बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि जब बात “अपराध की कमाई” (proceeds of crime) की कुर्की की हो, तो प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA), कर्ज वसूली से जुड़े कानूनों जैसे SARFAESI और RDB एक्ट पर प्राथमिकता रखता है।
23 मार्च को दिए गए अपने फैसले में, जस्टिस एम.एस. जवलकर और जस्टिस नंदेश देशपांडे की खंडपीठ ने PMLA अपीलीय न्यायाधिकरण के उस पुराने आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें बैंकों को कुर्क की गई संपत्तियों से अपना बकाया वसूलने का पहला अधिकार दिया गया था।
हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या बैंकों के पहले से मौजूद ‘सिक्योर्ड इंटरेस्ट’ के कारण SARFAESI और RDB जैसे कानून PMLA के प्रभाव को कम कर सकते हैं।
कोर्ट ने जोर देते हुए कहा कि इन कानूनों के उद्देश्य पूरी तरह अलग हैं, इसलिए कर्ज वसूली कानून PMLA पर हावी नहीं हो सकते। बेंच ने टिप्पणी की:
“PMLA के कानून का उद्देश्य अन्य दो अधिनियमों—RDB एक्ट और SARFAESI एक्ट—के उद्देश्यों से अलग है, इसलिए बाद वाले कानून पहले वाले (PMLA) पर प्रभावी नहीं हो सकते।”
यह मामला 2012 में कोयला ब्लॉक आवंटन में कथित अनियमितताओं को लेकर ग्रेस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के खिलाफ केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की जांच से शुरू हुआ था। इस जांच के बाद, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने लगभग ₹24.92 करोड़ को “अपराध की कमाई” के रूप में चिन्हित किया।
2015 में, ED ने आरोपियों की अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क कर लिया। हालांकि, ये संपत्तियां कुर्की से पहले ही HDFC बैंक के पास कर्ज के बदले गिरवी रखी गई थीं।
HDFC बैंक ने PMLA अपीलीय न्यायाधिकरण में इस कुर्की को चुनौती दी थी। न्यायाधिकरण ने बैंक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था कि कर्ज वसूली कानूनों के तहत ‘सिक्योर्ड क्रेडिटर्स’ को वैधानिक प्राथमिकता प्राप्त है। ED ने इसी व्याख्या को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
ED ने दलील दी कि न्यायाधिकरण ने “अपराध की कमाई” की कुर्की को दीवानी कानूनों के तहत सरकारी बकाया की वसूली के समान मानकर गलती की है। एक विशेष दंड कानून होने के नाते, PMLA का लक्ष्य दागी संपत्ति को जब्त करना है, न कि केवल कर्ज की वसूली। ED का कहना था कि यदि इसे दीवानी वसूली कार्यवाही के अधीन कर दिया गया, तो PMLA के जब्ती वाले मूल उद्देश्य को ही नुकसान पहुंचेगा।
दूसरी ओर, बैंक का तर्क था कि चूंकि संपत्ति ED की कार्रवाई से पहले ही उनके पास गिरवी रखी गई थी, इसलिए उन्हें कानूनन प्राथमिकता मिलनी चाहिए ताकि वे अपने हितों की रक्षा कर सकें।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के रुख का उल्लेख किया और दिल्ली हाईकोर्ट के The Deputy Director, Directorate of Enforcement Delhi v. Axis Bank & Ors मामले में दी गई नजीर का समर्थन किया।
कोर्ट ने कहा:
“हम इस विचार की पुष्टि करते हैं कि PMLA के तहत कुर्की का आदेश केवल इसलिए अवैध नहीं हो जाता क्योंकि सिक्योर्ड क्रेडिटर का उस संपत्ति में पहले से कोई हित मौजूद है।”
बेंच ने साफ किया कि अलग-अलग उद्देश्यों के कारण ये कानून हर संदर्भ में एक-दूसरे को दरकिनार नहीं करते, लेकिन अपराध की कमाई की जब्ती के मामले में PMLA की विशिष्ट दंड प्रक्रिया को प्राथमिकता मिलती है।
हाईकोर्ट ने न्यायाधिकरण के आदेश को “अवैध, मनमाना और कानून के विपरीत” करार दिया। हालांकि कुर्की बरकरार रखी गई है, लेकिन कोर्ट ने बैंक को राहत के लिए एक विकल्प भी दिया है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि PMLA की धारा 4 के तहत अपराध का ट्रायल शुरू हो चुका है या जब्ती का आदेश पारित हो चुका है, तो ‘वैध हित’ का दावा करने वाले किसी भी पक्ष को अपनी अर्जी PMLA के तहत गठित विशेष अदालत (Special Court) के सामने ही लगानी होगी। इसी के साथ, हाईकोर्ट ने HDFC बैंक को विशेष अदालत के समक्ष कुर्की हटाने के लिए आवेदन करने की छूट प्रदान की।

