नई दिल्ली: न्यायिक फैसलों में विवेक के स्वतंत्र इस्तेमाल और कारणों के उल्लेख को अनिवार्य बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के उन तीन अलग-अलग आदेशों को रद्द कर दिया है, जिनके जरिए बिहार में चुनाव बाद हुई हिंसा से जुड़े एक हत्या के मामले में तीन आरोपियों को अग्रिम व नियमित जमानत दी गई थी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने अहम सबूतों—विशेषकर घटनास्थल पर आरोपियों की मौजूदगी व हथियारों के साथ भागीदारी दर्शाने वाले वीडियो फुटेज और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 161 के तहत गवाहों द्वारा की गई पहचान के बयानों—की पूरी तरह अनदेखी की है। पीठ ने इन सभी जमानत याचिकाओं पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मृतक चंदन राम के पिता नागेंद्र राय द्वारा दायर आपराधिक अपीलों से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 20 मई 2024 को लोकसभा चुनाव के दौरान कुछ लोगों ने बिना किसी उकसावे के एक आरजेडी (RJD) प्रत्याशी के समर्थकों के साथ दुर्व्यवहार, गाली-गलौज और हमले की कोशिश की थी, जिसे लेकर एक प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई गई थी।
आरोप है कि इसी रंजिश के चलते अगली सुबह यानी 21 मई 2024 को करीब 7:00 बजे करीब 40 से 50 लोगों की हथियारबंद भीड़ ने भिखारी चौक पर अपीलकर्ता के बेटे और अन्य लोगों को घेर लिया। इस दौरान आरोपी रमाकांत सोलंकी उर्फ रमाकांत सिंह ने चंदन राम के सीने में गोली मार दी, जबकि सह-आरोपी राम प्रताप सिंह उर्फ रवि कांत सिंह ने मनोज राम के सिर में गोली मारी। इसी हमले में दो अन्य लोग, दीपक कुमार और गुड्डू कुमार भी अन्य हमलावरों की गोलीबारी में घायल हो गए। अस्पताल ले जाने पर चंदन राम को मृत घोषित कर दिया गया।
इसके बाद, सारण जिले के छपरा नगर स्थित टाउन थाने में भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 147, 148, 149, 307, 302, 34 और 120B तथा आर्म्स एक्ट, 1959 की धारा 27 के तहत प्राथमिकी संख्या 346/2024 दर्ज की गई। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने तीन आरोपियों—कामाख्या सिंह उर्फ दीपू सिंह, राम प्रताप सिंह और रमाकांत सोलंकी—के खिलाफ आईपीसी और आर्म्स एक्ट की विभिन्न धाराओं में आरोप पत्र दाखिल किया।
सत्र अदालत ने कामाख्या सिंह की अग्रिम जमानत और राम प्रताप सिंह व रमाकांत सोलंकी की नियमित जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया था। सत्र अदालत ने पुलिस द्वारा हासिल किए गए उस वीडियो फुटेज पर विशेष रूप से भरोसा किया था, जिसमें आरोपियों की घटनास्थल पर मौजूदगी दिखाई दे रही थी और राम प्रताप सिंह के हाथ में स्पष्ट तौर पर राइफल देखी गई थी। हालांकि, बाद में पटना हाईकोर्ट ने 23 अक्टूबर 2024 को कामाख्या सिंह को अग्रिम जमानत तथा 20 दिसंबर 2024 और 10 जनवरी 2025 को क्रमश: राम प्रताप सिंह और रमाकांत सोलंकी को नियमित जमानत दे दी। इन आदेशों से क्षुब्ध होकर मृतक के पिता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
अदालत का विश्लेषण और निष्कर्ष
हाईकोर्ट के आदेशों का अवलोकन करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि कामाख्या सिंह और राम प्रताप सिंह की जमानत याचिकाओं पर फैसला सुनाते समय हाईकोर्ट ने वीडियो फुटेज पर पूरी तरह ध्यान नहीं दिया, जबकि सत्र अदालत के आदेशों में इस फुटेज का स्पष्ट उल्लेख था। इसके अलावा, तीनों ही आदेशों में हाईकोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 161 के तहत दर्ज उन गवाहों के बयानों पर भी विचार नहीं किया, जिन्होंने वीडियो फुटेज देखकर संबंधित आरोपियों की पहचान की थी।
रमाकांत सोलंकी से संबंधित आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि हाईकोर्ट ने वीडियो फुटेज के संबंध में केवल जांच अधिकारी (IO) की दलीलें दर्ज कीं, लेकिन इस बात का कोई स्वतंत्र विश्लेषण या कारण नहीं दिया कि यह फुटेज उसकी जमानत याचिका को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है या नहीं। पीठ ने रेखांकित किया कि केवल पक्षों की दलीलें दर्ज कर लेना न्यायिक विवेक का विकल्प नहीं हो सकता:
“जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करते समय केवल पक्षों की दलीलों को दर्ज कर लेना और उनका कोई स्वतंत्र मूल्यांकन न करना उचित दृष्टिकोण नहीं है। न्यायिक सोच और विवेक दर्शाने के लिए सामग्री का संदर्भ दिया जाना चाहिए, चाहे वह कितना भी संक्षिप्त क्यों न हो। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘कारण’ ही सभी न्यायिक फैसलों की रीढ़ होते हैं।”
फैसले में कारणों के उल्लेख की अनिवार्यता पर बल देते हुए पीठ ने असिस्टेंट कमिश्नर, कमर्शियल टैक्स डिपार्टमेंट बनाम शुक्ला एंड ब्रदर्स मामले में सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले का उल्लेख किया और कहा:
“ऐसे मामलों में जहां अदालतों ने फैसले में कारण दर्ज नहीं किए हैं, उचित चर्चा के अभाव में सक्षम अदालत के आदेशों की वैधता, औचित्य और शुद्धता पर सवाल उठते हैं। न्यायिक प्रक्रियाओं में कारण दर्ज करने की अनिवार्यता और भी अधिक सख्ती से लागू होती है। अदालत के आदेशों से यह स्पष्ट झलकना चाहिए कि आवेदक द्वारा मांगी गई राहत को स्वीकार या अस्वीकार करते समय अदालत के मस्तिष्क में क्या विचार था…. कारण ही कानून का वास्तविक जीवन है। जब कानून का कारण समाप्त हो जाता है, तो कानून स्वयं समाप्त हो जाता है (व्हार्टन्स लॉ लेक्सिकॉन)। किसी भी विधि के शासन में तार्किकता का यही महत्व है। कारण देने से न्याय के उद्देश्य को बल मिलता है और अनिश्चितता से बचा जा सकता है। वास्तव में, यह पूर्व-निर्णयों (नजीर) के नियम के पालन में भी मदद करता है। इसके विपरीत, कारणों का अभाव मूल रूप से अनिश्चितता और असंतोष पैदा करता है और उच्च/अपीलीय अदालतों के समक्ष उठाए गए कानूनी प्रश्नों को पूरी तरह से अलग आयाम दे देता है। हमारे विचार में, अदालत को किसी पक्ष के दावे या प्रार्थना को खारिज करते समय अपने आधार और कारण अवश्य देने चाहिए, चाहे वह बिल्कुल शुरुआती स्तर पर हो यानी प्रवेश के चरण में या नियमित सुनवाई के बाद, भले ही वे कारण कितने भी संक्षिप्त क्यों न हों।”
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि वीडियो फुटेज और सीआरपीसी की धारा 161 के तहत गवाहों के बयानों पर विचार न किए जाने के कारण हाईकोर्ट के जमानत आदेश टिकने योग्य नहीं हैं। शीर्ष अदालत ने अपीलों को स्वीकार करते हुए पटना हाईकोर्ट के 23 अक्टूबर 2024, 20 दिसंबर 2024 और 10 जनवरी 2025 के आदेशों को रद्द कर दिया।
अदालत ने तीनों जमानत याचिकाओं (CRM संख्या 66294/2024, CRM संख्या 68542/2024 और CRM संख्या 76397/2024) को हाईकोर्ट की फाइल पर पुनर्जीवित व पुनर्स्थापित करते हुए मामले को नए सिरे से विचार के लिए वापस भेज दिया। हालांकि, व्यवस्था में अचानक किसी व्यवधान को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तीनों आरोपी हाईकोर्ट द्वारा पहले लगाई गई शर्तों के तहत तब तक अंतरिम जमानत पर बने रहेंगे, जब तक कि हाईकोर्ट की रोस्टर पीठ आरोपियों, शिकायतकर्ता और पुलिस को सुनकर याचिकाओं का अंतिम निपटारा नहीं कर देती। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके इस आदेश की टिप्पणियों को मामले के गुण-दोष पर निष्कर्ष नहीं माना जाएगा और सभी पक्षों के लिए कानूनी तर्क खुले रहेंगे।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: नागेंद्र राय बनाम बिहार राज्य व अन्य (संबद्ध अपीलों के साथ)
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या… 2026 [एसएलपी (क्रिमिनल) संख्या 2171, 4385 और 6026 / 2025 से उत्पन्न]
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू
निर्णय की तिथि: 16 अक्टूबर 2026

