सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा दायर अपीलों के एक समूह को खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के तहत ‘क्रीमी लेयर’ का निर्धारण करने के लिए पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSU) और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के मामले में केवल वेतन (Salary) को पैमाना बनाना गलत है। जस्टिस पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम (OM) के मानदंडों की अनदेखी कर केवल आय के आधार पर क्रीमी लेयर का निर्णय लेना “कानूनी रूप से अस्थिर” है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह कानूनी विवाद वर्ष 2012 से 2017 के बीच की सिविल सेवा परीक्षाओं (CSE) से संबंधित है। कई ऐसे उम्मीदवार, जिनके माता-पिता PSU या निजी संस्थानों में काम करते थे, उन्हें OBC (नॉन-क्रीमी लेयर) आरक्षण का लाभ देने से मना कर दिया गया था। डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग (DoPT) ने तर्क दिया था कि चूंकि सरकार ने अभी तक PSU के पदों की तुलना सरकारी पदों (क्लास I या क्लास II) से करने के लिए “समानता” (Equivalence) तय नहीं की है, इसलिए उनके माता-पिता के वेतन को ही आधार माना जाएगा। वेतन सीमा से अधिक होने के कारण उन्हें ‘क्रीमी लेयर’ घोषित कर दिया गया। इसके विरुद्ध उम्मीदवारों ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) और मद्रास, दिल्ली एवं केरल हाईकोर्ट में जीत हासिल की थी, जिसे केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
पक्षों की दलीलें
भारत सरकार: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि क्रीमी लेयर को बाहर करना एक संवैधानिक अनिवार्यता है। सरकार का तर्क था कि पदों की समानता (Equivalence) के अभाव में ‘इनकम टेस्ट’ ही प्राथमिक छाननी है और 2004 का स्पष्टीकरण पत्र इसी प्रक्रिया को स्पष्ट करता है।
प्रतिवादी (उम्मीदवार): उम्मीदवारों की ओर से कहा गया कि 1993 का मूल ऑफिस मेमोरेंडम, ‘इनकम टेस्ट’ की गणना से वेतन और कृषि आय को स्पष्ट रूप से बाहर रखता है। उन्होंने तर्क दिया कि सरकारी कर्मचारियों के मामले में ग्रुप C और D के कर्मियों के बच्चों को वेतन बढ़ने के बावजूद आरक्षण का लाभ मिलता है, जबकि PSU कर्मचारियों के बच्चों को केवल वेतन के आधार पर बाहर करना अनुच्छेद 14 के तहत भेदभाव (Hostile Discrimination) है।
न्यायालय का विश्लेषण
कोर्ट ने इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ मामले के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए इस मामले की गहराई से समीक्षा की।
1. 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम (OM) की महत्ता न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 1993 का मेमोरेंडम एक विस्तृत प्रक्रिया और विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के बाद आया था। सरकार का 2004 का एक स्पष्टीकरण पत्र इस मूल ढांचे को बदल नहीं सकता। पीठ ने टिप्पणी की:
“रिपोर्ट के अनुसार 2004 का पत्र DoPT सचिवालय की सामान्य प्रक्रिया से जारी नहीं हुआ था और इसकी फाइलों का भी रिकॉर्ड नहीं है। केवल वेतन के आधार पर आरक्षण से बाहर करना मूल संवैधानिक भावना के विपरीत है।”
2. भेदभाव (Hostile Discrimination) पर कोर्ट की टिप्पणी पीठ ने पाया कि सरकार का यह कदम एक ही वर्ग के लोगों के बीच कृत्रिम विभाजन पैदा करता है। कोर्ट ने कहा कि यदि केवल वेतन को आधार बनाया जाता है, तो यह उन लोगों के साथ अन्याय है जो सरकारी कर्मचारियों के समान ही पद रखते हैं:
“…PSU या निजी संस्थानों में कार्यरत लोगों के बच्चों को उनके पदों की श्रेणी देखे बिना केवल वेतन के आधार पर आरक्षण से वंचित करना स्पष्ट रूप से ‘हॉस्टाइल डिस्क्रिमिनेशन’ (Hostile Discrimination) है। यह समान स्थिति वाले लोगों के साथ असमान व्यवहार है, जो अनुच्छेद 14, 15 और 16 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है।”
3. आय गणना का सही तरीका कोर्ट ने दोहराया कि 1993 के मेमोरेंडम के अनुसार, क्रीमी लेयर तय करने वाले ‘इनकम टेस्ट’ में वेतन और कृषि आय को शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
अदालत का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की सभी अपीलों को खारिज कर दिया और हाईकोर्ट के आदेशों को बरकरार रखा। कोर्ट ने निम्नलिखित आदेश दिए:
- क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल आय के ब्रैकेट से नहीं, बल्कि पद और सेवा की श्रेणी के आधार पर होना चाहिए।
- PSU कर्मचारियों के बच्चों के मामले में वेतन को एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।
कोर्ट ने उन उम्मीदवारों के लिए विशेष निर्देश दिया जो लंबे समय से इस लड़ाई को लड़ रहे थे:
“DoPT पहले ही संसदीय समिति के समक्ष अतिरिक्त पद (Supernumerary Posts) बनाने का आश्वासन दे चुका है। अतः, हम निर्देश देते हैं कि जो उम्मीदवार इस फैसले के अनुसार नॉन-क्रीमी लेयर के दायरे में आते हैं, उनके लिए आवश्यक अतिरिक्त पद सृजित किए जाएं।”
केंद्र सरकार को इस फैसले को अगले छह महीने के भीतर लागू करने का निर्देश दिया गया है।
केस विवरण:
- केस का नाम: यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य बनाम रोहित नाथन और अन्य (एवं अन्य संबंधित मामले)
- सिविल अपील संख्या: 2827-2829/2018
- पीठ: जस्टिस पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन
- फैसले की तिथि: 11 मार्च, 2026

