वकीलों के अवैध चैंबरों पर हाईकोर्ट सख्त: लखनऊ नगर निगम को तुरंत अतिक्रमण हटाने का निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने जिला और सत्र न्यायालय परिसर (पुराना हाईकोर्ट) के पास स्थित 72 अवैध अतिक्रमणों को “त्वरित गति के साथ कानूनी कदम” उठाकर हटाने का निर्देश लखनऊ नगर निगम को दिया है। इन अतिक्रमणों में मुख्य रूप से वकीलों के चैंबर और दुकानें शामिल हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हालांकि अधिकृत संरचनाओं के लिए नोटिस आम तौर पर आवश्यक है, लेकिन सार्वजनिक भूमि पर अनधिकृत अतिक्रमणों के मामले में तत्काल कार्रवाई की जा सकती है।

यह मामला अनुराधा सिंह और अन्य द्वारा दायर एक आपराधिक विविध रिट याचिका के दौरान सामने आया, जिसमें एक विशेष SC/ST जज के आदेश और एफ.आई.आर. को रद्द करने की मांग की गई थी। मामले की सुनवाई के दौरान, जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राजीव भारती की खंडपीठ ने अदालत के आसपास के क्षेत्र में अवैध निर्माणों का संज्ञान लिया। हाईकोर्ट ने अब नगर निगम को समयबद्ध तरीके से इन्हें हटाने का आदेश दिया है और आवश्यकता पड़ने पर पुलिस बल के उपयोग की अनुमति दी है। साथ ही, याचिकाकर्ताओं को उनके आपराधिक मामले में दंडात्मक कार्रवाई से अंतरिम सुरक्षा जारी रखी है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह याचिका (अनुराधा सिंह और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) विशेष जज, S.C./S.T. एक्ट, लखनऊ द्वारा 20 दिसंबर 2025 को पारित एक आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई थी। उस आदेश में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) के तहत एक आवेदन पर याचिकाकर्ताओं (दो महिला वकील और उनकी माँ) के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। उन पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115(2), 352, 324(4) और SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह एफ.आई.आर. उनके द्वारा पहले दायर की गई एक याचिका के बदले में की गई कार्रवाई (काउंटरब्लास्ट) है, जो उन्होंने शिकायतकर्ता सुजीत कुमार वाल्मीकि के सीनियर वकील द्वारा उनके आवास के पास बनाए गए अवैध चैंबर के खिलाफ दायर की थी।

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पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ताओं के लिए: श्री वी.एस. त्रिपाठी ने तर्क दिया कि आरोप “अत्यधिक असंभावित” हैं क्योंकि याचिकाकर्ता महिलाएं हैं और 30 अगस्त 2025 की कथित घटना के दौरान उनके पास कोई हथियार नहीं था। उन्होंने कहा कि विशेष जज ने “बिना दिमाग लगाए” आदेश पारित किया और यह सत्यापित नहीं किया कि क्या वास्तव में SC/ST एक्ट के तहत कोई अपराध बनता है।

प्रतिवादियों के लिए: अपर सरकारी अधिवक्ता (AGA) श्री एस.पी. सिंह और शिकायतकर्ता के वकील श्री बालकेश्वर श्रीवास्तव ने अपने हलफनामे प्रस्तुत किए। जांच अधिकारी ए.सी.पी. शकील अहमद ने अदालत को आश्वासन दिया कि जांच “कानून की उचित प्रक्रिया” के अनुसार की जाएगी।

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लखनऊ नगर निगम के लिए: श्री शैलेंद्र सिंह चौहान ने एक निरीक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें 72 अतिक्रमणकारियों की पहचान की गई थी। उन्होंने बताया कि चूंकि अधिकांश अतिक्रमणकारी वकील या दुकानदार (फोटोस्टेट, टाइपिंग और जलपान) हैं, इसलिए उन्हें हटाने के लिए औपचारिक नोटिस और पुलिस सहायता की आवश्यकता होगी।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राजीव भारती की खंडपीठ ने नगर निगम द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट और तस्वीरों की समीक्षा की। अवैध ढांचों को हटाने की कानूनी अनिवार्यता पर पीठ ने टिप्पणी की:

“यह एक स्थापित कानून (trite law) है कि, हालांकि आम तौर पर विध्वंस से पहले नोटिस की आवश्यकता होती है, विशेष रूप से अधिकृत संरचनाओं के लिए, लेकिन सार्वजनिक रास्तों, फुटपाथों या सरकारी भूमि पर अवैध, अनधिकृत अतिक्रमण के खिलाफ अक्सर बिना किसी पूर्व नोटिस के तत्काल कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे अतिक्रमणों को हटाने के लिए कानून का शासन (rule of law) तत्काल लागू किया जाना चाहिए।”

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि जिला और सत्र न्यायालय परिसर के पास की अखंडता बनाए रखने में नगर निगम की भूमिका “अत्यधिक महत्वपूर्ण” है।

अदालत का निर्णय

खंडपीठ ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए हैं:

  1. अतिक्रमण हटाओ अभियान: लखनऊ नगर निगम को त्वरित गति से कानूनी कदम उठाने का निर्देश दिया जाता है। यदि नोटिस अतिक्रमणकारियों द्वारा प्राप्त नहीं किया जाता है, तो उसे “अतिक्रमित भाग/भवन/दुकान पर चस्पा” किया जाए और क्षेत्र के प्रमुख हिंदी और अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्रों में प्रकाशित किया जाए।
  2. प्रशासनिक सहायता: हाईकोर्ट ने नगर निगम को अवैध अतिक्रमणों को हटाने के लिए “जिला प्रशासन और पुलिस से उचित सहायता” मांगने का अधिकार दिया है।
  3. अनुपालन हलफनामा: क्लास-II रैंक से ऊपर के अधिकारी को अगली सुनवाई तक की गई कार्रवाई का विवरण देते हुए हलफनामा दायर करना होगा।
  4. अंतरिम सुरक्षा: अगले आदेश तक, एफ.आई.आर. संख्या 0334/2025 के अनुसरण में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
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हाईकोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश से अगली सुनवाई के लिए पीठ गठित करने का अनुरोध किया है, जो 7 अप्रैल 2026 को दोपहर 3:30 बजे निर्धारित है।

केस विवरण

  • केस का शीर्षक: अनुराधा सिंह और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल मिसलेनियस रिट पेटिशन संख्या 713 वर्ष 2026
  • पीठ: जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राजीव भारती
  • आदेश की तिथि: 11 मार्च, 2026

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