ट्रायल से पहले लंबे समय तक हिरासत में रखना बिना ट्रायल सजा देने जैसा नहीं हो सकता: 979 करोड़ रुपये के जल जीवन मिशन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दी जमानत

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के जल जीवन मिशन में टेंडर से जुड़ी कथित अनियमितताओं के मामले में अपीलकर्ता महेश चंद्र जोशी और मुकेश पाठक को नियमित जमानत दे दी है। राजस्थान हाईकोर्ट (जयपुर पीठ) के 13 अगस्त 2026 के आदेश को निरस्त करते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि भले ही किसी जनकल्याणकारी योजना में बड़े पैमाने पर वित्तीय गड़बड़ी के आरोप गंभीर हैं, लेकिन ट्रायल से पहले लंबे समय तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत विचाराधीन कैदी के व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित सुनवाई (स्पीड ट्रायल) के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं बन सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) पुलिस स्टेशन, जयपुर द्वारा 18 जनवरी 2024 को दर्ज की गई प्राथमिक जांच संख्या 06/2024 से जुड़ा है। यह जांच राजस्थान सरकार के जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (पीएचईडी) द्वारा ‘जल जीवन मिशन’ के तहत निकाले गए टेंडरों में बड़े पैमाने पर हुई अनियमितताओं की पड़ताल के लिए शुरू की गई थी।

जांच के बाद 30 अक्टूबर 2024 को एफआईआर संख्या 245/2024 दर्ज की गई। यह एफआईआर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (2018 में संशोधित) की धारा 7(सी), 9, 10, 12, 13(1)(ए) सपठित धारा 13(2) और धारा 12 तथा भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), 1860 की धारा 409, 466, 467, 468, 471, 477ए और 120बी के तहत दर्ज की गई थी।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, वर्ष 2021 से 2023 के बीच दो प्रोप्राइटरशिप फर्मों—मैसर्स श्री गणपति ट्यूबवेल कंपनी (जिसके मालिक सह-आरोपी महेश मित्तल हैं) और मैसर्स श्री श्याम ट्यूबवेल कंपनी (जिसके मालिक सह-आरोपी पदम चंद जैन हैं)—ने पीएचईडी के सरकारी अधिकारियों और निजी व्यक्तियों के साथ मिलकर साजिश रची। इन फर्मों ने इरकॉन (IRCON) इंटरनेशनल लिमिटेड द्वारा जारी किए गए फर्जी और मनगढ़ंत कार्य पूर्णता प्रमाण पत्र (वर्क कंप्लीशन सर्टिफिकेट) तथा स्वीकृति पत्रों के आधार पर 237 टेंडरों (क्रमशः 68 और 169 टेंडर) में भाग लिया।

इन जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल करके दोनों फर्में सबसे कम बोली लगाने वाली (एल-1) बोलीदाता बनीं और उन्होंने कुल 104 टेंडरों (31 टेंडर 859.2 करोड़ रुपये के और 73 टेंडर 120.25 करोड़ रुपये के) के वर्क ऑर्डर हासिल किए, जिनका कुल मूल्य 979.45 करोड़ रुपये था।

गिरफ्तारी के बाद दोनों अपीलकर्ताओं ने नियमित जमानत याचिकाएं दायर की थीं, जिन्हें राजस्थान हाईकोर्ट ने 13 अगस्त 2026 को खारिज कर दिया था। इसके बाद दोनों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता महेश चंद्र जोशी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा और सिद्धार्थ अग्रवाल ने विस्तृत दलीलें पेश करते हुए कहा कि अपीलकर्ता नियमित जमानत पर रिहा होने के हकदार हैं। वहीं, अपीलकर्ता मुकेश पाठक की ओर से वकील कौशल शर्मा ने भी इसी तरह की दलीलें रखीं।

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दूसरी ओर, राजस्थान राज्य की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू और एडिशनल एडवोकेट जनरल पद्मेश मिश्रा ने इन अपीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कथित वित्तीय अनियमितता के बड़े पैमाने और आपराधिक कृत्य की गंभीरता पर बल देते हुए जमानत याचिका खारिज करने की मांग की।

कोर्ट का विश्लेषण

शुरुआत में ही पीठ ने स्पष्ट किया कि ये अपीलें केवल जमानत दिए जाने के प्रश्न तक ही सीमित हैं। इसलिए कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के मामले के गुण-दोष की गहराई से पड़ताल करने या लगातार एफआईआर दर्ज करने की वैधता, दोहरी सजा (डबल जियोपार्डी), भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के कथित उल्लंघन अथवा महेश चंद्र जोशी की गिरफ्तारी की वैधता से जुड़े कानूनी मुद्दों पर कोई निर्णय देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इन सभी मुद्दों को कानून के अनुसार उचित कानूनी मंचों के समक्ष उठाने के लिए खुला रखा गया है।

आरोपों की गंभीरता पर विचार करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ‘जल जीवन मिशन’ जैसी जनकल्याणकारी परियोजना के क्रियान्वयन में बड़े पैमाने पर वित्तीय गड़बड़ी और संस्थागत मिलीभगत के आरोप गंभीर हैं और इनकी गहन जांच जरूरी है। हमारा मानना है कि ऐसे व्यापक आपराधिक कृत्य में शामिल आरोपियों को जमानत दिए जाने का राज्य द्वारा विरोध करना पूरी तरह जायज है। इसके बावजूद, आरोपों की गंभीरता चाहे जितनी भी अधिक हो, वह जमानत देने से जुड़े अन्य सभी आधारों को पूरी तरह दरकिनार नहीं कर सकती और न ही ट्रायल से पहले अनिश्चितकाल तक हिरासत में रखने को सही ठहरा सकती है।”

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अपीलकर्ताओं को जमानत देने के पक्ष में कई महत्वपूर्ण परिस्थितियों को आधार बनाया:

  1. जांच पूरी होना और साक्ष्यों का हिरासत में होना: दोनों अपीलकर्ताओं से संबंधित जांच पूरी हो चुकी है। मुकेश पाठक के खिलाफ 12 अप्रैल 2026 को चार्जशीट संख्या 80/2026 और महेश चंद्र जोशी के खिलाफ 29 जून 2026 को पूरक चार्जशीट संख्या 80-बी/2026 दाखिल की जा चुकी है। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन का मामला मुख्य रूप से दस्तावेजी रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर आधारित है—जिसमें टेंडर फाइलें, बिड इवैल्यूएशन व फाइनेंस कमेटियों की बैठकों के मिनट्स, आधिकारिक नोट-शीट, इरकॉन के साथ पत्राचार, बैंक खातों के विवरण, जब्त मोबाइल फोन की फॉरेंसिक रिपोर्ट, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और फोन टैपिंग के ट्रांसक्रिप्ट शामिल हैं। चूंकि ये सभी सामग्रियां जांच एजेंसी द्वारा पहले ही जब्त की जा चुकी हैं, इसलिए किसी और हिरासत में पूछताछ या जब्ती की आवश्यकता नहीं है। इससे दस्तावेजी या इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की आशंका भी काफी हद तक खत्म हो जाती है।
  2. समान तथ्यों से जुड़े अन्य मामलों में पहले से जमानत: दोनों अपीलकर्ताओं को इसी मामले से जुड़े अन्य मामलों में पहले ही जमानत मिल चुकी है:
    • 72 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक महेश चंद्र जोशी इस एफआईआर के सिलसिले में 7 मई 2026 से (पांच महीने से अधिक समय से) जेल में बंद थे। इससे पहले, इसी मामले और मैसर्स सुमंगलम लैंडमार्क एलएलपी को 50 लाख रुपये के वित्तीय लेन-देन से जुड़े धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (पीएमएलए) के मामले में वे सात महीने से अधिक समय तक जेल में रह चुके थे, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 3 दिसंबर 2025 को उन्हें नियमित जमानत दी थी। कोर्ट ने उल्लेख किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ नहीं है जिससे यह साबित हो कि उन्होंने अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया हो, गवाहों को प्रभावित किया हो या जांच में बाधा डाली हो।
    • मुकेश पाठक इस एफआईआर में 18 फरवरी 2026 से (लगभग आठ महीने से) लगातार हिरासत में थे। सीबीआई मामले (आरसी2172024ए0008) में—जो विशेष रूप से इरकॉन के जाली प्रमाणपत्र तैयार करने, फर्जी ईमेल आईडी चलाने, मैसर्स श्री गणपति ट्यूबवेल कंपनी से धन प्राप्त करने और केरल के कट्टाप्पना स्थित होटल वुडलार्क में फर्जी सत्यापन कराने से जुड़ा था—उन्हें 27 जनवरी 2026 को विशेष सीबीआई जज द्वारा नियमित जमानत दी जा चुकी थी। इसके अतिरिक्त वे संबंधित पीएमएलए मामले में भी पहले से जमानत पर हैं।
  3. विशाल रिकॉर्ड और लंबे समय तक चलने वाला ट्रायल: इस मामले में 22 आरोपी, तीन चार्जशीट, 124 गवाह और 20,000 पन्नों में फैले 192 दस्तावेज शामिल हैं। अभी तक आरोप (चार्ज) तय नहीं हुए हैं और कई कारणों से ट्रायल शुरू होना बाकी है। कुछ सह-आरोपियों के खिलाफ जांच अभी भी लंबित है और कई अन्य आरोपी फरार हैं। कोर्ट ने कहा कि जब भी ट्रायल शुरू होगा, साक्ष्यों की भारी संख्या को देखते हुए इसे निकट भविष्य में पूरा होने में काफी समय लगेगा। पीठ ने दोहराया:
    “जैसा कि इस कोर्ट द्वारा बार-बार रेखांकित किया गया है, ट्रायल से पहले लंबे समय तक हिरासत में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत विचाराधीन कैदी के व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित सुनवाई के मौलिक अधिकार के हनन के रूप में बिना ट्रायल सजा में तब्दील नहीं होने दिया जा सकता।”
  4. सह-आरोपियों के साथ समानता (पैरिटी): कोर्ट ने रेखांकित किया कि मामले के अन्य सह-आरोपियों को पहले ही राहत मिल चुकी है। सह-आरोपी अरुण श्रीवास्तव (तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य अभियंता) को हाईकोर्ट द्वारा 1 जून 2026 को जमानत दी गई थी, जबकि सह-आरोपी शुभांशु दीक्षित (तत्कालीन सचिव, आरडब्ल्यूएसएसएमबी/पीएचईडी वित्त समिति) और संजय बड़ाया (जोशी के कथित बिचौलिए) को सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर 2026 को जमानत दी थी।
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कोर्ट का निर्णय

ट्रायल से पहले और अधिक समय तक जेल में रखने को अनुचित और अनावश्यक मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया और महेश चंद्र जोशी तथा मुकेश पाठक को ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि और निम्नलिखित शर्तों के अधीन नियमित जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया:

  • अपीलकर्ता अपना पासपोर्ट (यदि पहले जमा नहीं किया है) ट्रायल कोर्ट में जमा करेंगे और कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना भारत नहीं छोड़ेंगे।
  • चूंकि कुछ अन्य आरोपियों के खिलाफ जांच अभी भी लंबित है, इसलिए जांच अधिकारी द्वारा बुलाए जाने पर अपीलकर्ता पेश होंगे और जांच में पूरा सहयोग करेंगे।
  • अपीलकर्ता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मामले के तथ्यों से परिचित किसी भी व्यक्ति को कोई प्रलोभन, धमकी या वादा नहीं देंगे और न ही अभियोजन के साक्ष्यों से छेड़छाड़ करेंगे।
  • अपीलकर्ता सुनवाई की प्रत्येक तारीख पर नियमित और समय पर ट्रायल कोर्ट में उपस्थित होंगे (जब तक कि उचित कारण से उन्हें छूट न दी गई हो) और कार्यवाही के शीघ्र संचालन में सहयोग करेंगे।
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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शर्तों के किसी भी उल्लंघन की स्थिति में ट्रायल कोर्ट को जमानत रद्द करने का पूरा अधिकार होगा। इसके अलावा कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ये टिप्पणियां केवल जमानत के निपटारे तक ही सीमित हैं और इन्हें मामले के गुण-दोष, आरोपियों की विशिष्ट भूमिका या साक्ष्यों के कानूनी मूल्यांकन पर अंतिम राय के रूप में नहीं देखा जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने इन शर्तों के साथ दोनों अपीलें स्वीकार कर लीं।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: महेश चंद्र जोशी बनाम राजस्थान राज्य और मुकेश पाठक बनाम राजस्थान राज्य 

वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2026 विशेष अनुमति याचिका (क्रिमिनल) संख्या 15822 वर्ष 2026 और विशेष अनुमति याचिका (क्रिमिनल) संख्या 15862 वर्ष 2026 से उत्पन्न 

पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू 

निर्णय की तिथि: 16 अक्टूबर 2026

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