सार्वजनिक स्थान पर बैग और पर्स की तलाशी NDPS एक्ट की धारा 43 के दायरे में, धारा 50 लागू नहीं होगी: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नशीली कफ सिरप की व्यावसायिक मात्रा रखने के आरोप में चार व्यक्तियों की सजा और 15 साल के कठोर कारावास को बरकरार रखा है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) एक्ट की धारा 50 के तहत दी गई प्रक्रियात्मक सुरक्षा केवल व्यक्ति की शारीरिक तलाशी (Personal Search) पर लागू होती है, न कि सार्वजनिक स्थान पर अभियुक्त द्वारा ले जाए जा रहे बैग, पर्स या कंटेनर की तलाशी पर।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 13 सितंबर 2023 को थाना तोरवा (बिलासपुर) के उप-निरीक्षक भरत लाल राठौर (PW-10) को गुप्त सूचना मिली थी कि शोभा विहार के पास कुछ लोग अवैध बिक्री के लिए नशीली कफ सिरप लेकर मौजूद हैं। छापेमारी दल ने मौके पर चार व्यक्तियों—श्रीमती स्नेहा गोयल, पुष्पेंद्र निर्मलकर, अमर जांगड़े और देवा रजक को रोका।

तलाशी के दौरान, पुलिस ने उनके पास मौजूद बैग और पर्स से कोडीन (Codeine) युक्त कफ सिरप की कुल 175 बोतलें बरामद कीं। स्नेहा गोयल से 100 बोतलें, पुष्पेंद्र से 25, अमर जांगड़े से 30 और देवा रजक से 20 बोतलें बरामद की गईं। विशेष न्यायाधीश (NDPS एक्ट), बिलासपुर ने 30 जनवरी 2025 को सभी को धारा 21(c) के तहत दोषी ठहराते हुए 15 साल के कारावास और 1.5 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

पक्षों के तर्क

अपीलकर्ताओं ने सजा को चुनौती देते हुए निम्नलिखित तर्क दिए:

  • धारा 50 का उल्लंघन: स्नेहा गोयल के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि वह एक महिला है, इसलिए उसकी तलाशी धारा 50(4) के अनुसार महिला पुलिसकर्मी द्वारा की जानी चाहिए थी, और उसे राजपत्रित अधिकारी के सामने तलाशी लेने के उसके अधिकार के बारे में नहीं बताया गया।
  • धारा 52A और नियम 13 का उल्लंघन: यह तर्क दिया गया कि नमूनों को फोरेंसिक लैब (FSL) भेजने में देरी हुई और उन्हें सीधे FSL भेजने के बजाय ड्रग इंस्पेक्टर के माध्यम से भेजना नियमों का उल्लंघन है।
  • स्वतंत्र गवाह: बचाव पक्ष ने कहा कि स्वतंत्र गवाह (PW-1 और PW-2) मुकर गए हैं, जिससे बरामदगी संदिग्ध हो गई है।
  • जांच में पक्षपात: यह भी मुद्दा उठाया गया कि सूचना देने वाला और जांच अधिकारी (IO) एक ही व्यक्ति (PW-10) था, जो जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है।
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राज्य सरकार की ओर से सरकारी अधिवक्ता शालीन सिंह बघेल ने दलील दी कि बरामदगी सार्वजनिक स्थान पर हुई थी, इसलिए यहाँ धारा 42 या 50 के बजाय धारा 43 लागू होती है। उन्होंने कहा कि नमूनों की सुरक्षा (Chain of custody) पूरी तरह बरकरार थी।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणी

हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत तलाशी और सामान की तलाशी के बीच के अंतर का विस्तार से विश्लेषण किया।

1. धारा 50 बनाम धारा 43 की प्रासंगिकता हाईकोर्ट ने पाया कि नशीला पदार्थ अपीलकर्ताओं के शरीर से नहीं, बल्कि उनके बैग और पर्स से मिला था। हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम पवन कुमार (2005) मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

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“किसी बैग, ब्रीफकेस या ऐसे किसी लेख या कंटेनर को किसी भी परिस्थिति में मानव शरीर नहीं माना जा सकता… इन वस्तुओं को अधिनियम की धारा 50 में आने वाले ‘व्यक्ति’ शब्द के दायरे में शामिल करना संभव नहीं है।”

हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि बरामदगी सार्वजनिक सड़क पर हुई थी, इसलिए यहाँ धारा 43 (सार्वजनिक स्थान पर जब्ती और गिरफ्तारी की शक्ति) लागू हुई। इस स्थिति में धारा 50 (व्यक्तिगत तलाशी) की अनिवार्यताओं का पालन करना आवश्यक नहीं था।

2. नमूना प्रक्रिया और देरी नमूनों को भेजने में हुई देरी पर हाईकोर्ट ने NDPS (जब्ती, भंडारण, नमूनाकरण और निपटान) नियम, 2022 के नियम 13 का उल्लेख किया। हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही नियम शीघ्रता पर जोर देता है, लेकिन FSL रिपोर्ट से साबित होता है कि सील सुरक्षित थी:

“नमूनों को भेजने में केवल देरी… अभियोजन के मामले को तब तक खराब नहीं करती जब तक कि जब्त किए गए माल की सुरक्षित कस्टडी और लिंक एविडेंस स्पष्ट रूप से स्थापित न हो जाए।”

3. पुलिस गवाहों की गवाही स्वतंत्र गवाहों के मुकर जाने पर हाईकोर्ट ने राजेश धीमान बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2020) का संदर्भ देते हुए कहा कि केवल सरकारी गवाह होने के कारण उनकी गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता यदि वह विश्वसनीय है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अभियुक्त NDPS एक्ट की धारा 35 और 54 के तहत “सचेत कब्जे” (Conscious Possession) की कानूनी धारणा को झुठलाने में विफल रहे।

4. मुखबिर ही जांच अधिकारी सूचना देने वाले के ही जांच अधिकारी होने के सवाल पर, हाईकोर्ट ने मुकेश सिंह बनाम राज्य (NCT दिल्ली) (2020) के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि यह तब तक मुकदमे को दूषित नहीं करता जब तक कि वास्तविक पक्षपात साबित न हो जाए।

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हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में किसी भी प्रकार की अवैधता नहीं पाई। हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष कोडीन की व्यावसायिक मात्रा के संयुक्त और सचेत कब्जे को साबित करने में सफल रहा है।

“रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत अपीलकर्ताओं के अपराध को स्पष्ट रूप से स्थापित करते हैं और इस कोर्ट में पूर्ण विश्वास जगाते हैं… बचाव पक्ष द्वारा बताई गई छोटी-मोटी विसंगतियां अभियोजन के मुख्य आधार को प्रभावित नहीं करती हैं।”

परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने तीनों अपीलों (CRA No. 559/2025, 460/2025 और 829/2025) को खारिज कर दिया और सजा को बरकरार रखा।

मामले का विवरण

  • केस नंबर: CRA No. 559 of 2025 (CRA No. 460 और 829 of 2025 के साथ)
  • केस टाइटल: श्रीमती स्नेहा गोयल (और अन्य) बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
  • बेंच: मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल
  • फैसले की तारीख: 11 मार्च, 2026

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