सुप्रीम कोर्ट ने 1985 के एक तस्करी मामले में कई व्यक्तियों की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है, हालांकि उनकी सजा को पहले से काटी गई अवधि तक सीमित कर दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि घटना के लगभग चार दशक बाद, अब बुजुर्ग हो चुके अपीलकर्ताओं को आगे जेल में रखना “अनुचित रूप से कठोर” होगा।
यह मामला गुजरात हाईकोर्ट के दिसंबर 2010 के फैसले से उपजा है, जिसमें सात आरोपियों की पुनरीक्षण याचिकाओं को खारिज कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 135(1)(b)(i) के तहत उनकी सजा की पुष्टि की थी, जो मूल रूप से 2003 में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, भुज-कच्छ द्वारा सुनाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि के निष्कर्षों को तो सही माना, लेकिन तीन साल के कठोर कारावास को घटाकर अपीलकर्ताओं द्वारा पहले से काटी गई लगभग एक साल की अवधि में बदल दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले की शुरुआत 30 अप्रैल, 1985 को हुई थी, जब मांडवी में सीमा शुल्क अधिकारियों को मछुआरों की जेटी के पास छिपाई गई प्रतिबंधित विदेशी घड़ियों की गुप्त सूचना मिली थी। तलाशी के दौरान दो गड्ढों से जूट की बोरियां मिलीं, जिनमें सिको (Seiko), सिटीजन (Citizen) और रिको (Ricoh) जैसे ब्रांडों की 777 विदेशी घड़ियाँ और 879 वॉच स्ट्रैप बरामद किए गए। इन सामानों की अनुमानित कीमत ₹2,22,190 थी।
जांच में सामने आया कि ये सामान फरवरी 1985 में ‘सफीना-तुल-फिरदौस’ नामक जहाज के जरिए भारत में तस्करी कर लाए गए थे। आरोपी नंबर 1 और 2 जहाज के मालिक थे, जबकि आरोपी नंबर 3 कप्तान था। अन्य आरोपियों पर सामान छिपाने, परिवहन करने या बेचने में मदद करने का आरोप था। 1987 में कुल 21 व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज की गई थी।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की दलील: अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि दोषसिद्धि पूरी तरह से हुसैन मामद भडाला के इकबालिया बयान पर आधारित थी, जिसे सीमा शुल्क अधिनियम की धारा 108 के तहत दर्ज किया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि भडाला की मौत हिरासत में प्रताड़ना के कारण हुई थी, जिसके बाद संबंधित सीमा शुल्क अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) भी दर्ज की गई थी।
वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अमर दवे ने कोर्ट को बताया कि अपील लंबित रहने के दौरान दो आरोपियों की मृत्यु हो चुकी है। उन्होंने जोर दिया कि जीवित आरोपी अब काफी वृद्ध हैं और लगभग एक वर्ष जेल में बिता चुके हैं, जो उस समय की धारा 135 के तहत निर्धारित छह महीने की न्यूनतम वैधानिक सजा से अधिक है।
प्रतिवादी की दलील: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल श्री राजा ठाकरे ने सजा कम करने का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि तस्करी के बड़े पैमाने को देखते हुए आरोपियों के प्रति कोई नरमी नहीं बरती जानी चाहिए।
न्यायालय का विश्लेषण और टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने सीमा शुल्क अधिनियम की धारा 108 के तहत दर्ज बयानों के साक्ष्य मूल्य पर स्पष्टता दी। के.आई. पावुन्नी बनाम असिस्टेंट कलेक्टर (1997) मामले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष से सहमति जताई कि यदि बयान स्वैच्छिक हैं, तो वे “पुख्ता साक्ष्य” (substantive evidence) माने जाते हैं और साक्ष्य अधिनियम की बाधाएं उन पर लागू नहीं होतीं।
पीठ ने टिप्पणी की:
“अपीलकर्ताओं की दोषसिद्धि केवल इकबालिया बयानों पर आधारित नहीं थी, बल्कि अभियोजन पक्ष ने ठोस पुष्ट साक्ष्य भी प्रदान किए थे। इसलिए, दोषसिद्धि के फैसले में कोई कानूनी खामी या विकृति नहीं है।”
हालांकि, सजा के सवाल पर कोर्ट ने समय बीतने को आधार बनाया। अदालत ने पाया कि बरामदगी 1985 की थी, सामान लावारिस हालत में मिला था और आरोपियों के “सचेत कब्जे” (conscious possession) का सीधा प्रमाण नहीं था।
न्यायालय का निर्णय
दोषसिद्धि की पुष्टि करते हुए, कोर्ट ने सजा की अवधि में हस्तक्षेप किया। पीठ ने कहा:
“परिस्थितियों की समग्रता को देखते हुए, जिसमें यह तथ्य शामिल है कि घटना लगभग चार दशक पुरानी है, अपीलकर्ता पहले ही पर्याप्त जेल काट चुके हैं और अब वे वृद्ध हो चुके हैं, हमारा मानना है कि इस समय उन्हें आगे जेल में रखना अनुचित रूप से कठोर होगा और न्याय के हित में नहीं होगा।”
अदालत ने सजा को पहले से काटी गई अवधि तक कम करने का आदेश दिया। चूंकि अपीलकर्ता पहले से ही जमानत पर थे, इसलिए कोर्ट ने उन्हें आत्मसमर्पण न करने का निर्देश दिया और उनके बेल बॉन्ड को मुक्त कर दिया।
केस का शीर्षक: अमाद नूरमामद बकाली बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य
केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1000/2012 (संबंधित अपीलों के साथ)

