गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए 5 साल के मासूम बच्चे की कस्टडी उसकी मां को सौंपने और उसे तुरंत कनाडा वापस भेजने के निर्देश दिए हैं। जस्टिस एन.एस. संजय गौड़ा और जस्टिस डी.एम. व्यास की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि कनाडा की अदालत में कानूनी कार्यवाही लंबित होने के बावजूद, मां की सहमति के बिना बच्चे को भारत लाना पिता की ‘अवैध’ कस्टडी माना जाएगा।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले के अनुसार, दंपत्ति का विवाह 2018 में टोरंटो (कनाडा) में वहां के सिविल कानून के तहत हुआ था। 2020 में उनके बेटे का जन्म कनाडा में हुआ और वह जन्म से ही वहां का नागरिक है। वैवाहिक कलह के बाद, मार्च 2024 में पिता ने एक ईमेल के जरिए स्वीकार किया था कि शादी खत्म हो चुकी है और “कानून के अनुसार एक निश्चित उम्र तक बच्चा मां के पास ही रहना चाहिए।” इसके बाद, सितंबर 2024 से अप्रैल 2025 तक बच्चा अपनी मां के साथ ही रहा, जबकि पिता भारत में थे।
अगस्त 2025 में मां ने ओंटारियो की अदालत में बच्चे की कस्टडी और सहायता के लिए कानूनी कार्यवाही शुरू की। इस दौरान पिता ने भी अदालत में अपना जवाब दाखिल किया, लेकिन इसके तुरंत बाद 7 दिसंबर 2025 को वह मां की अनुमति के बिना बच्चे को भारत ले आए। 12 दिसंबर 2025 को ओंटारियो की अदालत ने बच्चे को वहां का ‘अभ्यस्त निवासी’ (Habitual Resident) मानते हुए उसे वापस लाने का आदेश दिया। इसके बाद मां ने गुजरात हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर की थी।
पक्षों की दलीलें
मां की ओर से: मां के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि विवाह कनाडा के कानून के तहत हुआ था, इसलिए दोनों पक्ष वहां की अदालतों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। उन्होंने कहा कि पिता ने एक अनौपचारिक व्यवस्था का उल्लंघन किया और विदेशी अदालत के आदेश की अवहेलना करते हुए बच्चे को भारत लाए, जो पूरी तरह से गैर-कानूनी है।
पिता की ओर से: पिता के वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि चूंकि दोनों पक्ष हिंदू हैं, इसलिए कस्टडी का फैसला हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम (HMGA) के तहत होना चाहिए, न कि कनाडा के कानून के अनुसार। उन्होंने तर्क दिया कि भारत आते समय पिता पर कोई कानूनी रोक नहीं थी। साथ ही, उन्होंने मां की जीवनशैली पर सवाल उठाते हुए दावा किया कि बच्चे का भविष्य भारत में एक संयुक्त परिवार के बीच अधिक सुरक्षित है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने इस मामले में दो मुख्य पहलुओं पर विचार किया: क्या पिता की कस्टडी अवैध है और बच्चे का सर्वोत्तम हित (Best Interest) किसमें है।
अवैध कस्टडी पर: कोर्ट ने पिता द्वारा मार्च 2024 में भेजे गए ईमेल का संज्ञान लिया, जिसमें उन्होंने खुद बच्चे को मां के पास रखने की सहमति दी थी। हाईकोर्ट ने कहा:
“यदि पिता ने एक निर्विवाद समय पर स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया था कि बच्चा मां के पास रह सकता है और यह कानून के अनुसार है, तो अब वह यह दावा नहीं कर सकते कि बच्चे का सर्वोत्तम हित मां के बजाय उनके साथ रहने में है।”
कोर्ट ने पिता के ‘संयुक्त कस्टडी’ के दावे को खारिज करते हुए कहा कि जब पिता 2024 में भारत आ गए थे, तब से बच्चा केवल मां की देखरेख में था। साथ ही, ओंटारियो की अदालत में कार्यवाही में हिस्सा लेने के बाद उसके अधिकार क्षेत्र को चुनौती देना गलत है।
बच्चे के सर्वोत्तम हित पर: बच्चे के भविष्य पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चा जन्म से ही कनाडा के माहौल में पला-बढ़ा है। बेंच ने कहा:
“बच्चे को अचानक कनाडा से भारत लाना और उसे उसकी मां से दूर करना उसके लिए मानसिक रूप से कष्टदायक (Traumatic) होगा। वह जिस सुरक्षित माहौल में रहा है, उसे बदलकर एक ऐसे अनजान माहौल में लाना जहां उसके लिए सब अजनबी हों, उसके विकास के लिए सही नहीं है।”
कोर्ट ने पिता द्वारा मां के चरित्र पर लगाए गए आरोपों को भी यह कहकर खारिज कर दिया कि पिता इन बातों से पहले से वाकिफ थे और तब उन्होंने खुद ही कस्टडी मां को सौंपी थी।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:
- पिता को निर्देश दिया जाता है कि वह बच्चे की कस्टडी तुरंत मां या उसके अधिकृत प्रतिनिधि (दादा) को सौंपें।
- मां या दादा को हाईकोर्ट की रजिस्ट्री से बच्चे का पासपोर्ट और ओसीआई (OCI) कार्ड प्राप्त कर उसे कनाडा ले जाने की अनुमति दी जाती है।
- पिता यदि चाहें तो कनाडा की संबंधित अदालत में जाकर मुलाकात के अधिकार या कस्टडी के लिए कानूनी गुहार लगा सकते हैं।
हाईकोर्ट ने पिता को सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का समय देने के लिए इस आदेश पर दो सप्ताह की रोक लगाई है, बशर्ते इस दौरान मां और दादा को बच्चे से मिलने और ऑनलाइन बात करने की सुविधा मिलती रहे।
केस विवरण
- केस टाइटल: तिलाना श्रीपाल शाह बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य
- केस नंबर: R/Special Criminal Application (Habeas Corpus) No. 17368 of 2025
- बेंच: जस्टिस एन.एस. संजय गौड़ा और जस्टिस डी.एम. व्यास
- दिनांक: 18 मार्च, 2026

