इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण (Maintenance) के एक आदेश को रद्द करते हुए कहा है कि फैमिली कोर्ट के पास किसी भी ऐसी साक्ष्य (Evidence) को स्वीकार करने का अधिकार है जो विवाद के प्रभावी निपटारे में सहायक हो, भले ही वह साक्ष्य भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) के तहत कड़ाई से स्वीकार्य न हो।
न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकल पीठ ने एक क्रिमिनल रिवीजन को स्वीकार करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट ने केवल धारा 65-B सर्टिफिकेट न होने के आधार पर व्यभिचार के आरोपों से संबंधित व्हाट्सएप चैट को नजरअंदाज कर बड़ी गलती की।
हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या वैवाहिक विवादों का फैसला करते समय फैमिली कोर्ट भारतीय साक्ष्य अधिनियम के कड़े नियमों, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड से संबंधित धारा 65-B, से बंधा हुआ है। इस मामले में रिवीजनकर्ता ने ₹10,000 प्रति माह के भरण-पोषण आदेश को इस आधार पर चुनौती दी थी कि ट्रायल कोर्ट ने व्हाट्सएप बातचीत के माध्यम से प्रस्तुत व्यभिचार के सबूतों पर विचार नहीं किया।
पक्षों के तर्क
रिवीजनकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि ट्रायल कोर्ट के समक्ष लिखित दलीलें दाखिल की गई थीं, जिसमें स्पष्ट रूप से आरोप लगाया गया था कि विपक्षी पार्टी व्यभिचार में रह रही है। इन दावों के समर्थन में व्हाट्सएप चैट के लगभग 50 से अधिक पृष्ठ प्रस्तुत किए गए थे। यह दलील दी गई कि ये बातचीत “अभद्र प्रकृति की थी और शारीरिक संबंधों की ओर इशारा करती थी।”
रिवीजनकर्ता ने आगे कहा कि ट्रायल कोर्ट ने विशिष्ट दलीलों और सहायक इलेक्ट्रॉनिक सामग्री के बावजूद व्यभिचार के बिंदु पर कोई मुद्दा (Issue) तय नहीं किया, जो कि मनमाना था। राज्य की ओर से पेश अपर सरकारी अधिवक्ता (AGA) ने इस तथ्य से इनकार नहीं किया कि ये सामग्रियां रिकॉर्ड पर थीं लेकिन ट्रायल कोर्ट द्वारा उन पर ध्यान नहीं दिया गया।
कोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां
मामले की समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को केवल धारा 65-B सर्टिफिकेट के अभाव के तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 को वैवाहिक मामलों में साक्ष्य के प्रति लचीला दृष्टिकोण अपनाने के लिए बनाया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा:
“फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 14 प्रावधान करती है कि एक फैमिली कोर्ट साक्ष्य के रूप में किसी भी रिपोर्ट, बयान, दस्तावेज, जानकारी या मामले को प्राप्त कर सकता है, जो उसकी राय में विवाद को प्रभावी ढंग से हल करने में सहायता कर सकता है, भले ही ऐसा साक्ष्य भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के तहत प्रासंगिक या स्वीकार्य हो या न हो।”
पीठ ने आगे स्पष्ट किया कि विवादों के प्रभावी निपटारे को सुनिश्चित करने के लिए फैमिली कोर्ट “अपनी प्रक्रिया स्वयं निर्धारित” करने के लिए सशक्त है।
मुद्दे (Issues) तय करने की अनिवार्य आवश्यकता के संबंध में कोर्ट ने पाया कि रिवीजनकर्ता ने लिखित दलीलों के पैराग्राफ 11 में चरित्र से संबंधित विशिष्ट आरोप लगाए थे। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“रिवीजनकर्ता द्वारा दाखिल की गई विशिष्ट दलीलों और सहायक सामग्री को देखते हुए, रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों पर विचार करने के बाद एक विशिष्ट मुद्दा (Issue) तैयार किया जाना चाहिए था और उस पर निर्णय लिया जाना चाहिए था।”
कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत एक प्रक्रियात्मक चूक की ओर भी इशारा किया:
“ट्रायल कोर्ट आवेदन पर निर्णय लेते समय… रिवीजनकर्ता द्वारा दाखिल साक्ष्यों पर विचार करने में विफल रहा और व्यभिचार के संबंध में कोई विशिष्ट मुद्दा तय नहीं किया, जो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 354(6) के मद्देनजर अनिवार्य था।”
अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि फैमिली कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश “कानून की नजर में टिकाऊ नहीं है” क्योंकि इसमें महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी की गई और एक मुख्य आरोप पर फैसला नहीं किया गया।
अदालत ने भरण-पोषण के आदेश को रद्द कर दिया और मामले को नए सिरे से विचार के लिए ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया। ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि वह पार्टियों को ऐसे साक्ष्य पेश करने की अनुमति दे जो फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 14 के तहत लचीले मानकों के आलोक में विवाद के प्रभावी समाधान में सहायता कर सकें।

