बॉम्बे हाईकोर्ट ने कर्ज न चुकाने वाले डिफॉल्टरों और गारंटरों द्वारा इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के प्रावधानों के दुरुपयोग पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। कोर्ट ने कहा कि डिफॉल्टर कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए ‘मोरेटोरियम’ (रोक) का इस्तेमाल एक ‘सुरक्षा कवच’ (Cloak of Immunity) के रूप में कर रहे हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था और व्यावसायिक माहौल के लिए बेहद हानिकारक है।
जस्टिस मनीष पितले और जस्टिस श्रीराम शिरसाट की खंडपीठ ने बुधवार को दिए एक आदेश में कहा कि डिफॉल्टरों की ऐसी रणनीतियां न केवल सुरक्षित लेनदारों (Secured Creditors) के कानूनी कदमों को पंगु बना देती हैं, बल्कि IBC के मूल उद्देश्यों को भी विफल करती हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कानूनी प्रावधानों का दुरुपयोग न्याय की विफलता का कारण बनता है, तो कोर्ट ‘मूक दर्शक’ बनकर नहीं रह सकता।
यह मामला दक्षिण मुंबई की एक संपत्ति की नीलामी से जुड़ा है। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने कर्जदारों को 6.25 करोड़ रुपये की क्रेडिट सुविधा दी थी, जिसके बदले इस संपत्ति को गिरवी रखा गया था। कर्ज न चुका पाने पर बैंक ने ‘सरफेसी एक्ट’ (SARFAESI Act) के तहत वसूली की प्रक्रिया शुरू की।
बैंक द्वारा कई अवसर दिए जाने के बाद भी जब बकाया नहीं चुकाया गया, तो नवंबर 2024 में संपत्ति की नीलामी की गई। याचिकाकर्ता रोजीना फिरोज हियानी और अन्य सफल बोलीदाता रहे और उनके पक्ष में ‘सेल सर्टिफिकेट’ भी जारी कर दिया गया।
हालांकि, नीलामी पूरी होने के बाद कर्जदारों ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) का दरवाजा खटखटाया और IBC के तहत दिवाला समाधान प्रक्रिया शुरू कर दी। उन्होंने दावा किया कि अंतरिम मोरेटोरियम लागू हो गया है। इसके आधार पर, जनवरी 2025 में डेट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) ने संपत्ति के रजिस्ट्रेशन पर रोक लगा दी, जिससे पूरी प्रक्रिया अटक गई।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में एक ‘परेशान करने वाले चलन’ (Disturbing Trend) का जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि अक्सर कर्जदार तब तक शांत बैठे रहते हैं जब तक बैंक नीलामी की प्रक्रिया पूरी नहीं कर लेता। जैसे ही कोई नया खरीदार (Auction Purchaser) सामने आता है, डिफॉल्टर अचानक IBC के तहत मोरेटोरियम का सहारा लेकर पूरी प्रक्रिया को ठप कर देते हैं।
अदालत ने कहा:
“डिफॉल्टर और कर्जदार जिस तरह से IBC के प्रावधानों का सहारा ले रहे हैं, वह इस कानून के मूल उद्देश्य को विफल कर रहा है। यह सुरक्षित लेनदारों द्वारा उठाए गए कानूनी कदमों को पूरी तरह पंगु बना देता है।”
हाईकोर्ट ने आगे कहा कि ऐसी स्थिति में लेनदारों और खरीदारों को पहले NCLT, फिर NCLAT और अंत में सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ लगानी पड़ती है, जिससे वे पूरी तरह हताश हो जाते हैं। यह सिलसिला देश की वित्तीय सेहत और व्यापारिक वातावरण को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है।
इस विशेष मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि बैंक द्वारा ‘सेल सर्टिफिकेट’ (बिक्री प्रमाणपत्र) कर्जदारों द्वारा NCLT में याचिका दायर करने से पहले ही जारी किया जा चुका था। ऐसी स्थिति में, बाद में शुरू हुआ मोरेटोरियम पहले से संपन्न हो चुकी नीलामी प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट ने DRT के पुराने आदेश को रद्द कर दिया और बैंक को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं के पक्ष में नीलामी और सेल सर्टिफिकेट के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाए।

