1980 की वक्फ अधिसूचना को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज, जहांगीरपुरी की मस्जिदों को लेकर उठाया गया विवाद ‘बोनाफाइड नहीं’: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को 1980 की वक्फ अधिसूचना को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका खारिज कर दी, जिसमें जहांगीरपुरी स्थित तीन मस्जिदों को सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जा बताया गया था। अदालत ने कहा कि याचिका “बोनाफाइड उद्देश्य या जनहित” में दायर नहीं की गई है।

मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने कहा, “हम इस याचिका पर विचार करने के इच्छुक नहीं हैं, जिसे लंबित आवेदनों सहित खारिज किया जाता है।”

याचिकाकर्ता एनजीओ ‘सेव इंडिया फाउंडेशन’ ने 24 मार्च 1980 की उस अधिसूचना को चुनौती दी थी, जिसके माध्यम से दिल्ली वक्फ बोर्ड ने कुछ संपत्तियों को सुन्नी वक्फ संपत्ति के रूप में प्रकाशित किया था। इनमें जहांगीरपुरी की मोती मस्जिद, जामा मस्जिद तथा एक अन्य स्थानीय मस्जिद शामिल थीं।

याचिका में कहा गया था कि संबंधित भूमि 1977 में दिल्ली सरकार द्वारा मुआवजा देकर अधिग्रहित की गई थी और बाद में इसे नियोजित विकास के लिए दिल्ली विकास प्राधिकरण को सौंप दिया गया था। याचिकाकर्ता का दावा था कि ऐसी भूमि पर कोई भी निर्माण सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जा है और उसे वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता “आदतन” जनहित याचिकाएं दायर करता रहा है और उसने “अनावश्यक रूप से अतीत को कुरेदने” का प्रयास किया है। अदालत ने यह भी कहा कि 46 वर्ष पुरानी अधिसूचना को “तुच्छ आधारों” पर चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

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पीठ ने स्पष्ट किया कि वक्फ अधिसूचना कानून के अनुसार वक्फ आयुक्त द्वारा की गई जांच के बाद जारी की गई थी और राज्य सरकार से प्राप्त रिपोर्ट के परीक्षण के पश्चात ही वक्फ संपत्तियों की सूची प्रकाशित की गई थी।

अदालत ने यह भी कहा कि जब किसी सूचीबद्ध वक्फ संपत्ति के संबंध में सामान्य दीवानी उपाय निर्धारित समय के बाद अवरुद्ध हो जाते हैं, तो 46 वर्ष बाद रिट याचिका पर विचार करना विधिक रूप से स्वीकार्य नहीं होगा।

पीठ ने कहा कि जनहित याचिका की “धारा की शुचिता” को किसी भी कीमत पर प्रभावित नहीं होने दिया जा सकता और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार अदालतों का दायित्व है कि निराधार या दुर्भावनापूर्ण याचिकाओं को प्रारंभिक स्तर पर ही “समाप्त” कर दिया जाए।

अदालत ने यह भी नोट किया कि याचिका में ट्रस्ट के ट्रस्टी प्रीत सिंह के खिलाफ राजनीतिक कारणों से झूठे आपराधिक मामलों में फंसाए जाने का आरोप लगाया गया था, लेकिन उन मामलों का कोई विवरण प्रस्तुत नहीं किया गया।

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दिल्ली वक्फ बोर्ड के अधिवक्ता ने याचिका की ग्राह्यता का विरोध करते हुए कहा कि 46 वर्ष बाद अधिसूचना को चुनौती देना स्वीकार्य नहीं है और वक्फ संपत्तियों की सूची विधि के प्रावधानों के अनुसार ही प्रकाशित की गई थी।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि दशकों पुरानी अधिसूचना को चुनौती देने वाली इस याचिका पर रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं किया जा सकता।

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