इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मामूली आपराधिक मामले लंबित होने पर नहीं रुकेगी सरकारी नौकरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी उम्मीदवार के खिलाफ कोई मामूली प्रकृति का आपराधिक मामला लंबित है, तो केवल इस आधार पर उसे सरकारी नौकरी देने से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि यदि उम्मीदवार ने चयन प्रक्रिया के दौरान खुद ऐसे मामले का खुलासा किया है, तो घरेलू विवादों से जुड़े सामान्य आरोपों को सरकारी सेवा के लिए अयोग्यता नहीं माना जाना चाहिए।

यह आदेश राकेश कुमार वर्मा द्वारा दायर एक सेवा याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। याचिका के अनुसार, वर्मा का चयन उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) द्वारा ‘जूनियर असिस्टेंट’ के पद पर किया गया था। वह मेडिकल जांच में भी फिट पाए गए थे, लेकिन उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला लंबित होने के कारण अधिकारियों ने उनकी नियुक्ति रोक दी थी।

याचिकाकर्ता के खिलाफ आईपीसी की धारा 498-A (पत्नी के प्रति क्रूरता), 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 504 (अपमान करना) और 506 (आपराधिक धमकी) के साथ-साथ दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत मामला दर्ज था।

याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि प्राथमिकी (FIR) के अवलोकन से पता चलता है कि इसमें दहेज की मांग को लेकर परिवार के सभी सदस्यों के खिलाफ केवल “सामान्य और व्यापक आरोप” लगाए गए थे। इसमें वर्मा की किसी विशिष्ट भूमिका का उल्लेख नहीं किया गया था।

यह भी तर्क दिया गया कि हालांकि मामले में दर्ज अपराध संज्ञेय (cognizable) थे, लेकिन वे इतनी गंभीरता के नहीं थे कि उन्हें सार्वजनिक रोजगार के लिए अनुपयुक्त माना जाए।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने मोटर दुर्घटना में मरने वाली गर्भवती ग्रहणी महिला के मुआवजे में वृद्धि की

हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति करुणेश सिंह पवार ने तथ्यों का संज्ञान लेते हुए कहा कि आरोपों की प्रकृति मामूली प्रतीत होती है और यह मामला एक घरेलू विवाद से उत्पन्न हुआ है। कोर्ट ने माना कि ऐसे छोटे मामलों का सरकारी पद के कर्तव्यों के निर्वहन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

“आरोप मामूली प्रकृति के प्रतीत होते हैं और एक घरेलू विवाद से उत्पन्न हुए हैं, जिनका संबंधित पद के कर्तव्यों के निर्वहन से कोई लेना-देना नहीं है।”

कोर्ट ने इस बात को भी रेखांकित किया कि चूंकि उम्मीदवार ने स्वयं इस मामले की जानकारी दी थी, इसलिए तथ्यों को छिपाने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। केवल वैवाहिक या घरेलू कलह से जुड़े मामलों की पेंडेंसी को रोजगार के लिए पूर्ण बाधा नहीं बनाया जाना चाहिए।

READ ALSO  अदालत आईपीसी की धारा 498ए के मामलों में अग्रिम जमानत देते समय पार्टियों को वैवाहिक जीवन बहाल करने का निर्देश नहीं दे सकती: पटना हाईकोर्ट

याचिका को स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि इस लंबित मामले के आधार पर उम्मीदवार की नियुक्ति नहीं रोकी जानी चाहिए। यह फैसला इस सिद्धांत को पुष्ट करता है कि सरकारी नौकरी के लिए उपयुक्तता का आकलन अपराध की गंभीरता और पद की आवश्यकताओं के संदर्भ में किया जाना चाहिए, न कि हर लंबित मुकदमे के आधार पर।

READ ALSO  विवाह शून्य घोषित होने के बाद कोई 'घरेलू संबंध' नहीं; महिला भरण-पोषण की हकदार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles