न्यायपालिका पर NCERT की पाठ्यपुस्तक को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, शिक्षा विभाग के सचिव और एक अधिकारी को नोटिस

न्यायपालिका की भूमिका पर NCERT की एक स्कूली किताब के विवादित अध्याय को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने शिक्षा विभाग के सचिव और डॉ. दिनेश प्रसाद को कारण बताओ नोटिस जारी किया है और पूछा है कि उनके खिलाफ अवमानना या अन्य कानूनी कार्रवाई क्यों न की जाए।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर यह साबित हुआ कि पाठ्यसामग्री जानबूझकर न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से तैयार की गई है, तो यह आपराधिक अवमानना के दायरे में आ सकती है।

“माफी” पर भी सुप्रीम कोर्ट ने जताई शंका

सरकार की ओर से प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से बिना शर्त माफी का हवाला दिया गया, लेकिन कोर्ट ने कहा कि वह यह जांचेगा कि माफी वास्तविक है या नुकसान होने के बाद जिम्मेदारी से बचने का प्रयास। पीठ ने कहा कि संस्थान को हुए “अपरिवर्तनीय नुकसान” को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

छात्रों पर प्रभाव को लेकर चिंता

कोर्ट ने कहा कि यह पाठ्यपुस्तक केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि शिक्षक, अभिभावक और समाज पर भी असर डालेगी। कम उम्र के विद्यार्थियों को न्यायपालिका के बारे में “एकतरफा और पक्षपातपूर्ण” सामग्री पढ़ाना उन्हें संस्थागत जिम्मेदारियों की सही समझ से दूर कर सकता है।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि कार्यवाही का उद्देश्य आलोचना को दबाना नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की निष्पक्षता और संस्थागत गरिमा को बनाए रखना है। न्यायपालिका ने कहा कि स्वस्थ आलोचना लोकतंत्र के लिए जरूरी है, लेकिन पाठ्यक्रम में संतुलित और तथ्यात्मक प्रस्तुति होनी चाहिए।

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अध्याय में न्यायपालिका की भूमिका की अनदेखी

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि विवादित अध्याय में न्यायपालिका के ऐतिहासिक योगदान, मूल संरचना सिद्धांत की रक्षा, कानूनी सहायता तंत्र और न्याय तक पहुंच आसान बनाने जैसे पहलुओं का उल्लेख नहीं है। इसके बजाय भ्रष्टाचार और लंबित मामलों पर जोर दिया गया है, जिससे एक नकारात्मक और अधूरी तस्वीर सामने आती है।

कोर्ट के अनुसार, इस तरह की प्रस्तुति से यह संदेश जाता है कि शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं होती, जबकि वास्तविक स्थिति इससे भिन्न है।

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किताब का वितरण रोका गया, डिजिटल सामग्री भी जांच के दायरे में

पीठ ने शिक्षा मंत्रालय की उस प्रेस विज्ञप्ति का संज्ञान लिया जिसमें किताब के वितरण पर रोक लगाने की बात कही गई है। हालांकि कोर्ट ने कहा कि डिजिटल रूप में प्रसार भी गंभीर मुद्दा है और जरूरत पड़ी तो उसे हटाने के निर्देश भी दिए जा सकते हैं।

जिम्मेदारी तय करने के संकेत

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि केवल अध्याय लिखने वाले व्यक्तियों पर कार्रवाई कर देने से मामला खत्म नहीं होगा। यह पता लगाया जाएगा कि सामग्री की तैयारी और प्रकाशन के लिए जिम्मेदार उच्च स्तर पर कौन-कौन शामिल था।

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मामले की अगली सुनवाई में कोर्ट यह तय करेगा कि संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना या अन्य कानूनी कार्रवाई की जाए या नहीं।

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