छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने यौन अपराधों में पीड़िता के बयान की अहमियत पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। निचली अदालत द्वारा आरोपियों को बरी किए जाने के आदेश को रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बलात्कार की पीड़िता को ‘सह-अपराधी’ (Accomplice) नहीं माना जा सकता और यदि उसका बयान विश्वसनीय है, तो कानूनन किसी स्वतंत्र गवाही से उसकी पुष्टि (Corroboration) की आवश्यकता नहीं है।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने वर्ष 2015 में एक 9 वर्षीय मासूम बच्ची के साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामले में स्कूल के प्रिंसिपल और दो महिला कर्मचारियों को बरी करने के फैसले को पलट दिया है।
कानूनी मुद्दा और हेडनोट
इस मामले में मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या किसी अन्य स्वतंत्र साक्ष्य के अभाव में केवल एक नाबालिग पीड़िता के बयान के आधार पर दोषसिद्धि तय की जा सकती है। कोर्ट ने अपने आधिकारिक ‘हेडनोट’ में इस कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा:
“बलात्कार या यौन उत्पीड़न की पीड़िता सह-अपराधी नहीं होती है, और कानून के मामले में उसके साक्ष्य के लिए पुष्टि (Corroboration) की आवश्यकता नहीं होती है। पुष्टि केवल विवेक का मामला है, दोषसिद्धि की शर्त नहीं। यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय, स्वाभाविक, सुसंगत और भरोसेमंद है, और भौतिक कमियों से मुक्त है, तो अदालत स्वतंत्र पुष्टि के बिना भी उस पर कार्रवाई कर सकती है।”
मामले की पृष्ठभूमि
यह घटना सितंबर 2015 की है, जो कोरिया जिले के ज्योति मिशन स्कूल, सरभोका में घटित हुई थी। पीड़िता की मां को स्कूल के गार्ड ने बच्ची की तबीयत खराब होने की सूचना दी थी। वहां पहुंचने पर मां ने देखा कि चौथी कक्षा में पढ़ने वाली 9 साल की मासूम बच्ची के निजी अंगों से खून बह रहा था और वह गंभीर दर्द में थी। बच्ची ने बताया कि हॉस्टल में रात के समय उसके साथ गलत काम किया गया है। जब उसने इसकी शिकायत स्कूल की सिस्टर (प्रतिवादी संख्या 3) से की, तो उसे डंडे से पीटा गया और किसी को न बताने की धमकी दी गई।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट), बैकुंठपुर ने 2017 में साक्ष्यों के अभाव का हवाला देते हुए आरोपियों को बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (राज्य) की ओर से दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता (PW-2) के बयान की अनदेखी की, जो शुरू से अंत तक सुसंगत रहा। राज्य का तर्क था कि मामूली विसंगतियों के आधार पर पूरे अभियोजन पक्ष की कहानी को खारिज नहीं किया जाना चाहिए था।
वहीं, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि शिनाख्त परेड (TIP) पुलिस के प्रभाव में थी और बच्ची को लगी चोटें किसी चिकित्सा स्थिति, जैसे कि यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI), के कारण हो सकती हैं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को ‘विकृत’ (Perverse) और ‘स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण’ करार दिया। बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय समाज में कोई भी बच्ची या महिला अपनी पवित्रता पर आंच आने वाली बात को स्वीकार करने में बेहद संकोच करती है, जो इस बात का अंतर्निहित आश्वासन है कि आरोप मनगढ़ंत नहीं है।
‘स्टर्लिंग क्वालिटी’ (उत्कृष्ट गुणवत्ता) के गवाह के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“यौन उत्पीड़न की पीड़िता के साक्ष्य लगभग घायल गवाह के साक्ष्य के समान होते हैं और एक हद तक उससे भी अधिक विश्वसनीय होते हैं।”
अदालत ने पाया कि पीड़िता के बयान की पुष्टि मेडिकल रिपोर्ट और फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट से भी होती है। बेंच ने UTI की दलील को खारिज करते हुए कहा कि संक्रमण से लालिमा तो हो सकती है, लेकिन शरीर पर पाए गए सूजन और घाव केवल चोट के कारण ही संभव थे।
कोर्ट का अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने 2017 के बरी करने के आदेश को निरस्त करते हुए निम्नलिखित सजा सुनाई:
- प्रतिवादी संख्या 2 (जोसेफ धन्ना स्वामी, प्रिंसिपल): कोर्ट ने उन्हें पॉक्सो एक्ट की धारा 6 और आईपीसी की धारा 376 के तहत दोषी पाया और आजीवन कारावास व 10,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।
- प्रतिवादी संख्या 1 और 3 (फिलोमिना केरकेट्टा और किसमरिया): इन्हें लोक सेवक होने के नाते अपराध को छिपाने के लिए आईपीसी की धारा 119 के तहत दोषी ठहराया गया। कोर्ट ने दोनों को 7 साल के कठोर कारावास और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।
हाईकोर्ट ने सभी दोषियों को दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।
- केस शीर्षक: छत्तीसगढ़ राज्य बनाम फिलोमिना केरकेट्टा और अन्य
- केस संख्या: ACQA संख्या 227/2018

