बिना किसी ठोस कारण के स्वेच्छा से अलग रहने वाली पत्नी भरण-पोषण की हकदार नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पत्नी बिना किसी पर्याप्त या उचित कारण के अपने पति से अलग रहती है, तो वह दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण (Maintenance) प्राप्त करने की हकदार नहीं है। जस्टिस उर्मिला जोशी फालके ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि भरण-पोषण के आदेश का मुख्य आधार पति द्वारा पत्नी की “उपेक्षा या उसे संभालने से इनकार करना” होता है। यदि पत्नी स्वेच्छा से पति का साथ छोड़ती है—जैसे कि पति की सेवानिवृत्ति के बाद उसके पैतृक गाँव जाने से इनकार करना—तो वह भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती।

हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी एक महिला द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका (Revision Application) को खारिज करते हुए की। याचिकाकर्ता ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसने उसके सेवानिवृत्त पति के खिलाफ भरण-पोषण के दावे को ठुकरा दिया था।

मामले की पृष्ठभूमि

आवेदक (पत्नी) और गैर-आवेदक (पति) का विवाह 15 मई, 1985 को हुआ था। पति जिला परिषद में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में कार्यरत थे और जून 2018 में सेवानिवृत्त हुए। पत्नी ने आरोप लगाया था कि विवाह के समय से ही पति उसके साथ बुरा व्यवहार करते थे, शराब के आदी थे और उनके अन्य महिलाओं के साथ संबंध थे। पत्नी का यह भी दावा था कि सेवानिवृत्ति के बाद पति दूसरी महिला के साथ रहने लगे और उसे सरकारी आवास खाली करने को कहा, जिससे उसकी उपेक्षा हुई।

पति ने इन आरोपों का विरोध करते हुए कहा कि उन्होंने 34 वर्षों तक परिवार की जिम्मेदारी उठाई और बच्चों को शिक्षित किया। उनका तर्क था कि सेवानिवृत्ति के बाद वह मजदूरी करने के लिए अपने पैतृक गाँव ‘बारद कोपड़ा’ चले गए, लेकिन पत्नी शहरी जीवन छोड़ने को तैयार नहीं थी। पति के अनुसार, पत्नी ने स्वेच्छा से उनका साथ छोड़ा और अवैध रूप से सरकारी क्वार्टर में रह रही है।

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पक्षों की दलीलें

पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि पति को सेवानिवृत्ति के लाभ के रूप में ₹25,00,000 मिले हैं और उन्हें ₹20,000 मासिक पेंशन मिलती है, फिर भी वह अपनी पत्नी का समर्थन करने में विफल रहे। इसके अतिरिक्त, एक प्रक्रियात्मक आपत्ति भी उठाई गई कि फैमिली कोर्ट ने शपथ पत्र (Affidavit) के माध्यम से सबूत स्वीकार करके गलती की है, जो CrPC द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत है।

वहीं, पति के वकील ने दलील दी कि पत्नी ने खुद स्वीकार किया है कि वह सेवानिवृत्ति तक पति के साथ रही थी और पहले कभी दुर्व्यवहार की कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 10(3) के तहत कोर्ट को सच्चाई तक पहुँचने के लिए अपनी स्वयं की प्रक्रिया निर्धारित करने का अधिकार है।

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कोर्ट का विश्लेषण

स्वेच्छिक अलगाव और भरण-पोषण पर: जस्टिस फालके ने जोर दिया कि CrPC की धारा 125(4) के तहत, यदि पत्नी बिना किसी पर्याप्त कारण के अपने पति के साथ रहने से इनकार करती है, तो वह भरण-पोषण की हकदार नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा:

“जो पत्नी बिना किसी पर्याप्त कारण के अपने पति के साथ रहने से इनकार करती है, वह Cr.P.C. की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की हकदार नहीं है।”

सबूतों का अवलोकन करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि दंपति पति की सेवानिवृत्ति तक साथ रहे थे। पत्नी ने स्वीकार किया कि वह पूरी सेवा अवधि के दौरान पति के साथ रही और लगातार दुर्व्यवहार या पिछली किसी पुलिस शिकायत का कोई प्रमाण नहीं मिला। हाईकोर्ट ने कहा:

“सेवानिवृत्ति के बाद वह (पति) अपने पैतृक स्थान पर चले गए और आवेदक उनके साथ नहीं गई, जिससे यह निष्कर्ष निकालना पर्याप्त है कि वह पति के पैतृक स्थान पर रहने के लिए तैयार नहीं थी… इसलिए, उसने खुद को गैर-आवेदक के साथ से अलग कर लिया।”

अवैध संबंधों के आरोपों पर हाईकोर्ट ने कहा कि पति के व्यभिचारी जीवन जीने के दावे की पुष्टि के लिए “कोरे शब्दों के अलावा बिल्कुल भी सबूत नहीं है।”

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प्रक्रियात्मक वैधता पर: प्रक्रियात्मक आपत्ति को संबोधित करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट एक्ट एक विशेष कानून है जिसका उद्देश्य प्रक्रियाओं को सरल बनाना है। यह निर्धारित किया गया कि अधिनियम की धारा 10(3) और धारा 20 फैमिली कोर्ट को अपनी प्रक्रिया तैयार करने का विवेकाधिकार देती है, जो CrPC की जटिलताओं पर हावी रहती है।

“एक फैमिली कोर्ट अपनी स्वयं की प्रक्रिया निर्धारित करने का हकदार है, जैसा कि किसी दिए गए मामले के तथ्यों/परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक हो और वह CPC 1908 की प्रक्रियात्मक कठोरता से बाध्य नहीं है।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि पत्नी केवल गाँव जाने की अनिच्छा के कारण पति से अलग रही, इसलिए पति की ओर से “उपेक्षा या इनकार” का कोई मामला नहीं बनता।

“इनकार और उपेक्षा के साक्ष्य के अभाव में गैर-आवेदक भरण-पोषण का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं है।”

इन्हीं आधारों पर पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: सौ. रत्नप्रभा प्रकाश जावड़े बनाम प्रकाश ध्यानाबाजी जावड़े
  • केस नंबर: क्रिमिनल रिविजन एप्लीकेशन नंबर 14 ऑफ 2024
  • बेंच: जस्टिस उर्मिला जोशी फालके
  • तारीख: 23 मार्च, 2026

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