सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उस रिट याचिका को खारिज कर दिया जिसमें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के उन प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी, जो सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों को अभियोजन निदेशक तथा सेवारत न्यायिक अधिकारियों को उपनिदेशक एवं सहायक निदेशक अभियोजन के रूप में नियुक्त करने की अनुमति देते हैं। न्यायालय ने कहा कि याचिका “भ्रामक” है और इसका कोई कानूनी आधार नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने अधिवक्ता सुविदुत्त एम. एस. के माध्यम से दायर सुबीश पी. एस. की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया।
याचिकाकर्ता ने BNSS की धारा 20(2)(a) और 20(2)(b) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी। इन प्रावधानों में न्यायिक अधिकारियों को अभियोजन तंत्र के महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करने का प्रावधान है।
याचिका में कहा गया था कि यद्यपि इन प्रावधानों को अभियोजन तंत्र को मजबूत करने के उद्देश्य से लाया गया है, लेकिन वास्तव में ये न्यायिक स्वतंत्रता को प्रभावित करते हैं क्योंकि इससे न्यायपालिका के सदस्यों को कार्यपालिका नियंत्रित अभियोजन पदों पर नियुक्त किया जाता है।
यह भी तर्क दिया गया कि ऐसी नियुक्तियाँ न्यायिक और कार्यपालिका कार्यों के अस्वीकार्य विलय का कारण बनती हैं और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन करती हैं, जो संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, ये प्रावधान अनुच्छेद 14 और 21 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं तथा अनुच्छेद 50 और 235 में निहित संवैधानिक व्यवस्था के विपरीत हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज करते हुए कहा कि इसमें उठाए गए तर्कों में कोई दम नहीं है और यह कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।
पीठ ने यह स्वीकार नहीं किया कि संबंधित वैधानिक प्रावधान शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत या न्यायिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करते हैं।
न्यायालय ने रिट याचिका को खारिज करते हुए BNSS के उन प्रावधानों को बरकरार रखा जो सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों की अभियोजन पदों पर नियुक्ति की अनुमति देते हैं।

