सह-अभियुक्त के बयान पर आधारित एफआईआर: हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारी पर दुर्भावना का आरोप लगाने वाले व्यक्ति को दी गिरफ्तारी से राहत

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण मामले में अर्पण तिवारी नामक व्यक्ति को दंडात्मक कार्रवाई से अंतरिम राहत प्रदान की है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि एक पुलिस उप-निरीक्षक (Sub-Inspector) के साथ हुए पुराने विवाद के कारण उसे बार-बार आपराधिक मामलों में फंसाया जा रहा है।

न्यायमूर्ति रजनीश कुमार और न्यायमूर्ति जफीर अहमद की खंडपीठ ने अयोध्या जिले के थाना तारुन में दर्ज एफआईआर संख्या 0269/2025 को चुनौती देने वाली याचिका पर यह आदेश पारित किया। यह प्राथमिकी भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज की गई है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता अर्पित तिवारी ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता का आरोप है कि विपक्षी संख्या 5, जो वर्तमान में थाना तारुन, अयोध्या में उप-निरीक्षक के पद पर तैनात हैं, उनके साथ 5 सितंबर 2022 को हुई एक बहस के बाद से ही उसे दुर्भावनापूर्ण तरीके से निशाना बनाया जा रहा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि उसे उन अपराधों में भी नामजद किया जा रहा है जिनमें वह शुरू में आरोपी नहीं था।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के वकील: याचिकाकर्ता की ओर से श्री अखंड प्रताप पांडेय, श्री अभिषेक सिंह और श्री गौतम सिंह यादव ने पक्ष रखा। उन्होंने तर्क दिया कि इस मामले में याचिकाकर्ता का नाम केवल “सह-अभियुक्त के इकबालिया बयान” के आधार पर आया है, जो कानून की दृष्टि में “साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं है।” वकीलों ने कोर्ट को यह भी बताया कि कथित घटना के समय याचिकाकर्ता सूरत (गुजरात) में था। इसके अलावा, पुलिस प्रताड़ना के खिलाफ अधिकारियों को दिए गए ज्ञापनों पर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई।

राज्य सरकार (A.G.A.) के तर्क: राज्य की ओर से पेश अपर सरकारी अधिवक्ता (A.G.A.) ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने निर्देशों के आधार पर कहा कि जांच में याचिकाकर्ता की “संलिप्तता” प्रथम दृष्टया पाई गई है। राज्य का दावा है कि याचिकाकर्ता और घटनास्थल पर अपराध करने वाले अभियुक्तों के बीच टेलीफोनिक कॉल और व्हाट्सएप चैट के रिकॉर्ड मिले हैं।

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हालांकि, सरकारी अधिवक्ता ने यह स्वीकार किया कि चूंकि याचिकाकर्ता द्वारा “व्हाट्सएप कॉल” की गई थी, इसलिए उसका “कॉल डेटा रिकॉर्ड (CDR) प्राप्त नहीं किया जा सका।” दुर्भावना के आरोपों पर राज्य ने तर्क दिया कि जांच अभी जारी है, इसलिए ये आरोप “असामयिक” हैं। उन्होंने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम डब्ल्यू.एन. चड्ढा (1993) के मामले का संदर्भ दिया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और आदेश

कोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा दाखिल पूरक हलफनामे पर गौर किया, जिसमें उसके खिलाफ दर्ज अन्य मामलों का विवरण दिया गया था। सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने पाया कि ए.जी.ए. इस तथ्य से इनकार नहीं कर सके कि याचिकाकर्ता का नाम केवल सह-अभियुक्त के बयान के आधार पर सामने आया है।

अदालत ने यह भी नोट किया कि ए.जी.ए. पुलिस अधिकारी की दुर्भावना (Malafide) के बिंदु पर स्पष्ट निर्देश प्राप्त नहीं कर सके थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने विपक्षी संख्या 4 और 5 को नोटिस जारी किया है और राज्य सरकार से तीन सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।

अंतरिम राहत देते हुए खंडपीठ ने कहा:

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“अगली सुनवाई की तिथि तक, याचिकाकर्ता के खिलाफ इस एफआईआर के संबंध में कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी, बशर्ते वह जांच में सहयोग करें।”

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देशित किया है कि वह 15 मार्च 2026 को जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित हों और जांच में पूर्ण सहयोग करें। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता सहयोग नहीं करता है, तो अंतरिम राहत वापस ली जा सकती है। मामले की अगली सुनवाई 13 अप्रैल 2026 को होने वाले सप्ताह में तय की गई है।

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केस का विवरण:

  • केस का नाम: अर्पित तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल मिस. रिट याचिका संख्या- 907/2026
  • बेंच: न्यायमूर्ति रजनीश कुमार और न्यायमूर्ति जफीर अहमद
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री अखंड प्रताप पांडेय, श्री अभिषेक सिंह, श्री गौतम सिंह यादव
  • विपक्षी के वकील: ए.जी.ए. (राज्य के लिए)
  • आदेश की तिथि: 11 मार्च, 2026

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