा नोटिस जारी करने के लिए भेजती, लेकिन चूंकि लगभग डेढ़ साल का समय बीत चुका था, इसलिए अदालत ने राहत को संशोधित किया।

कोर्ट का आदेश:

  • सभी अनुबंधों को खत्म करने का आदेश कानूनी रूप से वैध है।
  • अपीलकर्ता को ब्लैकलिस्ट करने का निर्णय अवैध और मनमाना है, जिसे तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाता है।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: मेसर्स ए.के.जी. कंस्ट्रक्शन एंड डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम झारखंड राज्य व अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील (SLP (C) No. 23858/2025 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा, जस्टिस आलोक अराधे
  • तारीख: 02 अप्रैल, 2026

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