मुडा जमीन आवंटन मामला: हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और ईडी को जारी किया नोटिस

मैसूरु शहरी विकास प्राधिकरण (MUDA) भूमि आवंटन मामले में चल रही कानूनी लड़ाई में गुरुवार को एक नया मोड़ आया। कर्नाटक हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, लोकायुक्त पुलिस और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को नोटिस जारी किया है। यह कार्रवाई उस याचिका पर आधारित है, जिसमें मुख्यमंत्री और उनके परिवार को भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त करने वाली क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करने के निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी गई है।

जस्टिस एस. सुनील दत्त यादव की पीठ ने सामाजिक कार्यकर्ता और मामले के मूल शिकायतकर्ता स्नेहमयी कृष्णा की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कृष्णा ने बेंगलुरु की एक विशेष अदालत के 28 जनवरी के उस आदेश को रद्द करने की मांग की है, जिसमें लोकायुक्त पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया गया था। उस रिपोर्ट में कहा गया था कि मुख्यमंत्री, उनकी पत्नी बी.एम. पार्वती और दो अन्य के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं।

विवाद का मुख्य केंद्र बी.एम. पार्वती को मुडा द्वारा केसरे गांव की तीन एकड़ जमीन के बदले मुआवजे के रूप में दिए गए 14 विकसित प्लॉट हैं। शिकायत के अनुसार, पार्वती को उनके भाई द्वारा उपहार में दी गई जमीन को मुडा ने अवैध रूप से विकसित किया था। कृष्णा का आरोप है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अपने परिवार को “अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर” मुआवजा दिलाया, जिसका मूल्य मूल संपत्ति से कहीं अधिक था।

यह मामला पिछले एक साल से विभिन्न न्यायिक चरणों से गुजर रहा है:

  • 26 जुलाई, 2024: कर्नाटक के राज्यपाल ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दी थी।
  • 24 सितंबर, 2024: हाईकोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने राज्यपाल की मंजूरी को बरकरार रखा था। उन्होंने मुख्यमंत्री की चुनौती को खारिज करते हुए टिप्पणी की थी कि नियम “परिवार के पक्ष में” इस तरह से लागू किए गए कि गहन जांच आवश्यक है।
  • 28 जनवरी, 2025: एक विशेष अदालत ने मुख्यमंत्री और उनके परिवार के संबंध में लोकायुक्त की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली, हालांकि पूर्व मुडा आयुक्तों सहित अन्य आरोपियों के खिलाफ जांच जारी रखने की अनुमति दी गई।
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स्नेहमयी कृष्णा ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि विशेष अदालत ने क्लोजर रिपोर्ट को “यांत्रिक” तरीके से स्वीकार किया और संवैधानिक पद के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोपों का स्वतंत्र मूल्यांकन करने में विफल रही।

याचिका में विशेष अदालत के आदेश में “आंतरिक विसंगति” की ओर इशारा किया गया है। याचिकाकर्ता का सवाल है कि अदालत एक ओर अनियमितताओं को स्वीकार करते हुए कुछ आरोपियों के खिलाफ आगे की जांच का आदेश कैसे दे सकती है, जबकि उन्हीं अनियमितताओं के मुख्य लाभार्थियों को क्लीन चिट दे दी गई।

कृष्णा ने हाईकोर्ट से इस मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपने और पूरी प्रक्रिया की निगरानी हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश से कराने का अनुरोध किया है।

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