सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पश्चिम बंगाल सरकार और चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि राज्य में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision–SIR) के दौरान तैनात न्यायिक अधिकारियों को आवश्यक सभी लॉजिस्टिक और प्रशासनिक सहायता उपलब्ध कराई जाए। अदालत ने बताया कि अब तक इन अधिकारियों के समक्ष मतदाता सूची से नाम हटाए जाने से जुड़े 10.16 लाख से अधिक आपत्तियों और दावों का निस्तारण किया जा चुका है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की तीन सदस्यीय पीठ ने यह निर्देश देते हुए कहा कि SIR प्रक्रिया में लगे न्यायिक अधिकारियों के कार्य में किसी प्रकार की बाधा नहीं आनी चाहिए और उन्हें सुचारु रूप से काम करने के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं।
पीठ ने चुनाव आयोग से कहा कि ऐसी कोई भी अनिवार्य प्रक्रिया लागू न की जाए जो मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण को प्रभावित कर सकती हो, जब तक कि उसे कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की अनुमति प्राप्त न हो। साथ ही आयोग को अपने पोर्टल में आने वाली तकनीकी समस्याओं को तत्काल दूर करने और भविष्य में ऐसी बाधाएं न होने देने के लिए भी कहा गया।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि न्यायिक अधिकारियों के लिए नए लॉगिन आईडी शीघ्र उपलब्ध कराए जाएं ताकि वे मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े कार्य को बिना किसी व्यवधान के आगे बढ़ा सकें।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया में न्यायिक अधिकारियों द्वारा दिए गए निर्णयों की अपील चुनाव आयोग के प्रशासनिक अधिकारी नहीं सुन सकते। इसके बजाय इन निर्णयों के खिलाफ अपीलों की सुनवाई न्यायिक तंत्र के माध्यम से ही की जानी चाहिए।
पीठ ने सुझाव दिया कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अपीलों के निपटारे के लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीशों की एक पीठ गठित कर सकते हैं। साथ ही अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि न्यायिक अधिकारियों के फैसलों के खिलाफ अपीलों पर विचार करने के लिए एक अपीलीय निकाय के गठन संबंधी अधिसूचना जारी की जाए।
सुप्रीम कोर्ट इन निर्देशों के साथ पश्चिम बंगाल में चल रही विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया से संबंधित कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था।

