सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि संबंधित भर्ती नियमों में ‘वेटिंग लिस्ट’ (प्रतीक्षा सूची) या ‘एडिशनल लिस्ट’ का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है, तो चयनित उम्मीदवार के कार्यभार न संभालने पर अगले उम्मीदवार द्वारा उस पद पर नियुक्ति का दावा कानूनी अधिकार के रूप में नहीं किया जा सकता।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें राज्य सरकार को एक उम्मीदवार के नाम पर विचार करने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने रेखांकित किया कि किसी पद का केवल “वास्तविक रूप से खाली होना” (factual existence of an unfilled post) स्वतः ही अगले उम्मीदवार के पक्ष में “कानूनी अधिकार” (legal right) पैदा नहीं करता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला कर्नाटक लोक सेवा आयोग (KPSC) द्वारा 2011 में 362 राजपत्रित परिवीक्षाधीन (Gazetted Probationer) पदों के लिए जारी अधिसूचना से जुड़ा है। प्रतिवादी संतोष कुमार सी. ने पूर्व सैनिक कोटे के तहत इसमें भाग लिया था।
21 मार्च, 2014 को जारी अंतिम चयन सूची में, श्री अयप्पा एम.ए. को कर्नाटक प्रशासनिक सेवा (KAS) में ‘असिस्टेंट कमिश्नर’ के पद पर चुना गया था। वहीं, संतोष कुमार का चयन ‘असिस्टेंट कमिश्नर (वाणिज्यिक कर)’ के पद पर हुआ।
अयप्पा एम.ए. ने अनिवार्य मेडिकल जांच और पुलिस सत्यापन की प्रक्रिया पूरी नहीं की और ड्यूटी पर रिपोर्ट नहीं किया। संतोष कुमार, जो पहले ही अपने पद पर कार्यभार संभाल चुके थे, ने मई 2022 में सरकार को प्रतिवेदन दिया कि चूंकि मेरिट में वे अयप्पा के ठीक नीचे हैं और उन्होंने KAS पद को प्राथमिकता दी थी, इसलिए खाली पद उन्हें दिया जाना चाहिए। विभाग द्वारा मांग ठुकराए जाने के बाद मामला ट्रिब्यूनल और फिर हाईकोर्ट पहुँचा, जहां हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में आदेश दिया था।
पक्षों के तर्क
कर्नाटक राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि चयन सूची के प्रकाशन के साथ भर्ती प्रक्रिया पूरी हो जाती है। 1997 के भर्ती नियमों के अनुसार, आयोग को केवल विज्ञापित रिक्तियों के बराबर ही सूची तैयार करनी होती है। चयनित उम्मीदवार के न जुड़ने से पैदा हुई रिक्ति को अगली भर्ती के लिए ‘नई रिक्ति’ माना जाना चाहिए।
प्रतिवादी (संतोष कुमार) का तर्क था कि चूंकि चयनित उम्मीदवार मेडिकल जांच के स्तर तक भी नहीं पहुँचा, इसलिए वह रिक्ति उसी भर्ती चक्र का हिस्सा बनी रही। उनका कहना था कि मेरिट और वरीयता के आधार पर वे उस पद के हकदार हैं।
अदालत का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने 1997 के नियमों के नियम 4(3) और नियम 11 का सूक्ष्म अवलोकन किया। कोर्ट ने पाया कि यह योजना “अधिसूचित रिक्तियों के विरुद्ध भर्ती की है” (one of recruitment against notified vacancies) न कि “उम्मीदवारों का कोई खुला जलाशय” (open-ended reservoir of candidates)।
पीठ ने टिप्पणी की:
“नियम 11… विज्ञापित सेवाओं और पदों के प्रत्येक समूह के लिए उपलब्ध रिक्तियों की संख्या के बराबर अलग-अलग सूचियां तैयार करने की बात करता है… नियम यह संकेत नहीं देता कि अधिसूचित रिक्तियों के समाप्त होने या चयन प्रक्रिया के पूर्ण होने के बाद भी इस सूची को नियुक्तियों के खुले स्रोत के रूप में चालू रखा जाए।”
कोर्ट ने आगे कहा कि 1997 के नियमों में किसी भी “रिजर्व लिस्ट, वेटिंग लिस्ट या एडिशनल लिस्ट” का प्रावधान नहीं है। ऐसे प्रावधान के अभाव में, राज्य को किसी पद को भरने के लिए सूची में “नीचे की ओर जाने” (travel further downward) के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
शंकरसन दाश बनाम भारत संघ (1991) के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया:
“चयन सूची में उम्मीदवार का नाम शामिल होने मात्र से नियुक्ति का कोई अटूट अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता। चयन सूची एक उम्मीदवार को शासी नियमों के अनुसार विचार के लिए पात्र बनाती है। यह वैधानिक ढांचे से हटकर नियुक्ति का दावा करने का कोई निहित अधिकार नहीं बनाती है।”
हाईकोर्ट के दृष्टिकोण पर कोर्ट ने कहा:
“हमारी राय में, यह दृष्टिकोण एक खाली पद के तथ्यात्मक अस्तित्व को उसे भरने के स्वीकार्य कानूनी तरीके के साथ जोड़कर भ्रमित करता है… एक बार जब नियम स्वयं सूची की सीमाओं को परिभाषित कर देते हैं और किसी रिजर्व या अतिरिक्त सूची का प्रावधान नहीं करते, तो मैदान से किसी चयनित उम्मीदवार की अनुपस्थिति सूची के वैधानिक संचालन को बढ़ा नहीं सकती।”
अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रिब्यूनल का प्रारंभिक मूल्यांकन सही था। अदालत ने माना कि वैधानिक ढांचे में प्रारंभिक आवंटन के बाद चयन सूची को संचालित करने की अनुमति नहीं है।
अदालत ने राज्य की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के 21 अप्रैल, 2025 के फैसले को रद्द कर दिया और मूल रिट याचिका खारिज कर दी।
मामले का विवरण:
- केस: कर्नाटक राज्य एवं अन्य बनाम संतोष कुमार सी.
- साइटेशन: 2026 INSC 276 (Civil Appeal No. of 2026 arising out of SLP (C) No. 35896 of 2025)
- पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
- दिनांक: 23 मार्च, 2026

