ब्राह्मणों के खिलाफ कथित ‘ब्राह्मोफोबिया’ को अपराध घोषित करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया जिसमें ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ कथित घृणास्पद भाषण को “ब्राह्मोफोबिया” बताते हुए इसे दंडनीय अपराध घोषित करने की मांग की गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी समुदाय के खिलाफ हेट स्पीच स्वीकार्य नहीं है।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि घृणास्पद भाषण का मुद्दा किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि समाज में सभी समुदायों के प्रति समान सम्मान और सहिष्णुता जरूरी है।

न्यायमूर्ति नागरथना ने कहा, “हम देश में किसी भी समुदाय के खिलाफ हेट स्पीच नहीं चाहते। यह शिक्षा, बौद्धिक विकास, सहिष्णुता और धैर्य पर निर्भर करता है। जब सभी लोग बंधुत्व की भावना का पालन करेंगे, तो अपने आप हेट स्पीच खत्म हो जाएगी।”

सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता महालिंगम बालाजी से यह भी सवाल किया कि वह केवल एक विशेष समुदाय के लिए ही संरक्षण क्यों मांग रहे हैं। पीठ ने कहा कि यदि किसी विशेष घटना में घृणास्पद भाषण हुआ है, तो उसके लिए उपयुक्त मंच पर कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन इस तरह की व्यापक मांग अदालत के समक्ष नहीं लाई जानी चाहिए।

जब याचिकाकर्ता ने कहा कि सोशल मीडिया पर न्यायपालिका को भी निशाना बनाया जा रहा है, तो अदालत ने टिप्पणी की कि वह इस तरह के हमलों को लेकर चिंतित नहीं है।

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याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की गई थी कि ब्राह्मणों के खिलाफ हेट स्पीच को जाति-आधारित भेदभाव मानते हुए उस पर तत्काल कानूनी कार्रवाई की जाए। इसके अलावा, कथित तौर पर ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए चलाए जा रहे संगठित अभियानों की जांच की भी मांग की गई थी।

याचिकाकर्ता ने यह भी अनुरोध किया था कि 1948 में महाराष्ट्र में हुई हिंसा और 1990 में कश्मीरी पंडितों के पलायन की घटनाओं की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय “ट्रुथ एंड जस्टिस कमीशन” गठित किया जाए, जो पीड़ितों और उनके परिवारों के पुनर्वास व सहायता के उपाय सुझाए।

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साथ ही, ऐसे लोक सेवकों या संवैधानिक पदाधिकारियों को अयोग्य घोषित करने की मांग भी की गई थी जो ब्राह्मणों के खिलाफ कथित रूप से घृणास्पद बयान देते हैं।

हालांकि, विस्तृत सुनवाई से पहले ही याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। इस पर अदालत ने कहा, “याचिकाकर्ता, जो स्वयं उपस्थित हुए हैं, ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी है। उनकी यह बात रिकॉर्ड पर ली जाती है। याचिका को वापस लिया गया मानते हुए खारिज किया जाता है।”

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इस प्रकार, मामले में किसी भी मुद्दे पर मेरिट के आधार पर कोई निर्णय दिए बिना ही याचिका समाप्त कर दी गई।

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