NOTA सीट नहीं भर सकता, क्या इससे निर्वाचित प्रतिनिधियों की गुणवत्ता सुधरी?: सुप्रीम कोर्ट का सवाल; एकल प्रत्याशी वाले चुनावों में NOTA की मांग पर सुनवाई 17 मार्च को

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को NOTA (नन ऑफ द एबव) विकल्प की उपयोगिता पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह किसी सीट को भर नहीं सकता और पूछा कि क्या इससे निर्वाचित नेताओं की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। न्यायालय एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 53(2) को चुनौती दी गई है, जो निर्विरोध चुनाव की स्थिति में बिना मतदान के प्रत्याशी को निर्वाचित घोषित करने का प्रावधान करती है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ उस याचिका पर विचार कर रही थी, जिसमें मांग की गई है कि एकल प्रत्याशी होने की स्थिति में भी मतदाताओं को NOTA का विकल्प उपलब्ध कराया जाए।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “क्या NOTA से निर्वाचित नेताओं की गुणवत्ता में सुधार हुआ है?” उन्होंने यह भी कहा कि NOTA कोई इकाई नहीं बन सकता क्योंकि अधिकतम वोट मिलने पर भी वह सीट नहीं भर सकता।

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पीठ ने यह भी कहा कि बेहतर उम्मीदवारों के चयन के लिए मतदान को अनिवार्य बनाने का प्रयास होना चाहिए। अदालत ने इस प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की कि शिक्षित और संपन्न वर्ग के मतदाता अपेक्षाकृत कम मतदान करते हैं, जबकि महिलाओं और कम शिक्षित मतदाताओं की भागीदारी अधिक होती है।

मामले की अगली सुनवाई 17 मार्च को निर्धारित की गई है।

अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा, “हम बहुत अधिक काल्पनिक आधारों में जा रहे हैं। कानून की इस तरह जांच नहीं की जा सकती। मतदान का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है।”

यह जनहित याचिका विधि थिंक टैंक ‘विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी’ ने दायर की है। याचिका में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 53(2) को चुनौती दी गई है। यह धारा कहती है कि यदि जितनी सीटें हैं उतने ही प्रत्याशी हों, तो रिटर्निंग ऑफिसर उन्हें बिना मतदान के निर्वाचित घोषित कर देगा।

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याचिका में निर्वाचन आचरण नियम, 1961 के नियम 11 तथा फॉर्म 21 और 21बी को भी निरस्त करने की मांग की गई है, जो निर्विरोध चुनावों में प्रत्याशियों की सूची प्रकाशित करने और परिणाम घोषित करने से संबंधित हैं।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस प्रावधान के कारण एकल प्रत्याशी वाले चुनावों में मतदाता NOTA के माध्यम से ‘नकारात्मक मतदान’ नहीं कर पाते, जिससे उनके मताधिकार का हनन होता है। याचिका में कहा गया है कि 1952 से अब तक लोकसभा के निर्विरोध चुनावों के कारण 82 लाख से अधिक मतदाता मतदान से वंचित रहे हैं।

याचिका में सुप्रीम कोर्ट के पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम भारत संघ (2013) के फैसले का हवाला दिया गया है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों पर NOTA का विकल्प उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था और नकारात्मक मतदान के अधिकार को अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा माना गया था।

साथ ही एक अन्य फैसले का उल्लेख किया गया है, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि NOTA का अधिकार केवल प्रत्यक्ष निर्वाचन (सीट आधारित) चुनावों पर लागू होता है, न कि आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाले अप्रत्यक्ष चुनावों पर।

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याचिकाकर्ता ने धारा 53(2) को इस सीमा तक असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है कि यह निर्विरोध प्रत्यक्ष चुनावों में मतदाताओं को NOTA का विकल्प प्रयोग करने से रोकती है। याचिका में कहा गया है कि इसे संविधान के अनुरूप बनाने के लिए पढ़ा जाए या निरस्त किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने 21 अक्टूबर 2024 को इस याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर मामले की जांच करने पर सहमति दी थी।

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