सार्वजनिक उपयोगिता की जमीनों पर बढ़ते अवैध कब्जों पर कड़ा रुख अपनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि ग्राम पंचायत की संपत्तियों पर अनाधिकृत कब्जों की जानकारी छिपाने या रिपोर्ट न करने वाले ग्राम प्रधान और राजस्व कर्मचारी विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ अमानत में खयानत (क्रिमिनल ब्रीच ऑफ ट्रस्ट), आपराधिक साजिश और उकसावे (एबेटमेंट) के मुकदमों का सामना करेंगे। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि ने चुनार के तहसीलदार को 90 दिनों की तय समयसीमा के भीतर बेदखली की लंबित कार्यवाही पूरी करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही अदालत ने पूरे उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक जमीनों से अवैध कब्जे हटाने और उन्हें उनके मूल स्वरूप में बहाल करने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए।
मामले की पृष्ठभूमि
हाईकोर्ट का यह आदेश मनोज कुमार सिंह द्वारा दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर आया। याचिकाकर्ता ने अदालत से गुहार लगाई थी कि मिर्जापुर जिले की चुनार तहसील स्थित परगना भुइली के गांव चौका में राजस्व रिकॉर्ड में तालाब (बबली) के रूप में दर्ज सार्वजनिक जमीन से निजी प्रतिवादियों के अवैध कब्जे हटवाए जाएं। यह मामला गाटा संख्या 48 (रकबा 0.177 हेक्टेयर), गाटा संख्या 51 (रकबा 0.101 हेक्टेयर) और गाटा संख्या 53 (रकबा 0.114 हेक्टेयर) से जुड़ा हुआ था। इसके अलावा याचिकाकर्ता ने 22 जुलाई 2024 को अधिकारियों को दिए गए अपने प्रत्यावेदन पर तय समयसीमा में निर्णय लेने के निर्देश जारी करने की भी मांग की थी।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत के समक्ष दलील दी कि गांव के कुछ लोगों ने तालाब (बबली) की भूमि पर कब्जा कर लिया है, लेकिन उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 67 के तहत बेदखली की कोई वैधानिक कार्रवाई शुरू नहीं की गई। याचिकाकर्ता का आरोप था कि तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक, ग्राम प्रधान (भूमि प्रबंधक समिति के अध्यक्ष के रूप में) और लेखपाल (समिति के सचिव के रूप में) को मामले की पूरी जानकारी दी गई थी, फिर भी ग्राम पंचायत की संपत्ति के वैधानिक संरक्षक होने के बावजूद उन्होंने अपने कर्तव्यों की अनदेखी की। यह भी रेखांकित किया गया कि हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर होने के बाद ही 7 अगस्त 2025 और 8 सितंबर 2025 को धारा 67 के तहत नोटिस जारी कर प्रक्रिया शुरू की गई।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से पेश अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता बृजेश कुमार त्रिपाठी ने प्रशासन की निष्क्रियता के आरोप का विरोध करते हुए चुनार के तहसीलदार की लिखित आख्या पेश की। उन्होंने अदालत को बताया कि कथित कब्जाधारकों के खिलाफ राजस्व संहिता की धारा 67 के तहत बेदखली की विधिक कार्यवाही पहले ही शुरू की जा चुकी है। अदालत ने इस आख्या को रिकॉर्ड पर ले लिया।
कानूनी प्रावधान और अदालत का विश्लेषण
सार्वजनिक उपयोगिता की जमीनों से जुड़े कानूनी ढांचे की पड़ताल करते हुए जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि ने उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 28-ए, 28-बी और 34 तथा उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 59, 60, 61 और 67 के साथ राजस्व संहिता नियमावली, 2016 के नियम 56, 66 और 67 के तहत भूमि प्रबंधक समिति के दायित्वों का विस्तार से विश्लेषण किया। अदालत ने ध्यान दिलाया कि पंचायत राज अधिनियम की धारा 28 के तहत ग्राम पंचायत या उसकी समितियों के प्रत्येक सदस्य और सेवक को लोक सेवक माना गया है।
अदालत ने कहा कि नियमावली 2016 के नियम 66 के तहत भूमि प्रबंधक समिति के अध्यक्ष (ग्राम प्रधान) और सचिव (लेखपाल) का यह कानूनी दायित्व है कि वे सार्वजनिक भूमि पर किसी भी अवैध कब्जे या नुकसान की जानकारी आर.सी. प्रपत्र-19 में सक्षम अधिकारी को दें। प्रशासनिक लापरवाही पर कड़ी टिप्पणी करते हुए बेंच ने कहा:
“राजस्व अभिलेखों में ‘तालाब (बबली)’ के रूप में दर्ज भूमि भूमि प्रबंधक समिति को सौंपी गई है, जिसके अध्यक्ष ग्राम प्रधान और सचिव क्षेत्र के लेखपाल हैं। इसके बावजूद वे सार्वजनिक उपयोगिता की भूमि के संरक्षक होने के बाद भी अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही शुरू करने पर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वे समिति/ग्राम सभा की भूमि पर अन्य व्यक्तियों द्वारा किए जा रहे अतिक्रमण की अनदेखी कर रहे हैं, जो समिति के अध्यक्ष, सचिव और अन्य सदस्यों की ओर से साजिश के साथ-साथ दुष्प्रेरण (उकसावे) के समान है।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि वैधानिक संरक्षकों की ऐसी विफलता गंभीर आपराधिक और सेवा संबंधी दंड के दायरे में आती है:
“ग्राम सभा की संपत्ति भूमि प्रबंधक समिति को सौंपी गई है, इसलिए भूमि प्रबंधक समिति उस संपत्ति की संरक्षक है। यदि इस संपत्ति पर किसी अनाधिकृत व्यक्ति द्वारा अतिक्रमण किया जाता है, तो अध्यक्ष और सचिव उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता नियमावली, 2016 के नियम 66 के तहत तहसीलदार को सूचित करने के लिए बाध्य हैं। यदि वे तहसीलदार को ऐसे अतिक्रमण की जानकारी नहीं देते हैं और संपत्ति की रक्षा व संरक्षण करने में विफल रहते हैं, तो समिति के सदस्यों, जिनमें इसके अध्यक्ष यानी ग्राम प्रधान और सचिव यानी लेखपाल शामिल हैं, की ऐसी निष्क्रियता आपराधिक साजिश और उकसावे के साथ-साथ भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 316 के तहत अमानत में खयानत (आपराधिक विश्वासघात) मानी जाएगी।”
बेदखली की प्रक्रिया कब पूर्ण मानी जाएगी, इस पर बेंच ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा:
“यह स्पष्ट किया जाता है कि कार्यवाही पूरी होने का अर्थ केवल उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 67 के तहत आदेश पारित करना नहीं समझा जाएगा। कार्यवाही तभी पूरी और निष्पादित मानी जाएगी जब नियमावली, 2016 के नियम 67 (6) के तहत 90 दिनों के भीतर सक्षम प्राधिकारी द्वारा मौके पर अतिक्रमण को वास्तव में हटाकर सार्वजनिक भूमि का कब्जा बहाल कर दिया जाए।”
अदालत ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 41 नियम 5 का हवाला देते हुए यह भी स्पष्ट किया कि धारा 67 के आदेश के खिलाफ अपील लंबित होने मात्र से आदेश के क्रियान्वयन पर कोई स्वत: रोक नहीं लगती। जब तक कि अपीलीय अदालत ने कब्जाधारक के पक्ष में कोई स्पष्ट स्थगन आदेश न दिया हो, बेदखली के आदेश को 30 दिन बीतने के बाद मौके पर अमल में लाया जा सकता है।
जल स्रोतों पर कब्जे के पर्यावरणीय प्रभाव को रेखांकित करते हुए अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 48-ए और 51-ए (जी) का उल्लेख किया और टिप्पणी की:
“संक्षेप में कहा जाता है, ‘जल ही जीवन है’। जल के बिना पृथ्वी पर किसी भी जीव का अस्तित्व संभव नहीं है, इसलिए इसे हर हाल में बचाया जाना चाहिए। इस प्रकार, जल स्रोतों पर किसी भी प्रकार का अतिक्रमण स्वीकार्य नहीं है और इसे भारी जुर्माने, हर्जाने और सजा के साथ जल्द से जल्द हटाया जाना चाहिए।”
हाईकोर्ट ने अपने विश्लेषण में कई पुराने फैसलों का भी उल्लेख किया। इनमें इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ का दयाराम यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य फैसला शामिल है, जिसमें कहा गया था कि बेदखली आदेशों को लागू न कराना प्रशासनिक अधिकारियों का गंभीर कर्तव्यलोप है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के हिंच लाल तिवारी बनाम कमला देवी और जितेंद्र सिंह बनाम पर्यावरण मंत्रालय के फैसलों का हवाला दिया गया, जिनमें जल निकायों और ग्राम सभा की जमीनों को जीवन के मौलिक अधिकार का अभिन्न अंग माना गया था। साथ ही हरियाणा राज्य बनाम सतपाल और बाबू राम बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य के मामलों का संदर्भ देते हुए दोहराया गया कि किसी भी नागरिक को सार्वजनिक भूमि पर कब्जा करने का कोई अधिकार नहीं है।
ऐसे मुकदमों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताते हुए अदालत ने कहा:
“उपरोक्त तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, इस अदालत को इस बात का गहरा खेद है कि राजस्व संहिता, 2006 की धारा 67 की कार्यवाहियों और सार्वजनिक उपयोगिता की भूमि पर अतिक्रमण से जुड़ी अनगिनत जनहित याचिकाओं की अदालत में बाढ़ आ गई है।”
राज्यव्यापी निर्देश और अदालत का निर्णय
जनहित याचिका को बिना किसी हर्जाने के निस्तारित करते हुए हाईकोर्ट ने चुनार के तहसीलदार को निर्देश दिया कि वह लंबित धारा 67 की कार्यवाही को नियम 67(6) के तहत तय समयसीमा में अंतिम रूप दें। इसके अलावा जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि ने पूरे प्रदेश के लिए कड़े निर्देश जारी किए:
- लेखपालों पर कार्रवाई: उत्तर प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों और उपजिलाधिकारियों को निर्देश दिया गया कि यदि कोई लेखपाल इस आदेश की तिथि से 60 दिनों के भीतर आर.सी. प्रपत्र-19 में अवैध कब्जे की जानकारी तहसीलदार को नहीं देता है, तो उसके खिलाफ नियमावली 2016 के नियम 195 और राजस्व संहिता की धारा 233(2)(ix) के तहत कदाचार की विभागीय जांच और भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 316 (आपराधिक विश्वासघात, साजिश व उकसावा) के तहत मुकदमा दर्ज कराया जाए।
- ग्राम प्रधानों की जवाबदेही: यदि कोई ग्राम प्रधान 60 दिनों के अंदर अवैध कब्जे की सूचना प्रपत्र-19 में देने में विफल रहता है, तो उसके खिलाफ भी आपराधिक मुकदमा शुरू किया जाए और उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 95(1)(g)(iii) के तहत पद के दुरुपयोग और कर्तव्य में लगातार विफलता के आधार पर पद से हटाने की कार्यवाही की जाए।
- तहसीलदारों की जिम्मेदारी: यदि कोई तहसीलदार या तहसीलदार (न्यायिक) कारण दर्ज किए बिना 90 दिनों के भीतर धारा 67 की कार्यवाही पूरी नहीं करता है, तो इसे कदाचार मानते हुए उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999 के तहत विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
- जमीन की बहाली: प्रभावित पक्षों को सुनवाई का अवसर देने के बाद अतिक्रमण हटाने और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की पूरी प्रक्रिया 90 दिनों के भीतर पूरी की जाए। सार्वजनिक जमीनों को राजस्व अभिलेखों में दर्ज उनके वास्तविक मूल स्वरूप में बहाल किया जाए।
- पुलिस सहायता: अतिक्रमण हटाने के दौरान पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे राजस्व टीम को पर्याप्त सुरक्षा और सहयोग दें ताकि शांति व्यवस्था बनी रहे।
- अवमानना की चेतावनी: अदालत ने चेतावनी दी कि यदि सार्वजनिक जमीनों पर कब्जे जारी रहते हैं और जिम्मेदार अधिकारी सूचना नहीं देते हैं, तो कोई भी व्यक्ति हाईकोर्ट में सिविल अवमानना याचिका दायर कर सकता है।
- वार्षिक रिपोर्ट और समीक्षा: संबंधित विभागों के अपर मुख्य सचिवों और प्रमुख सचिवों को प्रदेश भर में हो रहे अवैध कब्जों की समीक्षा करने के निर्देश दिए गए हैं। सभी कमिश्नरों और जिलाधिकारियों को आदेश दिया गया है कि वे हर साल अतिक्रमण हटाने और लापरवाह अधिकारियों पर की गई कार्रवाई की वार्षिक रिपोर्ट शासन को भेजें।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मनोज कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 12 अन्य
वाद संख्या: पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (पीआईएल) संख्या – 2923 / 2025
पीठ: जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि
निर्णय की तिथि: 6 अक्टूबर, 2025

