दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रिंसिपाल कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स बनाम बोइंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड मामले में विभाग की अपील को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई कंपनी विलय (amalgamation) के कारण अपना अस्तित्व खो चुकी है, तो उसके नाम पर जारी किया गया असेसमेंट ऑर्डर एक गंभीर कानूनी खामी (substantive illegality) है। कोर्ट ने कहा कि इनकम टैक्स एक्ट की धारा 292B के तहत ऐसी बड़ी गलती को सुधारा नहीं जा सकता।
जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस विनोद कुमार की खंडपीठ ने कहा कि जब विभाग को विलय की जानकारी पहले ही दे दी गई थी, तो असेसमेंट ऑर्डर नई कंपनी के नाम पर जारी किया जाना चाहिए था। कोर्ट ने विभाग की उस दलील को भी नकार दिया जिसमें कहा गया था कि ‘इनकम टैक्स बिजनेस एप्लीकेशन’ (ITBA) पोर्टल में तकनीकी खराबी के कारण यह गलती हुई।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद असेसमेंट ईयर (AY) 2016-17 से जुड़ा है। 29 नवंबर 2016 को ‘बोइंग इंटरनेशनल कॉर्पोरेशन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ (BICIPL) ने अपना इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल किया था। इसके बाद, 27 फरवरी 2018 को एक मर्जर स्कीम के तहत BICIPL का विलय ‘बोइंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ (BIPL) में हो गया।
रिकॉर्ड के अनुसार, 10 अप्रैल 2018 को ही विभाग को इस विलय की जानकारी दे दी गई थी। इसके बावजूद, असेसमेंट ऑफिसर (AO) ने 30 मार्च 2021 को पुरानी कंपनी (BICIPL) के नाम और पैन (PAN) पर ही फाइनल असेसमेंट ऑर्डर जारी कर दिया। इनकम टैक्स अपीलीय ट्रिब्यूनल (ITAT) ने इस आदेश को ‘अवैध’ करार देते हुए रद्द कर दिया था, जिसके खिलाफ विभाग ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (इनकम टैक्स विभाग): विभाग की ओर से सीनियर स्टैंडिंग काउंसिल श्री देबेश पांडा ने तर्क दिया कि शुरुआती नोटिस सही नाम पर जारी किया गया था। उन्होंने दावा किया कि फाइनल असेसमेंट ऑर्डर में पुराना नाम केवल ITBA पोर्टल की ‘तकनीकी खराबी’ (technical glitch) की वजह से आया। उनके अनुसार, सिस्टम में एक बार जो नाम दर्ज हो जाता है, वह आगे की प्रक्रियाओं में अपने आप दिखाई देता है। विभाग ने इसे धारा 292B के तहत एक ‘प्रक्रियात्मक सुधार योग्य गलती’ बताया।
प्रतिवादी (बोइंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड): बोइंग की ओर से सीनियर एडवोकेट श्री सचित जॉली ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा मारुति सुजुकी मामले में यह कानून पहले ही तय किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि जब AO को विलय की सूचना मिल चुकी थी, तो पुरानी कंपनी के नाम पर आदेश जारी करना अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले असेसमेंट ईयर (2015-16) में विभाग ने इसी पोर्टल के जरिए सही नाम से आदेश जारी किया था, इसलिए तकनीकी खराबी की दलील निराधार है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने पाया कि असेसमेंट ऑर्डर ड्राफ्ट करने से बहुत पहले ही विभाग को विलय की जानकारी थी। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि तकनीकी समस्याओं का बोझ करदाता पर नहीं डाला जा सकता:
“किसी करदाता (assessee) को ITBA पोर्टल की खामियों या उसके सही से काम न करने के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता। यह पूरी तरह से विभाग की जिम्मेदारी है।”
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के मारुति सुजुकी (2020) फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अस्तित्वहीन कंपनी के खिलाफ असेसमेंट ऑर्डर जारी करना कोई छोटी प्रक्रियात्मक चूक नहीं, बल्कि एक बुनियादी अवैधता है। विभाग द्वारा पेश किए गए महागुन रियल्टर्स मामले को अलग बताते हुए कोर्ट ने कहा:
“महागुन रियल्टर्स के विपरीत, वर्तमान मामले में प्रतिवादी ने असेसमेंट ऑर्डर पारित होने से बहुत पहले ही विभाग को विलय की सूचना दे दी थी।”
कोर्ट ने स्पाइस एंटरटेनमेंट (2012) मामले का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि विलय के बाद पुरानी कंपनी के खिलाफ कार्यवाही एक ‘मृत व्यक्ति’ के खिलाफ कार्यवाही करने जैसा है।
अंतिम निर्णय
दिल्ली हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि टैक्स मामलों में निरंतरता और स्पष्टता जरूरी है। अपील खारिज करते हुए खंडपीठ ने टिप्पणी की:
“ITBA पोर्टल की खामियों के संबंध में, विभाग को इस अवसर का उपयोग अपने सिस्टम को सुधारने के लिए करना चाहिए ताकि ऐसी तकनीकी समस्याएं असेसमेंट प्रक्रिया को दूषित न करें।”
कोर्ट ने ITAT के उस फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया जिसमें असेसमेंट को रद्द कर दिया गया था।
केस विवरण
केस का नाम: प्रिंसिपाल कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स-1 बनाम बोइंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड
केस नंबर: ITA 586/2025
पीठ: जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस विनोद कुमार
दिनांक: 16 मार्च, 2026

