हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के अंतिम आदेशों में दखल नहीं दे सकता; सुप्रीम कोर्ट ने ‘इन रेम’ फैसलों से प्रभावित लोगों के लिए कानूनी विकल्प स्पष्ट किए

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाया है कि कोई भी हाईकोर्ट किसी वादी के पक्ष में शीर्ष अदालत द्वारा पारित आदेश की अंतिमता (finality) को न तो दोबारा खोल सकता है और न ही उसमें दखल दे सकता है। इसके साथ ही, अदालत ने सेवा न्यायशास्त्र (service jurisprudence) से जुड़े मामलों में उन व्यक्तियों के लिए उपलब्ध कानूनी विकल्पों को भी स्पष्ट किया, जो मूल मुकदमे में पक्षकार (party) नहीं थे, लेकिन एक ‘इन रेम’ (in rem – जो आम जनता या पूरे वर्ग पर लागू हो) फैसले से प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुए हैं।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने केरल में तकनीकी शिक्षा शिक्षकों की योग्यता और पदोन्नति से जुड़े एक लंबे विवाद पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद केरल तकनीकी शिक्षा सेवा (संशोधन) नियम, 2004 के नियम 6A से उत्पन्न हुआ था। इस नियम के तहत सहायक प्रोफेसर (जिसे बाद में एसोसिएट प्रोफेसर कर दिया गया) और प्रोफेसर के पदों पर पदोन्नति के लिए पीएचडी (Ph.D.) की डिग्री हासिल करने में छूट और सात साल की मोहलत दी गई थी। राज्य सरकार ने यह कदम अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) की उन अधिसूचनाओं के बाद उठाया था, जिनमें पीएचडी को न्यूनतम योग्यता अनिवार्य बताया गया था।

शुरुआत में, केरल हाईकोर्ट ने नियम 6A को रद्द कर दिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2016 के ‘क्रिस्टी जेम्स जोस बनाम स्टेट ऑफ केरल’ मामले के फैसले में हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए इस नियम के तहत की गई नियुक्तियों को बरकरार रखा था। इसी आधार पर वर्तमान मामले के अपीलकर्ताओं (डॉ. जीजी के.एस. और अन्य) ने भी सुप्रीम कोर्ट से 2016 में अपने पक्ष में राहत प्राप्त की थी। इसके अनुपालन में, राज्य सरकार ने मार्च 2019 में एक सरकारी आदेश (GO) जारी कर उन्हें पूर्वव्यापी प्रभाव (retrospective effect) से एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर पदोन्नत किया।

बाद में विवाद का एक नया दौर तब शुरू हुआ जब पदोन्नति और पदावनति (reversions) से जुड़े अन्य सरकारी आदेशों को केरल प्रशासनिक न्यायाधिकरण (KAT) में चुनौती दी गई। KAT ने उन आदेशों को रद्द कर दिया। जब मामला केरल हाईकोर्ट पहुंचा, तो हाईकोर्ट ने 3 दिसंबर, 2020 के अपने फैसले में व्यापक निर्देश जारी किए। हाईकोर्ट ने कहा कि AICTE के नियम राज्य के नियमों पर हावी होंगे और 5 मार्च 2010 के बाद पदोन्नति के लिए पीएचडी होना अनिवार्य है।

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मौजूदा अपीलकर्ता, जो KAT या हाईकोर्ट के समक्ष चल रही कार्यवाही में पक्षकार नहीं थे, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उनका तर्क था कि हाईकोर्ट के इस सामान्य निर्देश ने सुप्रीम कोर्ट के 2016 के आदेशों से उन्हें मिले लाभों को प्रभावी रूप से खत्म कर दिया है।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने अनिवार्य रूप से अपीलकर्ताओं के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के अंतिम आदेश को दोबारा से खोल दिया है। उन्होंने दलील दी कि चूंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही अपीलकर्ताओं के अधिकारों को तय कर चुका था और उनके पक्ष में आदेश दे चुका था, इसलिए हाईकोर्ट उस अंतिमता को बाधित नहीं कर सकता।

इसी से जुड़े एक अन्य मामले (SLP (Civil) No. 18961/2022) में याचिकाकर्ता की वकील वहीदा बाबू ने प्रस्तुत किया कि उनका मुवक्किल हाईकोर्ट के फैसले से प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुआ है। उन्होंने बताया कि उनके मुवक्किल की प्रोफेसर के पद पर पदोन्नति की तारीख को नुकसानदेह तरीके से बदल दिया गया, जबकि वह उस कार्यवाही का हिस्सा भी नहीं था।

अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने शीर्ष अदालत के आदेशों की अंतिमता के संबंध में अपीलकर्ताओं की दलीलों से सहमति जताई। यह देखते हुए कि अपीलकर्ताओं को अदालत के 2016 के निर्देशों के अनुपालन में पदोन्नत किया गया था, पीठ ने टिप्पणी की:

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“इस अदालत द्वारा अपीलकर्ताओं के पक्ष में आदेश दिए जाने के बाद, हाईकोर्ट के लिए उससे जुड़ी अंतिमता को बाधित करने का कोई अवसर उत्पन्न नहीं हो सकता था।”

हालाँकि, अदालत ने यह भी बताया कि यदि अपीलकर्ताओं को हाईकोर्ट के समक्ष पक्षकार बनाया गया होता और सुप्रीम कोर्ट का पिछला आदेश रिकॉर्ड पर रखा गया होता, तो शायद यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती।

सेवा मामलों में निर्णयों से प्रभावित होने वाले गैर-पक्षकारों के व्यापक कानूनी मुद्दे को संबोधित करते हुए, अदालत ने उपलब्ध उपचारों की रूपरेखा तय करने के लिए स्थापित पूर्व उदाहरणों का सहारा लिया:

  • गैर-पक्षकारों के लिए पुनर्विचार (Review) याचिकाएं: के. अजित बाबू बनाम भारत संघ (1997) के फैसले का हवाला देते हुए, अदालत ने कहा कि सेवा मामलों में निर्णय अक्सर ‘इन रेम’ फैसलों के रूप में कार्य करते हैं। नतीजतन, “पीड़ित व्यक्तियों को सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 47 में उल्लिखित सीमित आधार पर पुनर्विचार (Review) का अधिकार उपलब्ध है, बशर्ते इसे सीमा अवधि के भीतर दायर किया गया हो।”
  • न्यायाधिकरणों के समक्ष नए आवेदन: रमा राव बनाम एम.जी. महेश्वर राव (2007) के फैसले पर भरोसा जताते हुए, अदालत ने कहा कि जो व्यक्ति पिछली कार्यवाही में पक्षकार नहीं थे, वे प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम की धारा 19 के तहत आवेदन दायर करके अपनी शिकायतें दर्ज करा सकते हैं।
  • समीक्षा मांगने का अधिकार क्षेत्र (Locus Standi): पीठ ने भारत संघ बनाम नरेशकुमार बद्रीकुमार जगद (2019) का भी उल्लेख किया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि एक गैर-पक्षकार भी यदि “खुद को पीड़ित की स्थिति में महसूस करता है और अदालत को इस बात से संतुष्ट करता है, तो वह उसमें पारित आदेश की समीक्षा की मांग कर सकता है।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. जीजी के.एस. और अन्य द्वारा दायर अपील को स्वीकार कर लिया और राहत को सख्ती से उनके विशिष्ट दावों तक ही सीमित रखा। पीठ ने निर्देश दिया कि “हाईकोर्ट के आक्षेपित आदेश में कही गई कोई भी बात इन विशेष तथ्यों के मद्देनजर उनके (अपीलकर्ताओं के) करियर की संभावनाओं को प्रभावित नहीं करेगी।”

हाईकोर्ट के आदेश से व्यथित लेकिन पक्षकार नहीं रहे हस्तक्षेपकर्ताओं (intervenors) और संबंधित विशेष अनुमति याचिका के याचिकाकर्ता के संबंध में, सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत तथ्यात्मक निष्कर्ष निकालने से इनकार कर दिया। इसके बजाय, अदालत ने उनके आवेदनों और याचिकाओं का निपटारा करते हुए उन्हें कानून और उद्धृत पूर्व उदाहरणों के अनुसार “उचित मंच के समक्ष उचित उपाय आगे बढ़ाने” की स्वतंत्रता प्रदान की।

  • केस का शीर्षक: डॉ. जीजी के.एस. और अन्य बनाम शिबू के और अन्य (साथ में डॉ. बिंदु कुमार के बनाम डॉ. वी. वेणु आईएएस)
  • केस नंबर: सिविल अपील नंबर … ऑफ 2026 (SLP (Civil) No. 8737 of 2021 से उत्पन्न) और SLP (Civil) No. 18961/2022

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