भरण-पोषण की राशि अत्यधिक या उत्पीड़नकारी नहीं हो सकती; गुजरात हाईकोर्ट ने पति की आय के 50% से अधिक होने पर भरण-पोषण राशि घटाई

गुजरात हाईकोर्ट ने एक पति द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Application) को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश में संशोधन किया है, जिसने भरण-पोषण की राशि को दोगुने से अधिक बढ़ा दिया था। अदालत ने कहा कि हालांकि मुद्रास्फीति (inflation) का प्रभाव एक कारक है, लेकिन भरण-पोषण की राशि पक्षों की स्थिति और पति की भुगतान क्षमता के अनुरूप होनी चाहिए, ताकि यह “अत्यधिक या उत्पीड़नकारी” (excessive or extortionate) न बन जाए।

न्यायमूर्ति पी. एम. रावल की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कुल मासिक भरण-पोषण राशि को ₹14,000 से घटाकर ₹12,000 कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट, सुरेंद्रनगर द्वारा 25 सितंबर 2024 को पारित एक निर्णय से उत्पन्न हुआ है। उस कार्यवाही में, पत्नी और बच्चे द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 127 के तहत भरण-पोषण राशि बढ़ाने के लिए आवेदन दायर किया गया था।

शुरुआत में, वर्ष 2019 में, फैमिली कोर्ट ने पत्नी को ₹2,500 और बच्चे को ₹4,000 (कुल ₹6,500) का भरण-पोषण प्रदान किया था। हालांकि, 2024 के आदेश में फैमिली कोर्ट ने इन राशियों को बढ़ाकर क्रमशः ₹6,500 और ₹7,500 कर दिया, जिससे कुल राशि ₹14,000 प्रति माह हो गई। पति ने इस वृद्धि को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि यह राशि अत्यधिक है और उसकी मासिक आय के 50% से अधिक है।

पक्षों के तर्क

पति के वकील ने प्रस्तुत किया कि आयकर रिटर्न के अनुसार पति की आकलित आय लगभग ₹25,900 प्रति माह है। यह तर्क दिया गया कि ट्रायल कोर्ट ने केवल पांच साल बीत जाने और मुद्रास्फीति के आधार पर भरण-पोषण को दोगुना कर दिया, जबकि पति की वास्तविक वित्तीय क्षमता पर विचार नहीं किया गया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आय का आधे से अधिक हिस्सा केवल भरण-पोषण में चला जाएगा।

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दूसरी ओर, पत्नी और बच्चे के वकील ने फैमिली कोर्ट के आदेश का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि जब पिछला आदेश पारित हुआ था तब पत्नी कमा रही थी, लेकिन अब वह बेरोजगार है। उन्होंने यह भी बताया कि समय के साथ पति की आय ₹20,000 से बढ़कर लगभग ₹26,000 हो गई है, जो इस वृद्धि को उचित ठहराता है।

पति की वित्तीय देनदारियां और बीमार मां का दायित्व

पति की चुनौती का एक मुख्य बिंदु उसकी मौजूदा वित्तीय और पारिवारिक जिम्मेदारियां थीं। उन्होंने अदालत को बताया कि उन पर अपनी बीमार मां के भरण-पोषण की जिम्मेदारी है, जिनकी उम्र लगभग 76 वर्ष है।

पति ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट का भरण-पोषण राशि को दोगुना करने का निर्णय उनकी मां की देखभाल के खर्चों और उनके स्वयं के अस्तित्व के लिए आवश्यक खर्चों को ध्यान में रखने में विफल रहा। उन्होंने दलील दी कि ₹25,900 की आय के साथ ₹14,000 का भुगतान करना उन्हें और उनकी मां को संकट में डाल देगा, जिसे उन्होंने “अत्यधिक उत्पीड़नकारी” बताया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

न्यायमूर्ति पी. एम. रावल ने कहा कि पुनरीक्षण (Revision) का दायरा बहुत सीमित है और इसका प्रयोग नियमित रूप से नहीं किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के अमित कपूर बनाम रमेश चंदर और अन्य (2012) 9 SCC 460 मामले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि इस क्षेत्राधिकार का प्रयोग केवल “प्रकट त्रुटि को सुधारने” के लिए किया जाना चाहिए।

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मेरिट पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि पति की आय में केवल मामूली वृद्धि हुई है। पत्नी की स्थिति के संबंध में अदालत ने कहा:

“तथ्य यह है कि पत्नी ने एम.कॉम. तक शिक्षा प्राप्त की है और भरण-पोषण की राशि तय करते समय यह एक पहलू हो सकता है, भले ही वह वर्तमान में कमा नहीं रही हो।”

श्रीमती जसबीर कौर सहगल बनाम जिला न्यायाधीश, देहरादून और अन्य (AIR 1997 SC 3397) के ऐतिहासिक फैसले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि भरण-पोषण पक्षों की स्थिति, उनकी आवश्यकताओं और उन खर्चों को ध्यान में रखते हुए तय किया जाना चाहिए जिन्हें पति कानूनन निभाने के लिए बाध्य है। अदालत ने टिप्पणी की:

“पत्नी के लिए निर्धारित भरण-पोषण की राशि ऐसी होनी चाहिए कि वह अपनी स्थिति और उस जीवनशैली के अनुसार उचित आराम से रह सके जिसकी वह आदी थी… साथ ही, निर्धारित राशि अत्यधिक या उत्पीड़नकारी नहीं हो सकती।”

हाईकोर्ट ने पति की 76 वर्षीय मां के प्रति उसकी जिम्मेदारी पर विशेष जोर दिया। अदालत ने पाया कि फैमिली कोर्ट द्वारा मानी गई आय में, “दोगुने से अधिक भरण-पोषण राशि का भुगतान करके पति का जीवित रहना मुश्किल होगा।” अदालत ने यह भी नोट किया कि ट्रायल कोर्ट ने “बिना किसी स्पष्ट कारण या औचित्य के” राशि को दोगुना कर दिया था।

हाईकोर्ट का निर्णय

तथ्यों के बीच संतुलन बनाने के उद्देश्य से हाईकोर्ट ने भरण-पोषण की मात्रा में संशोधन किया। अदालत ने आदेश दिया कि:

  1. पत्नी के लिए भरण-पोषण ₹6,500 से घटाकर ₹5,500 प्रति माह किया जाता है।
  2. बच्चे के लिए भरण-पोषण ₹7,500 से घटाकर ₹6,500 प्रति माह किया जाता है।
  3. कुल भरण-पोषण राशि ₹12,000 प्रति माह तय की गई है, जो आवेदन की तारीख से देय होगी।
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इन संशोधनों के साथ, पुनरीक्षण याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया गया।

केस विवरण:

  • केस शीर्षक: एमबीडी बनाम गुजरात राज्य और अन्य
  • केस संख्या: आर/क्रिमिनल रिविजन एप्लिकेशन (भरण-पोषण के लिए) संख्या 181/2025
  • न्यायाधीश: माननीय न्यायमूर्ति पी. एम. रावल
  • फैसले की तारीख: 03 मार्च, 2026

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