नीलामी की शेष राशि 15 दिनों में जमा न करना गंभीर उल्लंघन; ऐसी बिक्री शून्य मानी जाएगी, केवल अनियमितता नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि महाराष्ट्र सहकारी समिति (MCS) नियम, 1961 के नियम 107 के तहत नीलामी की शेष राशि 15 दिनों के भीतर जमा करना अनिवार्य है। जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि इन नियमों का उल्लंघन नीलामी को पूरी तरह से शून्य (Nullity) बना देता है, इसे केवल एक सामान्य अनियमितता नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश में संशोधन करते हुए विवादित संपत्ति की नई नीलामी का निर्देश दिया और बैंक को आदेश दिया कि वह मूल नीलामी खरीदार की जमा राशि 6% ब्याज के साथ वापस करे।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मुंबई के चेंबूर में स्थित एक भूखंड से संबंधित है। महानगर सहकारी बैंक ने एक फर्म, मैसर्स बोर्से ब्रदर्स से बकाया राशि वसूलने के लिए इस जमीन की नीलामी की थी। फर्म और उसके साझेदारों (पंडितराव बोर्से सहित) के खिलाफ 1994 में लगभग ₹24.19 लाख और ब्याज का एकपक्षीय अवार्ड पारित किया गया था।

पंडितराव बोर्से की मृत्यु के बाद, विशेष वसूली और बिक्री अधिकारी (SRO) ने 29 जनवरी, 2005 को नीलामी आयोजित की। मैसर्स आदिशक्ति डेवलपर्स ₹1.51 करोड़ की बोली के साथ सफल रहे। खरीदार ने नीलामी के दिन कुछ राशि जमा की, लेकिन शेष भुगतान किश्तों में 17 मार्च, 2005 तक किया गया। यह भुगतान 1961 के नियमों के नियम 107(11)(h) द्वारा निर्धारित 15 दिनों की अनिवार्य समय सीमा के बहुत बाद हुआ था।

पंडितराव बोर्से के कानूनी उत्तराधिकारियों ने इस नीलामी को चुनौती दी। अंततः 2009 में डिवीजनल जॉइंट रजिस्ट्रार ने बिक्री रद्द कर दी, जिसे 2018 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने बरकरार रखा। इसके बाद बैंक और नीलामी खरीदार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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पक्षों के तर्क

मैसर्स आदिशक्ति डेवलपर्स (नीलामी खरीदार): अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि नियम 107(13) और (14) के तहत उपलब्ध उपचार का उपयोग न करने के कारण धारा 154 के तहत पुनरीक्षण (Revision) विचारणीय नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि 15 दिनों में पैसा जमा करने की शर्त ऋणदाता (बैंक) के लाभ के लिए थी, और चूंकि बैंक ने देर से भुगतान स्वीकार कर लिया, इसलिए इस शर्त को ‘माफ’ (Waived) माना जाना चाहिए।

पंडितराव बोर्से के कानूनी उत्तराधिकारी: प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि नियम 107(11)(g) और (h) का पालन अनिवार्य है। उन्होंने शिल्पा शेयर्स एंड सिक्योरिटीज मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी उल्लंघन से नीलामी शून्य हो जाती है। उन्होंने बैंक और खरीदार के बीच मिलीभगत का भी आरोप लगाया।

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महानगर सहकारी बैंक: बैंक ने नीलामी खरीदार का समर्थन किया और कहा कि उत्तराधिकारी कार्यवाही से अवगत थे लेकिन उन्होंने बिक्री रद्द कराने के लिए 30 दिनों के भीतर कानूनी कदम नहीं उठाए।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से पुनरीक्षण शक्ति और जमा नियमों की अनिवार्यता पर ध्यान केंद्रित किया।

1. पुनरीक्षण (Revision) की वैधता पर: कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि जॉइंट रजिस्ट्रार के पास अधिकार क्षेत्र नहीं था। कोर्ट ने कहा कि 1960 के अधिनियम की धारा 154 के तहत पुनरीक्षण शक्ति “अत्यंत व्यापक” है और यह नियमों के तहत उपलब्ध विशिष्ट उपचारों तक सीमित नहीं है।

2. अनिवार्य जमा नियमों पर: कोर्ट ने जोर दिया कि नियम 107(11)(h) वसूली अधिकारी को शेष खरीद राशि जमा करने के लिए समय बढ़ाने का विवेक नहीं देता है। कोर्ट ने श्री सिद्धेश्वर को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड के मामले (जो सरफेसी अधिनियम से संबंधित था) से इसे अलग बताया।

पीठ ने टिप्पणी की:

“नियम 107(11)(h) में शामिल प्रावधान न केवल ऋणदाता के लाभ के लिए हैं, बल्कि वे सार्वजनिक नीलामी की पवित्रता बनाए रखने के सार्वजनिक उद्देश्य को भी पूरा करते हैं। अन्यथा, गैर-गंभीर बोलीदाता सार्वजनिक नीलामी में कीमतों में हेरफेर करने के लिए भाग लेंगे, जिससे पूरी प्रक्रिया में देरी हो सकती है।”

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पीठ ने शिल्पा शेयर्स एंड सिक्योरिटीज बनाम नेशनल को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड के मिसाल की पुष्टि करते हुए कहा:

“यदि निर्धारित अवधि के भीतर पूरी खरीद राशि जमा नहीं की जाती है, तो बिक्री शून्य मानी जाएगी, केवल अनियमितता नहीं।”

कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने 18 मार्च, 2005 के बिक्री की पुष्टि के आदेश को शून्य (Null and Void) घोषित किया।

अंतिम निर्देश:

  1. 29 जनवरी, 2005 को हुई नीलामी को रद्द कर दिया गया है।
  2. 1961 के नियमों के नियम 107(11)(j) के तहत विवादित संपत्ति की नई नीलामी की जाएगी।
  3. बैंक को निर्देश दिया गया है कि वह मैसर्स आदिशक्ति डेवलपर्स को ₹1.51 करोड़ की राशि जमा करने की तारीख से पुनर्भुगतान की तारीख तक 6% वार्षिक ब्याज के साथ वापस करे।
  4. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश बैंक और देनदारों को बकाया राशि के संबंध में समझौता करने से नहीं रोकता है।
  • केस का शीर्षक: मैसर्स आदिशक्ति डेवलपर्स बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 002545-002548/2026

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