किन्नर समुदाय को ‘बधाई’ वसूलने का कोई मौलिक या प्रथागत अधिकार नहीं; अदालतें ऐसी वसूली को वैध नहीं ठहरा सकतीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने किन्नर समुदाय के एक सदस्य द्वारा ‘बधाई’ (पारंपरिक उपहार) एकत्र करने के लिए क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के निर्धारण की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार की धन वसूली का कोई कानूनी आधार नहीं है और संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत इसे वैध नहीं माना जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले की रहने वाली और किन्नर समुदाय से ताल्लुक रखने वाली याचिकाकर्ता रेखा देवी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में मांग की गई थी कि राज्य सरकार को कर्नलगंज के ‘कटी का पुल’ (जरवल कस्बा) से लेकर ‘घाघरा घाट’ और ‘सरयू ब्रिज’ तक के क्षेत्र को उनके ‘बधाई’ या ‘जजमानी’ अधिकार के लिए सीमांकित और घोषित करने का निर्देश दिया जाए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि क्षेत्र का निर्धारण होने से भविष्य में विवादों को रोका जा सकेगा।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता की ओर से वकील संगीता वर्मा ने दलील दी कि उनका समुदाय कई वर्षों से परिभाषित क्षेत्रों में शुभ अवसरों पर ‘बधाई’ एकत्र करने के पारंपरिक प्रथागत/जजमानी अधिकारों का प्रयोग कर रहा है। यह कहा गया कि गोंडा जिले में अन्य किन्नर भी बधाई वसूल रहे हैं और वे एक-दूसरे के क्षेत्रों का अतिक्रमण कर रहे हैं, जिससे आपसी रंजिश पैदा हो रही है। याचिका में दावा किया गया कि इस वजह से जानलेवा हमलों और मारपीट की घटनाएं भी हुई हैं।

याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत अपने मौलिक अधिकारों के संरक्षण की मांग की, ताकि वह बिना किसी हिंसा के डर के अपना काम (बधाई संग्रह) जारी रख सके।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने इस मामले में दो मुख्य कानूनी सवाल उठाए: पहला, क्या याचिकाकर्ता के पास बधाई/जजमानी वसूलने का कोई मौलिक अधिकार है जिसे अदालतों द्वारा संरक्षित किया जा सके, और दूसरा, क्या याचिका स्वीकार करने का अर्थ उनके इस काम को कानूनी वैधता प्रदान करना होगा।

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हाईकोर्ट ने कहा कि कानून के अनुसार किसी भी व्यक्ति से पैसा, टैक्स या शुल्क वसूलने का कोई कानूनी आधार नहीं है। खंडपीठ ने टिप्पणी की:

“याचिकाकर्ता द्वारा मांगे गए ऐसे अधिकारों को कानून द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है और तदनुसार अदालत संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी शक्ति का उपयोग करते हुए कानूनी समर्थन के बिना याचिकाकर्ता के कृत्यों को वैध नहीं ठहरा सकती।”

धन की वसूली के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा:

“किसी भी व्यक्ति से जानबूझकर या अन्यथा धन की वसूली की अनुमति नहीं दी जा सकती है और इस देश के किसी भी नागरिक को केवल टैक्स, उपकर या शुल्क की उतनी ही राशि का भुगतान करने के लिए निर्देशित किया जा सकता है जो कानून के अनुसार वैध रूप से वसूली जा सकती हो।”

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हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के प्रावधानों में भी ऐसे किसी अधिकार को संरक्षण नहीं दिया गया है। अदालत ने संसद में विचाराधीन 2026 के नए विधेयक का भी उल्लेख किया, लेकिन स्पष्ट किया कि ऐसी वसूली को किसी भी स्थिति में वैध नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि इस मामले में कोई रियायत दी गई, तो इससे कई अन्य गिरोह या लोग सक्रिय हो सकते हैं जो अवैध वसूली या रंगदारी कर रहे हैं। अदालत ने कहा कि ऐसी वसूली को इस देश में कानून द्वारा कभी मंजूरी नहीं दी गई है और यह भारतीय न्याय संहिता के तहत एक अपराध है।

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निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिका आधारहीन है और इसे खारिज कर दिया गया।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: रेखा देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (Rekha Devi Versus State Of U.P. Thru. Prin. Secy. (Home Deptt.) Lko. And 6 Others)
  • केस नंबर: WRIT-C No.3495 of 2026
  • पीठ: जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय
  • दिनांक: 15 अप्रैल, 2026

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