उपद्रव और अवरोध के मामले में रेंट एक्ट का अधिकार क्षेत्र आड़े नहीं आएगा: बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऑर्डर VII रूल 11 की अर्जी खारिज करने के फैसले को बरकरार रखा

बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि मामला सामान्य सुविधाओं में बाधा डालने या उपद्रव (nuisance) से संबंधित है, तो सिटी सिविल कोर्ट के पास सुनवाई का अधिकार सुरक्षित है, भले ही पक्षों के बीच स्मॉल कॉज कोर्ट में बेदखली (eviction) के मामले लंबित हों। जस्टिस एन. जे. जमादार ने ज़ेनोबिया आर. पूनावाला और एक अन्य द्वारा दायर सिविल रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने सिटी सिविल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी ‘ऑर्डर VII रूल 11’ (सीपीसी) के तहत वाद को खारिज करने की अर्जी नामंजूर कर दी गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद कोलाबा स्थित “रटन मनोर” नामक इमारत से जुड़ा है। इस मामले में पहली आवेदक (प्रतिवादी नंबर 1) और पहले प्रतिवादी (वादी नंबर 1) सगे भाई-बहन हैं। उनकी मां परवीन गिनवाला के निधन के बाद इमारत के मालिकाना हक और कब्जे को लेकर विवाद शुरू हुआ।

आवेदकों का दावा है कि प्रतिवादी नंबर 1 इमारत की एकमात्र मकान मालिक है और उन्होंने स्मॉल कॉज कोर्ट में कई वादियों के खिलाफ बेदखली के मुकदमे दायर किए हैं। दूसरी ओर, वादी नंबर 1 का दावा है कि 2017 में उनके दिवंगत पिता द्वारा निष्पादित एक रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड के आधार पर वह इमारत के सह-मालिक हैं।

साल 2022 में, वादियों ने सिटी सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रतिवादी उन पर दबाव बनाने के लिए लिफ्ट के उपयोग में बाधा डालने, मरम्मत कार्य रोकने और छत, पानी की टंकी तथा मीटर रूम जैसे साझा क्षेत्रों तक पहुंच बाधित करने जैसे अवैध काम कर रहे हैं। उन्होंने इन सुविधाओं के शांतिपूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा (permanent injunction) की मांग की।

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पक्षों की दलीलें

आवेदकों (प्रतिवादियों) ने सिटी सिविल कोर्ट में सीपीसी के ‘ऑर्डर VII रूल 11’ के तहत अर्जी दी। उन्होंने दलील दी कि चूंकि पक्षों के बीच मकान मालिक और किराएदार का संबंध है, इसलिए महाराष्ट्र रेंट कंट्रोल एक्ट, 1999 की धारा 33 के तहत केवल स्मॉल कॉज कोर्ट को ही इस मामले को सुनने का अधिकार है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि आवश्यक सेवाओं को रोकने से जुड़ा कोई भी विवाद रेंट एक्ट की धारा 29 के तहत आता है।

जवाब में वादियों ने कहा कि यह मुकदमा किरायेदारी के अधिकारों या कब्जे की बहाली से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह प्रतिवादियों द्वारा किए जा रहे उत्पीड़न और उपद्रव के खिलाफ एक ‘टॉर्टियस क्लेम’ (tortious claim) है। उन्होंने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि प्रतिवादी नंबर 1 ने स्वयं हाईकोर्ट के एक अन्य मुकदमे (सूट नंबर 405/2023) में वादियों को “अतिक्रमणकारी” (trespassers) बताया है और उनके साथ मकान मालिक-किरायेदार के संबंध से इनकार किया है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने इस बात की जांच की कि क्या रेंट एक्ट की धारा 33 के तहत सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर कोई रोक लागू होती है। जस्टिस जमादार ने गौर किया कि सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को बाधित करने के लिए यह जरूरी है कि मुकदमा मकान मालिक और किरायेदार के बीच हो और वह किराए की वसूली या कब्जे से संबंधित हो।

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हाईकोर्ट ने पाया कि वादियों ने खुद को “निवासी” (occupants) के रूप में पेश करते हुए मुकदमा दायर किया है, न कि बेदखली से सुरक्षा चाहने वाले किरायेदार के रूप में। हाईकोर्ट ने कहा:

“वाद के स्वर से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि इस मुकदमे में न तो कब्जे की बहाली का दावा है और न ही वादियों के कब्जे के संरक्षण की मांग की गई है… और न ही यह मामला किराए या शुल्क की वसूली से संबंधित है।”

अदालत ने आवेदकों के विरोधाभासी रुख (approbate and reprobate) पर कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने नोट किया कि एक तरफ आवेदक सिटी सिविल कोर्ट में रेंट एक्ट का हवाला दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ उन्होंने हाईकोर्ट में खुद यह दावा किया है कि किरायेदारी धोखाधड़ी से बनाई गई थी और वादी केवल “अतिक्रमणकारी” हैं।

हाईकोर्ट ने नटराज स्टूडियोज (पी) लिमिटेड बनाम नवरंग स्टूडियोज मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अधिकार क्षेत्र से जुड़े तथ्यों का निर्धारण उसी अदालत को करना चाहिए जहां प्रश्न उठा है। कोर्ट ने अब्दुल्ला बिन अली बनाम कलप्पा मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि अतिक्रमणकारियों के खिलाफ मुकदमा केवल सिविल कोर्ट में ही चल सकता है।

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हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि प्रतिवादियों ने खुद अन्य कानूनी कार्यवाहियों में वादियों के किरायेदार होने से इनकार किया है और उन्हें अतिक्रमणकारी बताया है, इसलिए वे इस आधार पर वाद को खारिज करने की मांग नहीं कर सकते कि मामला स्मॉल कॉज कोर्ट के विशेष अधिकार क्षेत्र में आता है।

हाईकोर्ट ने कहा:

“एक पक्ष को एक ही समय में दो विपरीत बातें कहने (approbate and reprobate) की अनुमति नहीं दी जा सकती… प्रतिवादियों के लिए यह स्वीकार्य नहीं होगा कि वे अपने रुख से पलट जाएं और वाद को इस आधार पर खारिज करने की मांग करें कि इस तरह का मामला स्मॉल कॉज कोर्ट के अनन्य अधिकार क्षेत्र में आता है।”

हाईकोर्ट को सिटी सिविल कोर्ट के 29 मई, 2024 के आदेश में कोई क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि या कानूनी खामी नहीं मिली और इस प्रकार सिविल रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया गया।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: ज़ेनोबिया आर. पूनावाला एवं अन्य बनाम डॉ. रुस्तम फरहाद गिनवाला एवं अन्य
  • केस नंबर: सिविल रिवीजन एप्लीकेशन नंबर 388 ऑफ 2024
  • बेंच: जस्टिस एन. जे. जमादार
  • तारीख: 24 मार्च, 2026

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