सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक मर्यादा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को नए सिरे से विचार के लिए वापस (रिमांड) भेज दिया है, जिसमें एक अभियुक्त को नियमित जमानत दी गई थी। अदालत ने पाया कि अभियुक्त ने समानांतर कानूनी रास्ते अपनाकर ‘फोरम शॉपिंग’ की, अदालती आदेशों को छिपाया और अत्यधिक सद्भाव (उबेरिमा फाइड्स) के सिद्धांत का उल्लंघन किया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने नियमित जमानत देने वाले अंतिम आदेश को खारिज करते हुए आरोपी की स्थिति को अंतरिम जमानत में तब्दील कर दिया, जो हाईकोर्ट के नए फैसले तक प्रभावी रहेगी।
यह मामला डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सर्विस टैक्स इंटेलिजेंस के सीनियर इंटेलिजेंस ऑफिसर द्वारा दायर अपील से जुड़ा है। विभाग ने कर्नाटक हाईकोर्ट की एकल पीठ द्वारा 26 दिसंबर 2025 को क्रिमिनल पिटीशन नंबर 16884/2025 में पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत विंटर वेकेशन (शीतकालीन अवकाश) के दौरान मेसर्स एमके ट्रेडर्स के प्रोप्राइटर मोहम्मद कामरान को नियमित जमानत दे दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता विभाग ने स्पेशल कोर्ट फॉर इकोनॉमिक ऑफेंसेस, बेंगलुरु के समक्ष प्रतिवादी के खिलाफ सेंट्रल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स एक्ट, 2017 (सीजीएसटी एक्ट) की धारा 135 के तहत दंडनीय धारा 16(2)(बी) सपठित धारा 132(1)(बी), 132(1)(सी) और 132(1)(एफ) के तहत निजी शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप है कि प्रतिवादी ने बिना माल की आपूर्ति के फर्जी इनवॉयस जारी किए, धोखाधड़ी से इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ उठाया, दस्तावेजों व वित्तीय विवरणों में हेरफेर की और टैक्स चोरी के उद्देश्य से झूठी जानकारी देकर 43,08,22,936 रुपये का राजस्व नुकसान पहुंचाया।
विभाग के अनुसार, जब आरोपी के घोषित और वास्तविक आवास पर तलाशी ली गई, तो उसने कड़ा विरोध किया और मौके से फरार हो गया, जिसके संबंध में एक अलग एफआईआर दर्ज की गई। 16 सितंबर 2025 को उसकी गिरफ्तारी के बाद ट्रायल कोर्ट और सेशंस कोर्ट ने उसकी लगातार जमानत अर्जियों को खारिज कर दिया था।
इसके बाद प्रतिवादी ने जमानत के लिए हाईकोर्ट का रुख किया। 12 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने याचिका की प्रति विभाग के स्टैंडिंग काउंसिल को देने और विभाग को दो सप्ताह के भीतर आपत्तियां दर्ज कराने का निर्देश दिया। हाईकोर्ट का विंटर वेकेशन 20 दिसंबर 2025 से शुरू हो गया था, लेकिन प्रतिवादी के वकील द्वारा एक मेमो दाखिल किए जाने के बाद 26 दिसंबर 2025 को मामले को तुरंत लिस्ट कर लिया गया, जहां एकल पीठ ने उसे जमानत दे दी।
दोनों पक्षों की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विभाग की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एन. वेंकटरमन ने दलील दी कि मुख्य बहस करने वाले स्टैंडिंग काउंसिल की अनुपस्थिति के चलते स्थगन (एडजर्नमेंट) का अनुरोध किया गया था, जिसे अनसुना कर हाईकोर्ट को याचिका पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि जो पैनल वकील उपस्थित हुए थे, उन्हें मेरिट पर बहस करने के निर्देश नहीं थे, जिसके कारण प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन हुआ।
एएसजी ने अदालत को यह भी बताया कि 22 दिसंबर 2025 को प्रतिवादी ने हाईकोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एक रिट याचिका (रिट पिटीशन नंबर 38771/2025) दाखिल कर अपनी गिरफ्तारी को चुनौती दी थी। उसमें उसने ट्रायल कोर्ट की शिकायत व संज्ञान आदेश को रद्द करने तथा अंतरिम रिहाई की मांग की थी, यह कहते हुए कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 483 के तहत जमानत मांगना एक प्रभावी उपाय नहीं है। रिट कोर्ट ने 22 दिसंबर 2025 को ही उसकी अंतरिम रिहाई की अर्जी खारिज कर दी थी, लेकिन इस तथ्य को 26 दिसंबर 2025 को जमानत देने वाले सिंगल जज के सामने पूरी तरह छिपा लिया गया।
दूसरी तरफ, प्रतिवादी के वरिष्ठ वकील एस. नागमुथु ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि विभाग के वकील ने पहले हल्के ढंग से स्थगन मांगा था, लेकिन बाद में मेरिट पर बहस की थी। इसके अलावा, विभाग दो सप्ताह की तय समयसीमा में अपनी आपत्तियां दाखिल करने में पूरी तरह विफल रहा था। मेरिट पर उन्होंने तर्क दिया कि अपराध मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय हैं, अधिकतम पांच साल की सजा का प्रावधान है, जांच पूरी हो चुकी है और आरोपी को रिहा हुए नौ महीने से अधिक का समय बीत चुका है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण: फोरम शॉपिंग और प्रक्रिया का दुरुपयोग
सुनवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग, ट्रांसक्रिप्ट और दोनों पक्षों के हलफनामों का अवलोकन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यद्यपि विभाग के पैनल वकील ने स्थगन खारिज होने के बाद अदालत का सहयोग किया था, लेकिन प्रतिवादी का आचरण अदालत की प्रक्रिया के स्पष्ट दुरुपयोग और ‘फोरम शॉपिंग’ को उजागर करता है।
अदालत को अंधेरे में रखकर समानांतर कानूनी रास्ते अपनाने पर कड़ी नाराजगी जताते हुए पीठ ने टिप्पणी की: “सभी न्यायिक प्राधिकारियों को अंधेरे में रखते हुए प्रतिवादी द्वारा इस प्रकार समानांतर उपचार तलाशने का आचरण अत्यंत निंदनीय है। अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देना या जमानत के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना किसी अभियुक्त का अधिकार हो सकता है; फिर भी, विशेष रूप से पर्याप्त जानकारी दिए बिना समानांतर उपायों को आगे बढ़ाने का ऐसा आचरण स्पष्ट रूप से कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि प्रतिवादी में अत्यधिक सद्भाव (उबेरिमा फाइड्स) का अभाव था, जो कि जमानत देने के विवेकपूर्ण और साम्यापूर्ण क्षेत्राधिकार की बुनियादी शर्त है। कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी ने: “…सत्य को छिपाने (सप्रेसियो वेरी) और असत्य को प्रस्तुत करने (सुगेस्टियो फाल्सी) का सहारा लिया।”
शीतकालीन अवकाश के दौरान मामले को जल्दबाजी में लिस्ट कराने पर पीठ ने कहा: “अपीलकर्ता को पर्याप्त नोटिस दिए बिना किसी याचिका को लिस्ट करा लेना, स्पष्ट रूप से अदालत को गुमराह करके अनुचित लाभ उठाने का एक प्रयास था।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
अदालत ने माना कि यदि यह मामला किसी जघन्य अपराध से जुड़ा होता, तो प्रतिवादी के आचरण पर बहुत सख्त रुख अपनाया जाता। हालांकि, वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए नियमित जमानत को सीधे रद्द करने के बजाय मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेजना उचित होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने एकल पीठ द्वारा याचिका का अंतिम निपटारा करने वाले आदेश को खारिज करते हुए क्रिमिनल पिटीशन को हाईकोर्ट की फाइल पर पुनर्जीवित कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि प्रतिवादी पहले की शर्तों पर ही अंतरिम जमानत पर रहेगा। विभाग को दो सप्ताह के भीतर अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने की अनुमति दी गई और प्रतिवादी को एक सप्ताह का समय प्रत्युत्तर के लिए दिया गया। कोर्ट ने एकल पीठ से अनुरोध किया कि वह मामले की मेरिट पर नए सिरे से विचार कर संभवतः इसी वर्ष के अंत तक निर्णय करे।
छुट्टियों में अर्जेंट लिस्टिंग के लिए दिशानिर्देश
भविष्य में इस प्रकार की विसंगतियों से बचने और सभी हाईकोर्टों में एकरूपता बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने वेकेशन लिस्टिंग को लेकर दिशानिर्देश तय किए। पीठ ने रेखांकित किया कि यदि कोई अदालत किसी मामले को “दो सप्ताह बाद” लिस्ट करने का निर्देश देती है और वह अवधि अवकाश के बीच में समाप्त हो रही हो, तो रजिस्ट्री को सामान्यतः अवकाश की अवधि को घटाकर ही समय की गणना करनी चाहिए। रजिस्ट्री को मामले को छुट्टियों के दौरान तभी लिस्ट करना चाहिए, जब अदालत ने स्पष्ट रूप से अवकाश के भीतर की कोई विशेष तारीख तय की हो या वेकेशन बेंच के समक्ष रखने का निर्देश दिया हो, जो संबंधित हाईकोर्ट के नियमों के अधीन होगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सीनियर इंटेलिजेंस ऑफिसर बनाम मोहम्मद कामरान
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील नंबर 2026 (एसएलपी (क्रिमिनल) नंबर 7504/2026 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू
निर्णय की तिथि: 16 अक्टूबर 2026

