सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी अभियुक्त पर केवल भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) के तहत आरोप तय किए गए हैं, तो उसे अपहरण (धारा 364) के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। उत्तर प्रदेश सरकार की अपील को खारिज करते हुए जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि ये दोनों अपराध “स्वतंत्र और अलग” (separate and distinct) हैं और इन्हें एक-दूसरे का ‘कॉग्नेट’ या छोटा अपराध नहीं माना जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 25 नवंबर 1998 को अभियुक्त राम स्वरूप उर्फ बरकत, शिकायतकर्ता पूरन के घर आया और उसके बेटे दिनेश को फिल्म देखने के बहाने अपने साथ ले गया। अगले दिन दिनेश का शव बरामद हुआ जिस पर गोलियों के निशान थे। इसके बाद अभियुक्त के खिलाफ धारा 302 के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई।
27 जून 2006 को ट्रायल कोर्ट (फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या – 1) ने हत्या के आरोप में सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया, लेकिन राम स्वरूप को धारा 364 IPC के तहत दोषी ठहराया। ट्रायल कोर्ट का तर्क था कि भले ही हत्या का आरोप साबित न हुआ हो, लेकिन अभियुक्त द्वारा मृतक को घर से ले जाने की बात साबित हुई है, जो अपहरण की सजा के लिए पर्याप्त है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 4 मार्च 2009 को इस सजा को रद्द कर दिया, जिसके खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
पक्षकारों की दलीलें
उत्तर प्रदेश राज्य के वकील श्री गौतम शिवशंकर ने तर्क दिया कि धारा 364 IPC, धारा 302 का ही एक ‘कॉग्नेट’ अपराध है। उन्होंने सीआरपीसी (Cr.P.C.) की धारा 222 का हवाला देते हुए कहा कि यदि बड़े अपराध का आरोप तय किया गया है, तो उन्हीं तथ्यों के आधार पर अभियुक्त को छोटे अपराध के लिए बिना अलग आरोप तय किए भी सजा दी जा सकती है। उन्होंने इस संबंध में रफीक अहमद उर्फ रफी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले पर भरोसा जताया।
वहीं, अभियुक्त के वकील श्री जगजीत सिंह छाबड़ा ने हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि धारा 364 और धारा 302 स्वतंत्र अपराध हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जब ट्रायल कोर्ट ने खुद माना कि अभियुक्त का कोई मकसद (motive) साबित नहीं हुआ है, तो धारा 364 के तहत सजा का कोई आधार नहीं बचता।
अदालत का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से इस बात पर विचार किया कि क्या धारा 364 को धारा 302 का “छोटा अपराध” (minor offence) माना जा सकता है। पीठ ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 222 के तहत किसी को बिना आरोप के तभी सजा दी जा सकती है जब अपराध ‘कॉग्नेट’ हों, यानी उनके मुख्य तत्व (ingredients) समान हों।
शमसाहब एम. मुल्तानी बनाम कर्नाटक राज्य के मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा:
“केवल तभी जब दो अपराध कॉग्नेट अपराध हों, जिनमें मुख्य तत्व समान हों, उनमें से कम सजा वाले अपराध को दूसरे अपराध के सापेक्ष छोटा अपराध माना जा सकता है।”
वर्तमान मामले में पीठ ने पाया कि धारा 364 के घटक धारा 302 से पूरी तरह अलग हैं। अदालत ने कहा:
“धारा 302 के साथ तुलना करने पर यह स्पष्ट होता है कि ये स्वतंत्र और अलग अपराध हैं और किसी भी तरह से इन्हें कॉग्नेट अपराध नहीं माना जा सकता।”
अदालत ने यह भी पाया कि शिकायत या गवाहों के बयानों में ऐसा कोई संकेत नहीं था कि अभियुक्त ने दिनेश को जबरन घर से उठाया था या उसका अपहरण किया था।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला पूरी तरह सही था। अदालत ने कहा कि चूंकि धारा 364 के लिए कोई औपचारिक आरोप तय नहीं किया गया था और इसके कानूनी तत्व हत्या के आरोप से अलग हैं, इसलिए अभियुक्त को इस धारा में दोषी ठहराना गलत था। इसी के साथ राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी गई।
मामले का विवरण:
- केस का नाम: उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राम स्वरूप उर्फ बरकत
- अपील संख्या: 2012 की क्रिमिनल अपील संख्या 443
- पीठ: जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
- दिनांक: 18 मार्च, 2026

