मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सेना अधिकारी पर दर्ज बलात्कार FIR रद्द की, कहा—संबंध सहमति से था, विवाद के बाद दर्ज हुई शिकायत

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक सेना अधिकारी के खिलाफ दर्ज बलात्कार के मामले को रद्द कर दिया है। अदालत ने पाया कि महिला पुलिसकर्मी और अधिकारी के बीच लंबे समय तक सहमति से संबंध रहे और शिकायत संबंध बिगड़ने के बाद दबाव बनाने के उद्देश्य से दर्ज की गई प्रतीत होती है।

न्यायमूर्ति विनय सराफ की एकल पीठ ने 11 मार्च को पारित आदेश में भोपाल के महिला थाना में पिछले वर्ष दर्ज FIR को निरस्त कर दिया। यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 और 351(2) के तहत दर्ज किया गया था।

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि शिकायत संबंध टूटने के बाद दर्ज की गई लगती है। कोर्ट ने टिप्पणी की, “ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता (सेना अधिकारी) और शिकायतकर्ता (पुलिसकर्मी) के बीच संबंध विफल होने के कारण, शिकायतकर्ता ने याचिकाकर्ता पर दबाव बनाने के लिए यह FIR दर्ज कराई है।”

पीठ ने यह भी कहा कि दोनों के बीच लंबे समय तक चले संबंध को देखते हुए यह मानना कठिन है कि शारीरिक संबंध केवल झूठे विवाह के वादे पर आधारित थे। अदालत ने कहा, “इस परिस्थिति में यह स्पष्ट है कि यह बलात्कार का मामला नहीं, बल्कि सहमति से बना संबंध है।”

हाईकोर्ट ने आगे कहा कि FIR दर्ज करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग प्रतीत होता है। अदालत ने पाया कि FIR में ऐसे कोई तथ्य नहीं हैं जिनसे BNS की धारा 69 या 351(2) के तहत अपराध सिद्ध हो सके। आदेश में कहा गया, “अदालत को FIR में ऐसा कोई तत्व या सामग्री नहीं मिलती जिससे इन धाराओं के तहत अपराध बनता हो।”

FIR के अनुसार, पुलिसकर्मी की मुलाकात 23 दिसंबर 2012 को भोपाल के शाहजहानाबाद क्षेत्र स्थित आर्मी कैंटीन में सेना अधिकारी से हुई थी। इसके बाद दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई और संबंध विकसित हुआ।

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि अधिकारी ने खुद को अविवाहित बताया और विवाह का वादा किया, जिसके आधार पर दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने। बाद में वर्ष 2013 में महिला को पता चला कि अधिकारी पहले से विवाहित है।

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इस पर पूछताछ करने पर अधिकारी ने कथित रूप से अपनी पत्नी के साथ संबंध खराब होने की बात कही और भविष्य में तलाक लेकर विवाह करने का आश्वासन दिया। दोनों के बीच यह संबंध कई वर्षों तक जारी रहा।

शिकायतकर्ता के अनुसार, वर्ष 2025 में उसे पता चला कि अधिकारी अन्य महिलाओं से भी संपर्क में था और उन्हें भी इसी तरह के आश्वासन दे रहा था। इसके बाद कथित रूप से उसे धमकी दी गई, जिसके चलते उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

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सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मामला आपराधिक अपराध नहीं बनता और FIR को निरस्त कर दिया।

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